Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 25
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VṛttiGovind
LSK 719
ईटो विकल्पाय विधिसूत्रम्
यङो वा
Aṣṭādhyāyī 7.3.94
Vṛtti Varadarājācārya

यङ्लुगन्तात्परस्य हलादेः पितः सार्वधातुकस्येङ् वा स्यात्।

भूसुवोरिति गुणनिषेधो यङ्लुकि भाषायां न, बोभोतु तेतिक्ते इति छन्दसि निपातनात्। बोभवीति, बोभोति। बोभूतः। अदभ्यस्तात्। बोभुवति। बोभवाञ्चकार, बोभवामास। बोभविता। बोभविष्यति। बोभवीतु, बोभोतु, बोभूतात्। बोभूताम्। बोभुवतु। बोभूहि। बोभवानि। अबोभवीत्, अबोभोत्। अबोभूताम्। अबोभवुः। बोभूयात्। बोभूयाताम्, बोभूयुः। बोभूयात्। बोभूयास्ताम्। बोभूयासुः। गातिस्थेति सिचो लुक्।

यङो वेतीट्पक्षे गुणं बाधित्वा नित्यत्वाद् वुक्। अबोभूवीत्, अबोभोत्। अबोभूताम्। अबोभूवुः। अबोभविष्यत्।

इति यङ्लुक्प्रक्रिया॥२५॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७१९- यङो वा। यङः पञ्चम्यन्तं, वा अव्ययं, द्विपदं सूत्रम्। उतो वृद्धिर्लुकि हलि से हलि, नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके से सार्वधातुके और ब्रूव ईट् से ईट् की अनुवृत्ति आती है।

यङ्लुगन्त से परे हलादि पित् सार्वधातुक को विकल्प से ईट् का आगम होता है।

टित् होने से सार्वधातुक के आदि में बैठेगा। पित् को विधान किये जाने के कारण यह वैकल्पिक ईट् केवल सार्वधातुक तिप्, सिप्, मिप् को ही हो सकता है।

बोभवीति, बोभोति। पुनःपुनः अतिशयेन भवति। भू धातु से बारम्बार अथवा अतिशय होता है इस अर्थ में धातोरेकाचो क्रियासमभिहारे यङ् से यङ् होने के बाद उसका यङोऽचि च से लुक् हो गया। पुनः प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् के नियम से उसे मानकर के सन्यङोः से भू को द्वित्व हुआ, भूभू बना। अभ्याससंज्ञा, ह्रस्व और जश्त्व करके बुभू बना। गुणो यङ्लुकोः से अभ्यास को गुण होकर बोभू बना। इसे एकदेशविकृतन्यायेन मानें या चर्करीत( यङ्लुगन्त ) का अदादिगण में मानकर के भूवादयो धातवः से धातुसंज्ञा होती है। अतः लट् लकार आया, परस्मैपद ति प्रत्यय हुआ। उसकी सार्वधातुकसंज्ञा करके कर्तरि शप् से शप् हुआ। उसका अदःप्रभृतिभ्यः शपः से लुक् हुआ। इस तरह बोभू+ति बना। यङो वा से ति को ईट् का आगम हुआ- बोभू+ईति बना। सार्वधातुकार्धधातुकयोः से भू को गुण होकर बोभो+ईति बना। अव् आदेश होकर बोभू+अव्+ईति बना। वर्णसम्मेलन होकर बोभवीति सिद्ध हुआ। ईट् न होने के पक्ष में बोभोति बनता है। इसी तरह सिप् और मिप् में भी प्रक्रिया होती है जिससे बोभवीषि-बोभोषि, बोभवीमि-बोभोमि बनते हैं।

बोभूतः। पित् वाले तिप्, सिप्, मिप् को सार्वधातुकमपित् से डिद्वद्भाव नहीं होता, अतः गुणनिषेध भी नहीं होगा किन्तु शेष प्रत्यय अपित् हैं, अतः डिद्वद्भाव होकर गुण का निषेध हो जाता है जिससे बोभूतः आदि बनते हैं। इसी तरह झि, थस्, थ, वस्, मस् के परे भी यही प्रक्रिया होती है। झि में झकार के स्थान पर अन्त् आदेश को बाधकर के अदभ्यस्तात् से अत् आदेश होता है। गुणाभाव में धातु के ऊकार को अच् परे मिलने से अचि श्नुधातुभुवां य्वोरियङ्वङौ से उवङ् आदेश होकर बोभुवति बनता है।

लट्- बोभवीति-बोभोति, बोभूतः, बोभुवति, बोभवीषि-बोभोषि, बोभूथः, बोभूथ, बोभवीमि-बोभोमि, बोभूवः, बोभूमः।

लिट् में बोभू को अनेकाच् मान कर आम्, आर्धधातुकगुण, अवादेश, कृ, भू, अस् का अनुप्रयोग करके बोभवाञ्चकार, बोभवाम्बभूव, बोभवामास आदि बनाये जाते हैं। इनके रूप सरल ही हैं।

