यस्येति संघातग्रहणम्। हलः परस्य यशब्दस्य लोप आर्धधातुको।
आदेः परस्य। अतो लोपः। वाव्रजाञ्चक्रे। वाव्रजिता।
७१५- यस्य हलः। यस्य षष्ठ्यन्तं, हलः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अतो लोपः से लोपः की अनुवृत्ति आती है। इस सूत्र में यस्य का अर्थ है अकार सहित यकार का। य्+अ=य ऐसा पूरा समूह।
हल् से परे य का लोप होता है आर्धधातुक परे होने पर।
इस सूत्र से अकार सहित पूरे य के लोप प्राप्त होने पर आदेः परस्य की सहायता से केवल य् का लोप होता है। अकार का लोप तो अतो लोपः से होता है। बोभूयाञ्चक्रे में हल् से परे न मिलने के कारण और बोभूयते में आर्धधातुक न मिलने के कारण य का लोप नहीं होता।
वाव्रजाञ्चक्रे। यङ्, द्वित्व आदि होने के बाद वाव्रज्य धातु बना है। उससे लिट् में कास्यनेकाच आम् वक्तव्यो लिटि से आम्, उसका लुक्, लिट् सहित कृ का अनुप्रयोग करके वाव्रज्य+कृ+लिट् बना है। यकार का यस्य हलः से लोप तथा अकार का अतो लोपः से लोप करने पर वाव्रज् बना। आगे चक्रे बनाने की प्रक्रिया पूर्ववत् है। इस तरह लिट् में वाव्रजाञ्चक्रे बन जाता है। आर्धधातुक के परे सर्वत्र यकार और अकार का लोप किया जाता है।
लट्- वाव्रज्यते। लिट्- वाव्रजाञ्चक्रे। लुट्- वाव्रजिता। लृट्- वाव्रजिष्यते। लोट्- वाव्रज्यताम्। लङ्- अवाव्रज्यत। विधिलिङ्- वाव्रज्येत। आशीर्लिङ्- वाव्रजिषीष्ट। लुङ्- अवाव्रजिष्ट। लृङ्- अवाव्रजिष्यत।