णत्वं न। नरीनृत्यते। जरीगृह्यते।
इति यङन्तप्रक्रिया॥२४॥
७१७- क्षुभ्नादिषु च। क्षुभ्ना आदिर्येषां ते क्षुभ्नादयस्तेषु। क्षुभ्नादिषु सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। रषाभ्यां नो णः समानपदे से नः और णः तथा न भाभूपू० से न की अनुवृत्ति आती है।
क्षुभ्ना आदि गण में पठित शब्दों में नकार को णत्व नहीं होता है।
क्षुभ्नादिगण में होने के कारण क्षुभ संचलने इस क्रयादिगणीय धातु से क्षुभ्नाति में णत्व नहीं होता तो नरीनृत्य के भी क्षुभ्नादि में होने के कारण णत्व नहीं होता।
नरीनृत्यते। जिस तरह से वृत् से वरीवृत्यते बना, उसी तरह नृती गात्रविक्षेपे के नृत् से नरीनृत्यते बनता है। यहाँ पर रेफ से परे द्वितीय नकार को अट् कुष्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि से णत्व प्राप्त था, उसका क्षुभ्नादिषु च से निषेध किया गया। अतः नरीनृत्यते ही रह गया।
लट्- नरीनृत्यते। लिट्- नरीनृताञ्चक्रे। लृट्- नरीनृतिता। लृट्- नरीनृतिष्यते। लोट्- नरीनृत्यताम्। लङ्- अनरीनृत्यत। विधिलिङ्- नरीनृत्यते। आशीर्लिङ्- नरीनृतिषीष्ट। लुङ्- अनरीनृतिष्ट। लृङ्- अनरीनृतिष्यत।
जरीगृह्यते। पुनःपुनः अतिशयेन गृह्णाति। बार बार अथवा अतिशय ग्रहण करता है। ग्रह उपादाने धातु है। ग्रह से क्रियासमभिहार अर्थ में यङ् करके उसके ङित् होने के कारण ग्रहिन्यावयिव्यधिविष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां ङिति से ग्+र्+अ+ह्=ग्रह में विद्यमान रेफ को सम्प्रसारण होता है। रेफ को सम्प्रसारण करने पर ऋकार हो जाता है। गृ+अह् में सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप होकर गृह् बन जाता है। गृह्+य में धातु को द्वित्व, उरत्, हलादिशेष, चुत्व करके जगृह्+य बना। ऋत् धातु है, अतः रीगृदुपधस्य च से रीक् का आगम करके जरीगृह्य बना। इसकी धातुसंज्ञा करके नरीनृत्यते की तरह जरीगृह्यते बन जाता है।
लट्- जरीगृह्यते। लिट्- जरीगृहाञ्चक्रे। लृट्- जरीगृहिता। लृट्- जरीगृहिष्यते। लोट्- जरीगृह्यताम्। लङ्- अजरीगृह्यत। विधिलिङ्- जरीगृह्यते। आशीर्लिङ्- जरीगृहिषीष्ट। लुङ्- अजरीगृहिष्ट। लृङ्- अजरीगृहिष्यत।
इसके बाद अनेक धातुओं से यङ् करके रूप बनाये जाते हैं। कहीं अभ्यास को दीर्घ, कहीं य का लोप, कहीं इत्व, कहीं रीक् का आगम आदि का विधान मिलता है। कहीं कहीं पौनःपुन्य अर्थ में न हो कर अन्य अर्थों में भी यह प्रत्यय होता है। यहाँ लघुसिद्धान्तकौमुदी में छात्रों के सारल्यार्थ केवल भू आदि कुछ ही धातुओं की प्रक्रिया दिखाई गई है। जिज्ञासु छात्रों के लिए कुछ धातुओं के यङन्त रूप यहाँ दिये जा रहे हैं। स्मरण रहे कि अजादि धातुओं और अनेकाच् धातुओं से यङ् नहीं होता है।
धातु
यङन्तार्थ
सामान्य-रूप
यङन्त- लट्
कम्प
बार-बार काँपना
