ग्रहेगुहेरुगन्ताच्च सन इण् न स्यात्। बुभूषति।
इति सन्नन्तप्रक्रिया॥२३॥
७१०-सनि ग्रहगुहोश्च। ग्रहश्च गुह् च तयोरितरेतरद्वन्द्वो ग्रहगुहौ, तयोः। सनि सप्तम्यन्तं, ग्रहगुहोः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययं, त्रिपदं सूत्रम्। नेड् वशि कृति से नेट् और श्रयुकः किति से उकः की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार है।
ग्रह, गुह् और उगन्त धातुओं से परे सन् को इट् का आगम नहीं होता।
बुभूषति। भवितुमिच्छति। होना चाहता है। भू सत्तायाम् धातु है। उससे सन् करने के बाद ऊदन्त धातु होने से इट् प्राप्त था, उसका सनि ग्रहगुहोश्च से निषेध कर दिया गया। आर्धधातुक गुण प्राप्त था, उसका भी इको झल् से किद्वद्भाव करके निषेध हुआ। सन्यङोः से धातु को द्वित्व करके हलादिशेष, ह्रस्व, जश्त्व करने पर बुभूष ऐसा सन्नन्त रूप बना। इसकी धातुसंज्ञा करके लट्, तिप्, शप्, पररूप करने पर बुभूषति। भू धातु केवल परस्मैपदी है, अतः पूर्ववत्सनः के नियम से सन्नन्त में भी बुभूषति सिद्ध हुआ।
लट्- बुभूषति। लिट्- बुभूषाञ्चकार, बुभूषाम्बभूव, बुभूषामास। लुट्- बुभूषिता। लृट्- बुभूषिष्यति। लोट्- बुभूषतु। लङ्- अबुभूषत्। विधिलिङ्- बुभूषेत्। आशीर्लिङ्- बुभूष्यात्। लुङ्- अबुभूषीत्। लृङ्- अबुभूष्यत्।
लघुसिद्धान्तकौमुदी में चार ही धातुओं की प्रक्रिया दिखाई गई है। इस प्रकरण बहुत से धातुओं के रूप आप स्वयं बना सकते हैं। सन्नन्त प्रक्रिया जटिल है, इसमें अनेक प्रकार के उत्सर्ग और अपवाद तथा विशिष्ट कार्य होते हैं। इसलिए लघुसिद्धान्तकौमुदी में उन्हें नहीं दिखाया गया है। छात्रों को जानकारी मिले इसलिए कुछ-कुछ धातुओं का अर्थ एवं लट्-लकार के प्रथमपुरुष एकवचन के रूप यहाँ व्याख्या में दिये जा रहे हैं। शेष रूपों को बनाना आपका काम है एवं विशेष जिज्ञासा को शान्त करने के लिए तो इसके बाद तो वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी पढ़नी ही है।
सन् होने के बाद धातु का अर्थ बदल जाता है। जैसे पढ़ना अर्थ है तो यहाँ पर पढ़ने की इच्छा करना अर्थ हो जायेगा। याद रहे कि सन्नन्त में पदव्यवस्था मूल धातु के समान ही होती है। यदि मूल धातु परस्मैपदी है तो सन्नन्त होने के बाद भी परस्मैपदी ही रहेगा, यदि आत्मनेपदी है तो सन्नन्त में भी आत्मनेपदी ही रहेगा।
धातु
अर्थ
सामान्य-रूप
सन्नन्त लट्
अर्च्
पूजने की इच्छा करना
अर्चति
अर्चिचिपति
आप्
पाने की इच्छा करना
आप्नोति
ईप्सति
अधि+इङ्
पढ़ने की इच्छा करना
अधीते
अधिजिगांसते
कथ्
कहने की इच्छा करना
कथयति
चिकथयिषति-ते
कुप्
कोप करने की इच्छा करना
कुप्यति
चुकोपिषति
कृ
करने की इच्छा करना
करोति
चिकीर्षति
क्रीड्
खेलने की इच्छा करना
क्रीडति
चिक्रीडिषति
खन्
खोदने की इच्छा करना
खनति
चिखनिषति
खाद्
खाने की इच्छा करना
खादति
चिखादिषति
गण्
गिनने की इच्छा करना
गणयति
जिगणयिषति-ते
गद्
कहने की इच्छा करना
गदति
जिगदिषति
गम्
जाने की इच्छा करना
गच्छति
जिगमिषति
गृ
निगलने की इच्छा करना
गिरति, गिलति
जिगरिषति, जिगलिषति
ग्रह्
ग्रहण करने की इच्छा करना
गृह्णाति
जिघृक्षति-ते
घ्रा
सूँघने की इच्छा करना
जिघ्रति
जिघ्रासति
चर्
चरने की इच्छा करना
चरति
चिचरिषति
चल्
चलने की इच्छा करना
चलति
चिचलिषति
चि
चयन करने की इच्छा करना
चिनोति
चिचीषति
छिद्
काटने की इच्छा करना
छिनति
चिच्छित्सति-ते
चुर्
चुराने की इच्छा करना
चोरयति
चुचोरयिषति-ते
जन्
पैदा होने की इच्छा करना
जायते
जिजनिषते
जि
जीतने की इच्छा करना
जयति
जिगीषति
ज्ञा
जानने की इच्छा करना
जानाति
जिज्ञासते
तृ
तरने की इच्छा करना
तरति
तितीर्षति
दिव्
चमकने की इच्छा करना
दीव्यति
दिदेविषति
दृश्
देखने की इच्छा करना
पश्यति
दिदृक्षते
जीव
जीने की इच्छा करना
जीवति
जिजीविषति
पच्
पकाने की इच्छा करना
पचति
पिपक्षति-ते
पा
पीने की इच्छा करना
पिबति
पिपासति
बुध्
जानने की इच्छा करना
बुध्यते
बुभुत्सते
भुज्
खाने की इच्छा करना
भुञ्जते
बुभुक्षते
भू
होने की इच्छा करना
भवति
बूभूषति
मुच्
छूटने की इच्छा करना
मुच्यते
मुमुक्षते
मृ
मरने की इच्छा करना
म्रियते
मुमूर्षते
लभ्
पाने की इच्छा करना
लभते
लिप्सते
परीक्षा
द्रष्टव्य:- सभी प्रश्न अनिवार्य हैं और उनके अंक भी दिये गये हैं।
१-
अपनी पुस्तिका में पठ् धातु के सन्नत के सारे रूप लिखें
१०
२-
पठ्-धातु के सन्नत लुङ् लकार के सभी रूपों की सिद्धि दिखाइये
१५
३-
णिजन्तप्रकरण की अपेक्षा सन्नतप्रकरण की विशेषता बताइये
१०
४-
अपने प्रयत्न से गम् धातु के सन्नत के सभी रूप लिखें
१०
५-
धातो: कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा की व्याख्या करें।
५
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
सन्नत-प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ यङन्तप्रक्रिया