क्यचि क्यङि च नान्तमेव पदं, नान्यत्। नलोपः। राजीयति।
नान्तमेवेति किम्? वाच्यति। हलि च। गीर्यति। पूर्यति। धातोरित्येव।
नेह- दिवमिच्छति दिव्यति।
७२३- नः क्ये। नः प्रथमान्तं, क्ये सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। सुप्तिङन्तं पदम् से पदम् की अनुवृत्ति आती है।
क्य के परे होने पर नकारान्त ही पदसंज्ञक होता है, अन्य नहीं।
नः का अर्थ नकारान्त शब्द है, क्योंकि यह नः पद का विशेषण है। अतः तदन्त विधि होकर नः से नकारान्त अर्थ निष्पन्न होता है। क्य से क्यच्, क्यङ्, क्यष् इन तीनों प्रत्ययों का ग्रहण है।
आत्मनो राजानम् इच्छति इस विग्रह में राजन्+अम् से क्यच् प्रत्यय हुआ। राजन्+अम्+क्य की धातुसंज्ञा करने के बाद धातु के अवयव सुप् विभक्ति अम् के सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् करने के बाद भी प्रत्ययलक्षण से विभक्तित्व मानकर केवल राजन् में भी सुप्तिङन्तं पदम् से पदत्व तो है ही। अब पुनः पदसंज्ञा के लिए नः क्ये का कथन क्यों किया? इसका उत्तर यह है कि सिद्धे सत्यारभ्यमाणो विधिनियमाय भवति अर्थात् कार्य सिद्ध वैसे भी हो रहा है तो पुनः उसी कार्य का विधान करना, विशेष नियम के लिए होता है। यहाँ पर पहले से ही पदत्व विद्यमान था तो पुनः पदसंज्ञा का विधान करके यह नियम बना कि यदि क्य प्रत्ययों के परे रहते पूर्व में विद्यमान शब्द में पदत्व हो तो केवल नकारान्त शब्दों में ही हो, अन्य शब्दों में नहीं। पदसंज्ञा के अनेक फल हैं। जैसे नकार का लोप, जश्त्व आदि। इस नियम से राजन्+य में नः क्ये से पदसंज्ञा के बाद नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप और ईत्व होकर राजीयति बन जायेगा और आत्मनो वाचम् इच्छति में वाच्+य में नकारान्त न होने से पदसंज्ञक नहीं है और पदत्व न होने से झलां जशोऽन्ते से जश्त्व और चोः कुः से कुत्व नहीं होगा जिससे वाच्यति सिद्ध होगा अन्यथा वाग्यति ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता। अतः इस सूत्र को नियम सूत्र कहा जाता है।
राजीयति। आत्मनो राजानम् इच्छति। अपना राजा चाहता है (अपने देश का न कि अन्यदेश का) राजन्+अम् से सुप आत्मनः क्यच् से क्यच्, अनुबन्ध लोप, सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा, सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से अम् का लुक्, न क्ये के नियम से राजन्+य के राजन् में पदत्व है ही। अतः पदान्त नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप करके राजन्+य बना। क्यचि च से जकारोत्तरवर्ती अकार को ईत्व करके राजीय बना। एकदेशविकृतन्यायेन धातुत्वात् लट्, तिप्, शप्, पररूप करके राजीयति सिद्ध हो जाता है।
लट् के रूप- राजीयति, राजीयतः, राजीयन्ति, राजीयसि, राजीयथः, राजीयथ, राजीयामि, राजीयावः, राजीयामः। लिट् में पुत्रीयाञ्चकार की तरह राजीयाञ्चकार। आगे राजीयाञ्चक्रतुः, राजीयाञ्चक्रुः आदि। भू के अनुप्रयोग में राजीयाम्बभूव और अस् के
अनुप्रयोग में राजीयामास। लुट् में- राजीयिता। लृट्- राजीयिष्यति। लोट्- राजीयतु। लङ्- अराजीयतु। विधिलिङ्-राजीयेत्। आशीर्लिङ्- राजीय्यात्। लुङ्- अराजीयीत्। लृङ्- अराजीयिष्यत्।
गीर्यति। आत्मनो गिरम् इच्छति। अपनी वाणी चाहता है। यहाँ पर गिर्+अम् इस प्रातिपदिक से क्यच्, धातुसंज्ञा, सुष् का लुक् करके गिर्+य बना। हलि च से उपधाभूत इकार को दीर्घ होकर गीर्य बना। इससे लट्, तिप्, शप्, पररूप करके गीर्यति सिद्ध होता है। आगे आर्धधातुक के परे रहने पर अग्रिम सूत्र से क्य का लोप करके गीराञ्चकार भी बन जायेगा। लुट् आदि में गीरिता, गीरिष्यति आदि रूप होते हैं। क्य का लोप वैकल्पिक है। सार्वधातुक में तो य का लोप प्राप्त ही नहीं है। अतः गीर्यतु, अगीर्यत्, गीर्येत् आदि बनाते जायें। आशीर्लिङ् में गीर्यात् और लुङ् में अगीरीत् तथा लृङ् में अगीरिष्यत् बन जायेंगे।
पूर्यति। आत्मनः पुरम् इच्छति। अपने लिए नगर चाहता है। जिस तरह से गिर् से गीर्यति बना, उसी तरह से पुर् से पूर्यति बनता है।
दिव्यति। आत्मनो दिवम् इच्छति। अपने लिए स्वर्ग चाहता है। यहाँ पर दिव्+अम् से क्यच् करके दिव्+य बना। अब हलि च से दीर्घ नहीं होगा, क्योंकि वह रेफान्त और वकारान्त धातु के उपधा को दीर्घ करता है। दिव् यह धातु नहीं है, अपितु अव्युत्पन्न प्रातिपदिक है। अतः दिव्यति ही बनेगा। स्मरण रहे कि गिर्, पुर् शब्द गृ और पृ धातुओं में निवृत्त प्रत्यय होकर बने हैं। प्रातिपदिक बन जाने के बाद भी इसमें धातुत्व बना हुआ है क्यों कि विवेचना विजन्ता विडन्ता: शब्दा धातुत्वं न जहति अर्थात् विवृत्त प्रत्ययान्त, विच् प्रत्ययान्त और विच् प्रत्ययान्त शब्द प्रातिपदिक बन जाने के बाद भी धातुत्व का त्याग नहीं करते। अतः पुर्+य, गिर्+य में धातु मान कर उपधा को दीर्घ हुआ और दिव्+य में दिव् के अव्युत्पन्न शब्द होने से धातु नहीं है, अतः दीर्घ नहीं हो सका।
समिध्यति। आत्मनः समिधमिच्छति। अपने लिए समिधा चाहता है। समिध्+अम् से क्यच् होकर, धातुसंज्ञा, विभक्ति का लुक् करके समिध्+य बना। नः क्ये के नियम से पदसंज्ञा नहीं हुई, अतः धकार को झलां जशोऽन्ते से जश्त्व भी नहीं हुआ। इस तरह समिध्य यह धातु बन गया। उससे लट्, तिप्, शप् करके समिध्यति सिद्ध हुआ। लिट्, लुट्, लृट्, आशीर्लिङ्, लुङ् और लृङ् लकारों में अग्रिम सूत्र क्यस्य विभाषा से यकार का विकल्प से लोप किया जा रहा है।