Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 26
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VṛttiGovind
LSK 722
ईकारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
क्यचि च
Aṣṭādhyāyī 7.4.33
Vṛtti Varadarājācārya

अवर्णस्य ईः। आत्मनः पुत्रमिच्छति पुत्रीयति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५१९- क्यचि च। क्यचि सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। अस्य च्चौ से अस्य और ई घ्राध्मोः से ई की अनुवृत्ति आती है।

क्यच् के परे होने पर अवर्ण के स्थान पर ईकार आदेश होता है।

पुत्रीयति। अपना पुत्र चाहता है। आत्मनः पुत्रमिच्छति। सुबन्त पुत्र अम् से सुप आत्मनः क्यच् से क्यच् प्रत्यय, अनुबन्धलोप होकर पुत्र अम् य बना। इसकी सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा होने के बाद अम् धातु का अवयव बना। इसका सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। पुत्र+य बना। अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से पुत्र को दीर्घ प्राप्त था, उसे बाध कर क्यचि च से अकार के स्थान पर ईकार आदेश हो गया- पुत्रीय बना। अब एकदेशविकृतन्यायेन धातु मानकर लट्, उसके स्थान पर परस्मैपद ति प्राप्त हुआ। आत्मनेपद के निमित्तों से हीन धातु है, अतः मात्र परस्मैपद ही होगा। पुत्रीय+ति बनने के बाद शप्, अनुबन्धलोप करके पुत्रीय+अ+ति बना। पुत्रीय+अ में अतो गुणे से पररूप होकर पुत्रीयति सिद्ध हुआ।

परस्य पुत्रमिच्छति= दूसरे का पुत्र चाहता है। इस अर्थ में क्यच् नहीं होगा क्योंकि इच्छा करने वाला अपना पुत्र नहीं चाह रहा है अपितु दूसरे के पुत्र को चाह रहा है। यदि विग्रह में आत्मनः पद न दें तो ऐसे स्थलों में भी क्यच् आदि होने लगेंगे।

लट् के रूप- पुत्रीयति, पुत्रीयतः, पुत्रीयन्ति। पुत्रीयसि, पुत्रीयथः, पुत्रीयथ। पुत्रीयामि, पुत्रीयावः, पुत्रीयामः।

पुत्रीयाञ्चकार। पुत्रीय से लिट्, अनेकाच् होने के कारण आम्, आम् को आर्धधातुक मानकर अतो लोपः से यकारोत्तरवर्ती अकार का लोप, वर्णसम्मेलन करके पुत्रीयाम्+लिट् बना। आम् के परे रहते लिट् का लुक्, लिट् को परे लेकर कृ का अनुप्रयोग, उससे भी परस्मैपद, पुत्रीयाम्+कृ अ बना। अब गोपायाञ्चकार की तरह कृ को द्वित्व, उरत्, हलादिशेष, वृद्धि आदि करके पुत्रीयाञ्चकार बन जाता है। इसके लिए पहले की प्रक्रिया याद रहनी चाहिए। आगे पुत्रीयाञ्चक्रतुः, पुत्रीयाञ्चक्रुः आदि। भू के अनुप्रयोग में पुत्रीयाम्बभूव और अस् के अनुप्रयोग में पुत्रीयामास। लिट् में- पुत्रीयिता। लुट्- पुत्रीयिष्यति। लोट्- पुत्रीयतु। लङ्- अपुत्रीयत्। विधिलिङ्-पुत्रीयेत्। आशीर्लिङ्- पुत्रीय्यात्। लुङ्- अपुत्रीयीत्। लृङ्- अपुत्रीयिष्यत्।