यङोऽचि प्रत्यये लुक् स्यात्, चकारात् विनापि क्वचित्।
अनैमित्तिकोऽयमन्तरङ्गत्वादादौ भवति।
ततः प्रत्ययलक्षणेन यङन्तत्वाद् द्वित्वम्। अभ्यासकार्यम्।
धातुत्वाल्लडादयः। शेषात्कर्तरीति परस्मैपदम्।
चर्करीतं चेत्यदादौ पाठाच्छपो लुक्।।
श्रीधरमुखोल्लासिनी
अब यङ्लुक्प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। इस प्रकरण में क्रिया के बार-बार करने या अतिशय होने पर हलादि एकाच् धातुओं से यङ् प्रत्यय होकर उसका लुक् होता है। यङ् प्रत्यय होने के बाद उसका लुक् किया जाता है। अतः ऐसे धातुओं को यङ्लुगन्त और इस प्रकरण को यङ्लुक्प्रक्रिया या यङ्लुगन्तप्रक्रिया कहा जाता है। यङन्त में जो अर्थ बताया गया, वही अर्थ यङ्लुगन्त में भी विद्यमान रहता है। यङन्तप्रक्रिया और यङ्लुक्प्रक्रिया में अन्तर यही है कि उसमें यङ् प्रत्यय विद्यमान रहता है और इसमें उसका लुक् किया जाता है। अर्थ में कोई अन्तर नहीं है। इस प्रकरण के लिए अलग से कोई धातु पठित नहीं है किन्तु भू आदि धातुओं से ही यङ् प्रत्यय करके लुक् किया जाता है।
यङ्लुगन्त के प्रयोग के सम्बन्ध में वैयाकरणों में मतभेद है। कुछ आचार्य कहते हैं कि यह केवल वेद का विषय है, लौकिक प्रयोग का नहीं किन्तु कुछ आचार्य यह कहते हैं कि लोक में भी यङ्लुगन्त के प्रयोग उपलब्ध होते हैं। लघुकौमुदीकार वरदराजाचार्य ने मध्यममार्ग अपना कर यङ्लुगन्त का क्वचित् अर्थात् कहीं कहीं ही प्रयोग को स्वीकार किया है। इसीलिए उन्होंने यङोऽचि च में क्वचित् शब्द का प्रयोग किया है। यद्यपि इस प्रकरण में उन्होंने केवल भू धातु से प्रक्रिया दिखाई है तथापि अन्य विविध धातुओं से भी यह प्रत्यय किया जा सकता है।
७१८- यङोऽचि च। यङः षष्ठ्यन्तम्, अचि सप्तम्यन्तं, च अव्ययं, त्रिपदं सूत्रम्। ण्यक्षत्रियार्षजितो लुगणिजोः से लुक् और बहुलं छन्दसि से बहुलम् की अनुवृत्ति आती है।
अच् प्रत्यय के परे होने पर यङ् का लुक् हो जाता है, चकारात् अच् के विना भी कहीं कहीं इसका लुक् होता है।
.....
