Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 26
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VṛttiGovind
LSK 720
क्यच्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
सुप आत्मनः क्यच्
Aṣṭādhyāyī 3.1.8
Vṛtti Varadarājācārya

इषिकर्मण एषितुः सम्बन्धिनः सुबन्तादिच्छायामर्थे क्यच्-प्रत्ययो वा स्यात्।

श्रीधरमुखोल्ल्लासिनी

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब नामधातुप्रकरण आरम्भ होता है। इस प्रकरण में धातुपाठ का कोई धातु नहीं होता है अपितु नाम अर्थात् सुबन्त प्रतिपदिक को धातु बनाने की प्रक्रिया बताई जाती है। नाम से धातु बन जाने के कारण इसे नामधातुप्रकरण कहा गया है। शब्द को धातु बनाने की रीति हिन्दी आदि भाषाओं में भी देखने को मिलती है। जैसे कि अपना से अपनाना, धिक्कार से धिक्कारना, हाथ से हथियाना, चक्कर से चक्कराना आदि प्रयोग होता है। अर्थात् शब्द को धातु की तरह प्रयोग किया गया है। इसी तरह संस्कृत में पुत्र से पुत्रीरीति, शिला से शिलायति, विष्णु से विष्णुयति, शब्द से शब्दायते आदि बनाये जाते हैं। इस प्रकरण में यही प्रक्रिया बताई गई है।

५१७- सुप आत्मनः क्यच्। सुपः पञ्चम्यन्तम्, आत्मनः षष्ठ्यन्तं, क्यच् प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है। धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा से कर्मणः, इच्छायाम् और वा की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् के नियम से सुप् से सुबन्त का ग्रहण होता है।

इच्छार्थक इष् धातु के कर्म तथा इच्छुक के सम्बन्धी सुबन्त से चाहना अर्थ में विकल्प से क्यच् प्रत्यय होता है।

तात्पर्य यह है कि चाहने वाला व्यक्ति अपने लिए कोई वस्तु चाहता है, इस अर्थ को प्रकट करने के लिए अभीष्ट वस्तु के वाचक सुबन्त से वैकल्पिक क्यच् प्रत्यय इस सूत्र से हो जाता है।

ककार की लशक्वतद्धिते से तथा चकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है, केवल ये शेष रहता है। क्यच् प्रत्यय सनादि प्रत्ययों में पठित है। अतः यह अन्त में है जिसके, उस समुदाय की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा होती है। धातुसंज्ञा के समय जिस सुबन्त से यह प्रत्यय किया गया है, वह सुप् भी रहता है, अतः यह सुप् धातु का अवयव बन जाता है। उसका अग्रिम सूत्र सुपो धातुप्रतिपदिकयोः से लुक् हो जाता है। एकदेशविकृतन्यायेन धातु मानकर तत्र लट् आदि आते हैं। यह प्रत्यय वैकल्पिक है, अतः एक पक्ष में वाक्य ही रह जाता है।