Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 26
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VṛttiGovind
LSK 725
काम्यज्-विधायकं विधिसूत्रम्
काम्यच्च
Aṣṭādhyāyī 3.1.9
Vṛtti Varadarājācārya

उक्तविषये काम्यच् स्यात्। पुत्रमात्मन इच्छति पुत्रकाम्यति। पुत्रकाम्यति।

रूप- लट्- समिध्यिति। लिट्- यलोपपक्षे- समिधाञ्चकार, समिधाम्बभूव, समिधामास। यलोपाभावे- समिध्याञ्चकार, समिध्याम्बभूव, समिध्यामास। लुट्- समिधिता, समिध्यिता। लृट्- समिधिष्यति, समिध्यिष्यति। लोट्- समिध्यतु। लङ्- असमिध्यत्। विधिलिङ्- समिध्येत्। आशीर्लिङ्- समिध्यात्, समिध्यात्। लुङ्- असमिधीत्, असमिध्यीत्। लृङ्- असमिधिष्यत्, असमिध्यिष्यत्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

यस्य हलः से नित्य से यकार का लोप प्राप्त था, उसे बाधकर के विकल्प से किया गया। इस सूत्र से तो पूरे य अर्थात् यकार और अकार के समूह य का लोप प्राप्त होता है किन्तु आदेः परस्य इस परिभाषा के बल पर पर में जो आदि वर्ण हो, उसका ही लोप होता है। पर में आदि केवल य है। अतः केवल य का इससे लोप होगा और शेष बचे अकार का अतो लोपः से लोप होगा। इस तरह लोप तो पूरे य का ही होता है।

अकार के लोप का स्थानिवद्भाव हो जाने से लघूपधगुण नहीं होता।

समिधिता, समिध्यिता। लुट् लकार में समिध्+य+इता बन जाने के बाद क्यस्य विभाषा से विकल्प से यकार का लोप, शेष अकार का अतो लोपः से लोप हो जाने के बाद पुगन्तलघूपधस्य च से उपधागुण प्राप्त हो रहा था किन्तु अकार के लोप का स्थानिवद्भाव हो जाने से यहाँ पर अकार की विद्यमानता में उपधा में इकार मिल नहीं सकता। अतः गुण नहीं हो पाया। यकार के लोप के पक्ष में समिधिता बन जाता है। यकार के लोप न होने के पक्ष में भी अतो लोपः से अकार का लोप होता ही है। अतः समिध्यिता बन जाता है।

अपना, अपने लिए, अपने सम्बन्धी को चाहना इस अर्थ को तीन प्रकार से प्रकट किया जा रहा है। १-क्यच् प्रत्यय के द्वारा, २- काम्यच् प्रत्यय के द्वारा और ३- वाक्य के द्वारा। वाक्य के द्वारा आत्मनः पुत्रमिच्छति और क्यच् के द्वारा पुत्रीयति तथा काम्यच् के द्वारा दिखाने के लिए अग्रिम सूत्र का अवतरण किया जा रहा है।

७२५-काम्यच्च। काम्यच् प्रथमान्तं, च अव्ययं, द्विपदं सूत्रम्। सुप आत्मनः क्यच् से सुपः, आत्मनः की और धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा से कर्मणः, इच्छायाम् एवं वा की अनुवृत्ति आती है।

इष् धातु के कर्म तथा इच्छुक के सम्बन्धी सुबन्त से चाहना अर्थ में विकल्प से काम्यच् प्रत्यय होता है।

चकार इत्संज्ञक है। जिस तरह से उक्त अर्थ में प्रारम्भ में क्यच् का विधान किया गया था, उसी तरह से उसी अर्थ में काम्यच् भी होता है। शब्द और काम्य दोनों के समूह की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा होकर लट् आदि लकार आते हैं। स्मरण रहे कि क्यच् के न रहने से क्यचि च से ईत्व नहीं होता और लुट् आदि में भी क्यस्य विभाषा की प्रवृत्ति नहीं होती एवं यस्य हलः से यकार का लोप भी नहीं होता।

यहाँ पर प्रश्न हो सकता है कि काम्य में भी य तो है ही तो फिर उसका लोप आदि क्यों नहीं होता, जैसा कि क्यच् का होता था? उत्तर यह है कि अर्थवदग्रहणे

नानर्थकस्य ग्रहणम् अर्थात् अर्थवान् के ग्रहण में अनर्थक का ग्रहण नहीं होता। समुदायो ह्यर्थवान्, तस्यैकदेशोऽनर्थकः अर्थात् समुदाय अर्थवान् होता है किन्तु उसका एकदेश अर्थवान् नहीं होता। समूहात्मक क्यच्, क्यङ् आदि में केवल य अर्थवान् है। काम्यच् में केवल य एकदेश अर्थवान् नहीं है। अतः यस्य हलः के द्वारा निर्दिष्ट य से समूह के एकदेश काम्य का केवल य का ग्रहण नहीं किया जा सकता।

पुत्रकाम्यति। आत्मनः पुत्रमिच्छति। अपने लिए पुत्र चाहता है। यहाँ पर पुत्र+अम् इस सुबन्त से काम्यच्च से काम्यच् प्रत्यय हुआ। चकार की इत्संज्ञा और लोप होने के बाद पुत्र+अम्+काम्य की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा हो गई और उसके अवयव अम् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ- पुत्रकाम्य बना। इससे लट्, तिप्, शप्, अनुबन्धलोप करके पुत्रकाम्य+अति बना। पररूप होकर पुत्रकाम्यति सिद्ध हुआ। अब इसके सभी लकारों के तीनो पुरुष और तीनों वचनों में रूप बनाये जा सकते हैं।

रूप- लट्- पुत्रकाम्यति। लिट्- पुत्रकाम्याञ्चकार, पुत्रकाम्याम्बभूव, पुत्रकाम्यामास। लृट्- पुत्रकाम्यति। लृट्- पुत्रकाम्यिष्यति। लोट्- पुत्रकाम्यतु। लङ्- अपुत्रकाम्यत्। विधिलिङ्- पुत्रकाम्येत्। आशीर्लिङ्- पुत्रकाम्यात्,। लुङ्- अपुत्रकाम्यीत्। लृङ्- अपुत्रकाम्यिष्यत्।

अब आचारार्थक प्रत्ययों का वर्णन कर रहे हैं।