अभ्यासस्य गुणो यङ् यङ्लुकि च परतः। ङिदन्तत्वादात्मनेपदम्।
पुनःपुनरतिशयेन वा भवति बोभूयते। बोभूयाञ्चक्रे। अबोभूयिष्ट।
श्रीधरमुखोल्लासिनी
अब यङन्तप्रक्रिया का प्रारम्भ होता है। क्रिया के बार-बार करने या अतिशय क्रिया का होना अर्थ में हलादि एकाच् धातुओं से यङ् प्रत्यय होता है। यङ् प्रत्यय के अन्त में होने के कारण धातुओं को यङन्त और इस प्रकरण को यङन्तप्रक्रिया कहा जाता है। इस प्रकरण के लिए अलग से कोई धातु पठित नहीं है किन्तु भू आदि धातुओं से ही यह प्रत्यय किया जाता है।
७१२- गुणो यङ्लुकोः। यङ् च लुक् च यङ्लुकौ तयोः यङ्लुकोः। गुणः प्रथमान्तं, यङ्लुकोः सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।
यङ् या यङ् के लुक् परे होने पर अभ्यास को गुण होता है।
बोभूयते। बार बार या अतिशय होता है। भू सत्तायाम् धातु है। इससे पुनःपुनरतिशयेन वा भवति अर्थ में धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् से यङ् हुआ। ङकार की इत्संज्ञा के बाद लोप करके भू+य बना। धातु से विहित होने के कारण आर्धधातुकं शेषः से य की आर्धधातुकसंज्ञा हो गई तो सार्वधातुकार्धधातुकयोः से भू के ऊकार को गुण प्राप्त हुआ। य के ङित् होने के कारण विङति च से गुणनिषेध हुआ। अब सन्यङोः से एङन्त के प्रथम एकाच् भू का द्वित्व हो गया- भूभू+य बना। द्वित्व के बाद ह्रस्वः से प्रथम भू के ऊकार को ह्रस्व करके भूभू+य बना। भकार के स्थान पर अभ्यासे चर्च से जश् आदेश करके बुभूय बना। बु इसकी अभ्याससंज्ञा करके गुणो यङ्लुकोः से अभ्यास के ऊकार को गुण हुआ- बोभूय बना। इसकी सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा हो गई। उसके बाद वर्तमान काल में लट् लकार, उसके स्थान पर अनुदात्तङित आत्मनेपदम् से आत्मनेपद का विधान हुआ। त आया। बोभूय+त बना। शप् होकर बोभूय+अ+त बना। बोभूय+अ में अतो गुणो से पररूप होकर दोनों अकार के स्थान पर एक अकार हुआ- बोभूय+त बना। टित आत्मनेपदानां टेरेः से एत्व होकर बोभूयते बना।
लट् के रूप- बोभूयते, बोभूयते, बोभूयन्ते। बोभूयसे, बोभूयेथे, बोभूयध्वे। बोभूये, बोभूयावहे, बोभूयामहे।
बोभूयाञ्चक्रे। बोभूय से लिट्, अनेकाच् होने के कारण आम्, आम् को आर्धधातुक मानकर अतो लोपः से यकारोत्तरवर्ती अकार का लोप, वर्णसम्मेलन करके बोभूयाम्+लिट् बना। आम् के परे लिट् का लुक्, लिट् को परे लेकर कृ का अनुप्रयोग, उससे भी आत्मनेपद का ही विधान करके बोभूयाम्+कृ त बना। अब एधाञ्चक्रे की तरह त को एश् आदेश कृ को द्वित्व, उरत्, हलादिशेष, यण् आदि करके बोभूयाञ्चक्रे बन जाता है। इसके लिए पहले की प्रक्रिया याद रहनी चाहिए।
लिट् के रूप- बोभूयाञ्चक्रे, बोभूयाञ्चक्राते, बोभूयाञ्चक्रिरे, बोभूयाञ्चक्षे, बोभूयाञ्चक्राथे, बोभूयाञ्चक्रृद्वे, बोभूयाञ्चक्रे, बोभूयाञ्चक्रृवहे, बोभूयाञ्चक्रृमहे। बोभूयाम्बभूव। बोभूयामास।
बोभूयिता। लुट् में बोभूय से लुट्, त, तासि, इट् का आगम, डा आदेश अतो लोपः का अकार लोप करके, तास् के टि का लोप करने पर बोभूयिता बनता है।
लुट् के रूप- बोभूयिता, बोभूयितारौ, बोभूयितारः, बोभूयितासे, बोभूयितासाथे, बोभूयिताध्वे, बोभूयिताहे, बोभूयितास्वहे, बोभूयितास्महे।
लृट् के रूप- बोभूयिष्यते, बोभूयिष्येते, बोभूयिष्यन्ते, बोभूयिष्यसे, बोभूयिष्येथे, बोभूयिष्यध्वे, बोभूयिष्ये, बोभूयिष्यावहे, बोभूयिष्यामहे।
लोट् के रूप- बोभूयताम्, बोभूयेताम्, बोभूयन्ताम्, बोभूयस्व, बोभूयेथाम्, बोभूयध्वम्, बोभूयै, बोभूयावहै, बोभूयामहै।
लङ् के रूप- अबोभूयत, अबोभूयेताम्, अबोभूयन्त, अबोभूयथाः, अबोभूयेथाम्, अबोभूयध्वम्, अबोभूये, अबोभूयावहि, अबोभूयामहि।
विधिलिङ् के रूप- बोभूयेत, बोभूयेताम्, बोभूयेरन्, बोभूयेथाः, बोभूयेथाम्, बोभूयेध्वम्, बोभूयेय, बोभूयेवहि, बोभूयेमहि।
आशीर्लिङ् के रूप- बोभूयिषीष्ट, बोभूयिषीयास्ताम्, बोभूयिषीरन्, बोभूयिषीष्ठाः,
बोभूयिषीष्ठाम्, बोभूयिषीढ्वम्-बोभूयिषीध्वम्, बोभूयिषीय, बोभूयिषीवहि, बोभूयिषीमहि।
लुङ् के रूप- अबोभूयिष्ट, अबोभूयिषाताम्, अबोभूयिषत, अबोभूयिष्ठाः,
अबोभूयिषाथाम्, अबोभूयिढ्वम्-अबोभूयिष्वम्, अबोभूयिषि, अबोभूयिष्वहि,
अबोभूयिष्महि।
लृङ् के रूप- अबोभूयिष्यत, अबोभूयिष्येताम्, अबोभूयिष्यन्त, अबोभूयिष्यथाः,
अबोभूयिष्येथाम्, अबोभूयिष्यध्वम्, अबोभूयिष्ये, बोभूयिष्यावहि, अबोभूयिष्यामहि।