पौनःपुन्ये भृशार्थे च द्योत्ये धातोरेकाचो हलादेर्यङ् स्यात्।
७११- धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ्। क्रियायाः समभिहारः क्रियासमभिहारः, तस्मिन्। धातोः पञ्चम्यन्तम्, एकाचः पञ्चम्यन्तं, हलादेः पञ्चम्यन्तं, क्रियासमभिहारे सप्तम्यन्तं, यङ् प्रथमान्तम् अनेकपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।
क्रिया का बार-बार होना अथवा अतिशय होना अर्थ द्योत्य होने पर एक् अच् वाले हलादि धातुओं से परे यङ् प्रत्यय होता है।
इस प्रत्यय के लिए आवश्यक तीन बातें हैं- एकाच् धातु, हलादि और क्रियासमभिहार। क्रिया का बार-बार होना या अतिशय होना ही क्रियासमभिहार है।
यङ् में केवल ङकार ही इत्संज्ञक है, अतः य पूरा शेष रहता है। ङित् होने के कारण अनुदात्तङित आत्मनेपदम् से आत्मनेपद हो जाता है। यङ् करने के बाद सन्यङोः से द्वित्व होता है, उसके बाद अग्रिमसूत्र गुणो यङ्लुकोः से गुण हो जाता है। उसके बाद यङ् के सनादिगण में आने के कारण यङन्त की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा की जाती है। उसके बाद लट् आदि लकार होते हैं।