अकितोऽभ्यासस्य दीर्घो यङ्यङ्लुकोः। कुटिलं व्रजति वाव्रज्यते।
७१४- दीर्घोऽकितः। न कित् यस्य स अकित्, तस्य। दीर्घः प्रथमान्तम्, अकितः षष्ठ्यन्तं,
द्विपदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य और गुणो यङ्लुकोः से यङ्लुकोः की
अनुवृत्ति आती है।
अकित् अभ्यास को दीर्घ होता है यङ् या यङ्लुक् परे होने पर।
वाव्रज्यते। कुटिलं व्रजति। टेढ़ा चलता है। व्रज गतौ धातु है। उससे नित्यं
कौटिल्ये गतौ के नियम से यङ् होकर सन्यङ्गोः से धातु को द्वित्व, अभ्यासकार्य,
हलादिशेष करने पर व+व्रज्+य बना। दीर्घोऽकितः से अभ्यास के अकार को दीर्घ होकर
वाव्रज्य बना। लट्, आत्मनेपद का त, शप्, पररूप, एत्व करके वाव्रज्यते बनता है।
वाव्रज्यते, वाव्रज्येते, वाव्रज्यन्ते।