ध्यान रहे कि यहाँ पर अच् प्रत्याहार नहीं है अपितु अन्विधिः सर्वधातुभ्यः से होने वाला कृत्संज्ञक अच् प्रत्यय है। इस सूत्र में च पढ़ा गया है। उसके बल पर बहुलम् की अनुवृत्ति मान ली जाती है। बहुल का अर्थ है- कहीं प्रवृत्त होना, कहीं प्रवृत्त न होना, कहीं विकल्प से होना और कहीं कुछ विचित्र ही कार्य होना। इसी बहुल का आश्रय लेकर इस सूत्र से अच् प्रत्यय के विना और किसी के परे होने या न होने पर भी यद् का लुक् किया जाता है।
ध्यान रहे कि यह यद्लुक् सर्वत्र नहीं होता। कहीं कहीं अर्थात् जहाँ जहाँ शिष्यों के प्रयोग मिलते हैं, वहाँ ही लुक् करना चाहिए।
अब प्रश्न होता है कि अच् प्रत्यय के अभाव में यद् का लुक् कब होगा? उत्तर है- अनैत्तिकोऽयमन्तरङ्गत्वादादौ भवति। अर्थात् यह लुक् अनैमित्तिक है, क्योंकि अच् प्रत्यय न होने की स्थिति में किसी प्रत्यय, धातु या किसी निमित्त की अपेक्षा नहीं करता। अतः यह अन्तरङ्ग है। अल्पापेक्षमन्तरङ्गम् अथवा अनिमित्तमन्तरङ्गम्। जो कार्य किसी का आश्रय नहीं करता या अपेक्षाकृत कम करता है, वह कार्य अन्तरङ्ग होता है। असिद्ध बहिरङ्गमन्तरङ्गे। यह परिभाषा है। अन्तरङ्ग कार्य करना हो तो बहिरङ्ग कार्य असिद्ध होता है। यद्लुक् किसी की अपेक्षा नहीं करता, अतः अन्तरङ्ग है और द्वित्व, गुण आदि किसी को निमित्त मान कर के होते हैं, अतः वे बहिरङ्ग हैं। अन्तरङ्ग की कर्तव्यता में बहिरङ्ग असिद्ध होते हैं। इस लिए पहले अन्तरङ्ग कार्य यद्लुक् ही होगा।
अब दूसरा प्रश्न यह उपस्थित होता है कि यदि पहले यद् का लुक् कर दिया जायेगा तो यद् के परे न होने से सन्यङोः से द्वित्व कैसे हो सकेगा? ग्रन्थकार ने उत्तर दिया-ततः प्रत्ययलक्षणेन यद्जन्तत्वाद्वित्वम्। अर्थात् प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् इस सूत्र के द्वारा प्रत्ययलक्षण अर्थात् प्रत्यय के लोप होने पर भी प्रत्यय को मान कर होने वाले कार्य हो सकते हैं, इस नियम के आधार पर द्वित्व आदि कार्य हो सकते हैं। अब यहाँ पर यह शंका नहीं करनी चाहिए कि लुक् होने पर न लुप्ताङ्गस्य से प्रत्ययलक्षण का निषेध होना चाहिए, क्योंकि वह सूत्र अङ्गसम्बन्धी कार्यों में ही प्रत्ययलक्षण का निषेध करता है। यहाँ पर प्रत्ययलक्षण से अङ्गकार्य नहीं करना है किन्तु पूरे यद्जन्त को द्वित्व करना है, और वह अङ्गकार्य नहीं है। अतः यहाँ पर प्रत्ययलक्षण से द्वित्व आदि कार्य हो सकते हैं।
ण्यन्त, सन्नन्त और यद्जन्त की तरह यद्लुगन्त की भी सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा होती है जिससे लट् आदि लकार आते हैं। अथवा यूँ कहा जा सकता है कि यद् प्रत्यय करने के बाद उसे यद्जन्त मान कर के पहले धातुसंज्ञा की गई और बाद में एकदेशविकृतन्यायेन अर्थात् एकदेश में कुछ विकार, आगम, आदेश, लोप आदि हो जाने के बाद भी उसकी संज्ञात्व में कुछ भी कमी नहीं आती है, इस नियम का आश्रय लेकर यद्लुगन्त को धातु ही मान लिया जाता है।
शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् से परस्मैपद का विधान किया जाता है। यहाँ पर प्रत्ययलक्षण से यद् को द्वित् मान कर अनुदात्तद्वित्व आत्मनेपदम् से आत्मनेपद नहीं किया जा सकता। क्योंकि प्रत्ययलक्षण से केवल प्रत्यय को निमित्त मानकर होने वाले कार्य हो सकते हैं। आत्मनेपद यह प्रत्यय-निमित्तक कार्य नहीं है। अतः यद्लुगन्त धातुओं से केवल परस्मैपद ही होता है, आत्मनेपद नहीं।
चर्करीतं च यह गण सूत्र है। इसका पाठ अदादि में किया जा चुका है। प्राचीन
आचार्यों ने चर्करीत को यङ्लुगन्त की संज्ञा स्वीकार किया है अर्थात् यङ्लुगन्त को चर्करीत कहते हैं। चर्करीत को अदादि मान लेने के कारण यङ्लुगन्त से अदादिगण में होने वाले वाला कार्य अदःप्रभृतिभ्यः शपः से शप् का लुक् किया जाता है।