कम्पते
चाकम्प्यते
काङ्क्ष्
बार-बार चाहना
काङ्क्षते
चाकाङ्क्षते
क्रन्द्
बार-बार रोना
क्रन्दते
चाक्रन्द्यते
क्रम्
बार-बार क्रमण करना
क्रमते
चङ्क्रम्यते
कृ
बार-बार करना
करोति
चेक्रीयते
क्री
बार-बार खरीदना
क्रीणाति
चेक्रीयते
क्रीड्
बार-बार खेलना
क्रीडति
चेक्रीड्यते
क्षि
बार-बार नष्ट होना
क्षयति
चेक्षीयते
खाद्
बार-बार खाना
खादति
चाखाद्यते
गम्
बार-बार जाना
गच्छति
जङ्गम्यते
गै
बार-बार गाना
गायति
जेगीयते
ग्रह्
बार-बार ग्रहण करना
गृह्णाति
जरीगृह्यते
घुष्
बार-बार घोषणा करना
घोषते
जोघुष्यते
घ्रा
बार-बार सूँघना
जिघ्रति
जेघ्रीयते
चर्
बार-बार बुरी तरह से चरना
चरति
चञ्चूर्यते
चल्
कुटिलता से चलना
चलति
चाचज्यते
जन्
बार-बार पैदा होना
जायते
जाजन्यते
जप्
निन्दित जप करना
जपति
जञ्जप्यते
जि
बार-बार जीताना
जयते
जेजीयते
जीव्
बार-बार जीना
जीवति
जेजीव्यते
ज्ञा
बार-बार जानना
जानाति
जाज्ञायते
तप्
बार-बार तपना
तपति
तातप्यते
त्यज्
बार-बार छोड़ना
त्यजति
तात्यज्यते
दह्
बुरी तरह जलना
दहति
दन्दह्यते
दा
बार-बार देना
ददाति
देदीयते
दृश्
बार-बार देखना
पश्यति
दरीदृश्यते
ध्यै
बार-बार ध्यान करना
ध्यायति
दाध्यायते
नम्
बार-बार झुकना
नमति
नंनम्यते
पच्
बार-बार पकना
पचति
पापच्यते
पठ्
बार-बार पढ़ना
पठति
पापठ्यते
पा
बार-बार पीना
पिबति
पेपीयते
बुध्
बार-बार जानना
बुध्यति
बोबुध्यते
भुज्
बार-बार खाना
भुनक्ति
बोभुज्यते
मिल्
बार-बार मिलना
मिलति
मेमिल्यते
मुद्
बार-बार प्रसन्न होना
मोदते
मोमुद्यते
यज्
बार-बार यज्ञ करना
यजति
याज्यज्यते
युज्
बार-बार मिलना
योजते
योयुज्यते
युध्
बार-बार युद्ध काना
युध्यति
योयुध्यते
रक्ष्
बार-बार रक्षा करना
रक्षति
रारक्ष्यते
रम्
बार-बार रमण करना
रमते
रंरम्यते
रुच्
बार-बार पसन्द करना
रोचते
रोरुच्यते
रुद्
बार-बार रोना
रोदिति
रोरुद्यते
लभ्
बार-बार प्राप्त करना
लभते
लालभ्यते
लिख्
बार-बार लिखना
लिखति
लेलिख्यते
वच्
बार-बार कहना
वक्ति
वावच्यते
वद्
बार-बार बोलना
वदति
वावद्यते
वन्द्
बार-बार बन्दना करना
वन्दते
वावन्द्यते
वस्
बार-बार वास करना
वसति
वावस्यते
वृध्
बार-बार बढ़ना
वर्धते
वावर्ध्यते
शी
बार-बार सोना
शेते
शाशय्यते
शुच्
बार-बार शोक करना
शोचति
शोशुच्यते
शुध्
बार-बार शुद्ध करना
शोधयति
शोशुध्यते
श्रु
बार-बार सुनना
श्रुणोति
शोश्रूयते
सिच्
बार-बार सींचना
सिञ्चति
सेसिच्यते
स्मृ
बार-बार स्मरण करना
स्मरति
सास्मार्यते
स्वप्
बार-बार सोना
स्वपिति
सोषुप्यते
हन्
बार-बार मारना
हन्ति
जेघ्नीयते
हस्
बार-बार हँसना
हसति
जाहस्यते
परीक्षा
यङन्त प्रक्रिया पर पूर्णतया प्रकाश डालते हुए तीन पृष्ठ का लेख लिखें।
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या की
यङन्त-प्रक्रिया पूरी हुई।
अथ यङ्लुक्प्रक्रिया