लृट् में बोभू से तासि, इडागम, डा आदेश, टिलोप, आर्धधातुकगुण, अवादेश आदि करके बोभविता, बोभवितारौ, बोभवितारः आदि सरलता से बनाये जा सकते हैं। इसी तरह लृट् में स्य, इट्, आर्धधातुकगुण, अवादेश, षत्व करके बोभविष्यति, बोभविष्यतः, बोभविष्यन्ति आदि भी आप आसानी से बना सकते हैं।

लोट्- बोभवीतु-बोभोतु-बोभूतात्, बोभूताम्, बोभुवतु, बोभूहि-बोभूतात्, बोभूतम्, बोभूत, बोभवानि, बोभवाव, बोभवाम।

लङ्- अबोभवीत्-अबोभोत्, अबोभूताम्, अबोभवुः, अबोभवीः, अबोभीः, अबोभूतम्, अबोभूत, अबोभवम्, अबोभूव, अबोभूम।

विधिलिङ्- बोभूयात्, बोभूयाताम्, बोभूयुः, बोभूयाः, बोभूयातम्, बोभूयात, बोभूयाम्, बोभूयाव, बोभूयाम।

आशीर्लिङ्- बोभूयात्, बोभूयास्ताम्, बोभूयासुः, बोभूयाः, बोभूयास्तम्, बोभूयास्त, बोभूयासम्, बोभूयास्व, बोभूयास्म।

लृङ् में बोभू से ति, अट् आगम, च्लि, उसको सिच् आदेश करके अबोभू+स्+त् बना है। गातिस्थाभूपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु से सिच् का लुक् करके यङो वा से वैकल्पिक ईट् करके अबोभू+ईत् बना। अब सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण और भुवो वुक् लुङ्लिटोः से वुक् आगम ये दो कार्य एक साथ प्राप्त हुए। पर होने के कारण गुण पहले होना चाहिए था किन्तु परनित्यान्तरङ्गापवादामुत्तरोत्तरं बलीयः के नियम से पर से भी नित्य के बलवान् होने के कारण पहले वुक् ही होगा। कृताकृतप्रसङ्गी नित्यः अर्थात् विरोधी के प्रवृत्त होने पर भी जिसकी प्रवृत्ति हो सकती है, वह नित्य होता है। यहाँ पर गुण होने पर भी वुक् हो सकता है और गुण के पहले भी हो सकता है। इस लिए वुक् नित्य हुआ। पर से नित्य बलवान् होने के कारण वुक् आगम किया गया। अबोभूव्+ईत् बना। अब वकार के व्यवधान के कारण गुण नहीं हो सकता। वर्णसम्मेलन करके अबोभूवीत् बना। ईट् के न होने पक्ष में अजादि परे न होने के कारण वुक् का आगम नहीं हो सकता। अतः सार्वधातुक गुण होकर अबोभोत् बनता है।

लृङ् के रूप- अबोभूवीत्-अबोभोत्, अबोभूताम्, अबोभूवुः, अबोभूवीः-अबोभोः, अबोभूतम्, अबोभूत, अबोभूवम्, अबोभूव, अबोभूम।

लृङ्- अबोभविष्यत्, अबोभविष्यताम्, अबोभविष्यन्।

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यङ्लुगन्त के रूप प्रायः जटिल होते हैं और इन रूपों का प्रयोग भी प्रायः कम ही होता है। इस लिए लघुसिद्धान्तकौमुदी के स्तर के छात्रों को ध्यान में रख कर ही वरदराजाचार्य जी ने केवल भू धातु की प्रक्रिया दिखा कर प्रकरण को समाप्त कर दिया है। ध्यान रहे कि अजादि धातुओं से यङ् होता ही नहीं है तो यङ्लुक् होने का भी प्रसंग नहीं है।

यङ्लुक् के कुछ प्रसिद्ध रूप यहाँ पर दिये जा रहे हैं।

गम् से जङ्गमीति-जङ्गन्ति, पूञ् से पोपवीति-पोपोति, लुञ् से लोलवीति-लोलोति, ग्रह् से जाग्रहीति-जाग्राढि, प्रच्छ् से पाप्रच्छीति-पाप्रष्टि, विश् से वेविशीति-वेवेष्टि, चल् से चाचलीति, जि से जेजयीति-जेजेति, कृ से चर्करीति-चरीकरति-चर्कर्ति-चरीकर्ति, नृत् से नर्नृतीति-नरीनृतीति-नर्नर्ति-नरीनर्ति, तृ से तातरीति-तातर्ति, वृत् से वर्वृतीति-वरीवृतीति, मुद् से मुमुदीति-मोमोत्ति आदि रूप बनाये जास सकते हैं।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

यङ्लुगन्तप्रक्रिया पूरी हुई।

अथ नामधातवः