Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 24
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VṛttiGovind
LSK 716
रीगागमविधायकं विधिसूत्रम्
रीगृदुपधस्य च
Aṣṭādhyāyī 7.4.90
Vṛtti Varadarājācārya

ऋदुपधस्य धातोरभ्यासस्य रीगागमो यङ्यङ्लुकोः।

वरीवृत्यते। वरीवृताञ्चक्रे। वरीवृतिता।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७१६- रीगृदुपधस्य च। ऋत् उपधा यस्य, स ऋदुपधस्तस्य। रीक् प्रथमान्तम्, ऋदुपधस्य षष्ठ्यन्तं, च अव्ययं, त्रिपदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य और गुणो यङ्लुकोः से यङ्लुकोः की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार है।

उपधा में ह्रस्व ऋकार वाली धातु के अभ्यास को रीक् का आगम होता है, यङ् या यङ्लुक् परे होने पर।

रीक् में ककार इत्संज्ञक है, कित् होने के कारण अभ्यास के अन्त में बैठता है।

वरीवृत्यते। पुनःपुनः अतिशयेन वर्तते। वृतु वर्तने धातु है। वृत् से यङ्, द्वित्व, अभ्यासकार्य, हलादिशेष करके व+वृत्य बना है। रीगृदुपधस्य च से अभ्यास व को रीक् का आगम, अनुबन्धलोप, अन्त्याववय होकर वरीवृत्य बना। इसकी धातुसंज्ञा करके लट्, त, शप्, पररूप आदि होकर वरीवृत्यते, वरीवृत्येते, वरीवृत्यन्ते आदि बन जाते हैं। लिट् में यस्य हलः, अतो लोपः की प्रवृत्ति होती है जिससे वरीवृताञ्चक्रे बन जाता है।

लट्- वरीवृत्यते। लिट्- वरीवृताञ्चक्रे। लुट्- वरीवृतिता। लृट्- वरीवृतिष्यते। लोट्- वरीवृत्यताम्। लङ्- अवरीवृत्यत। विधिलिङ्- वरीवृत्येत। आशीर्लिङ्- वरीवृतिषीष्ट। लुङ्- अवरीवृतिष्ट। लृङ्- अवरीवृतिष्यत।