इगन्ताञ्झलादिः सन् कित् स्यात्। ऋत इद्धातोः। कर्तुमिच्छति चिकीर्षति।
७०९- इको झल्। इकः पञ्चम्यन्तं, झल् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। रुदविदमुष० से सन् और असंयोगाल्लिट् कित् से कित् की अनुवृत्ति आती है।
इगन्त से परे झलादि सन् कित् होता है।
सामान्यतया सन् कित् नहीं होता किन्तु इगन्त से परे सन् यदि झलादि हो तो उसे इस सूत्र से कित् मान लिया जाता है। यहाँ पर कित् का फल है- सार्वधातुकार्धधातुकयोः से प्राप्त गुण का विडन्ति च से निषेध करना। सन् का सकार तो स्वतः झल् है, पुनः झलादि कहने की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर है- सन् प्रत्यय को सेट् धातुओं से इट् आगम होता है और आनेट् धातुओं से नहीं। जब इट् आगम होता है तो यदागमास्तद्गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते परिभाषा के अनुसार सन् प्रत्यय अजादि बन जाता है और जब इट् आगम नहीं होता तो सन् प्रत्यय झलादि होता है। यह सूत्र जहाँ इट् नहीं होता वहाँ पर झलादि मानकर किद्वद्भाव करता है।
चिकीर्षति। कर्तुमिच्छति। करने की इच्छा करता है। डुकृञ् करणे धातु है। अनुबन्धलोप हो जाने के बाद केवल कृ बचता है। उससे सन् प्रत्यय करने पर कृ+स बना। सन् के आर्धधातुक होने के कारण इट् प्राप्त था किन्तु एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से निषेध हुआ। अञ्झनगमां सनि से कृ को दीर्घ हुआ- कृ+स बना। सन् को आर्धधातुक मान कर सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण प्राप्त था किन्तु इको झल् से सन् को किद्वद्भाव कर दिए जाने के कारण विडन्ति च से निषेध हुआ। दीर्घ हुए कृ के दीर्घ ऋकार को ऋत इद्धातोः से इत्व, रपर करके किर्+स बना। हलि च से उपधाभूत इकार को दीर्घ हुआ- कीर्+स बना। आदेशप्रत्यययोः से सकार को षत्व हुआ, कीर्+ष बना। सन्यडोः से धातु के एकाच कीर् को द्वित्व होकर हलादिशेष और ह्रस्व करके चुत्व कुहोश्चुः से चुत्व करने पर चिकीर्+ष बना। चिकीर्ष की धातुसंज्ञा करके लट्, तिप्, शप्, पररूप करने पर चिकीर्षति सिद्ध हो जाता है। अब आगे सभी पुरुष और सभी वचनों में रूप बना सकते हैं। ध्यान रहे कि कृ धातु उभयपदी है। अतः पूर्ववत्सनः के नियम से आत्मनेपद में भी इसके रूप बनते हैं।
पूर्ववत्सनः इस सूत्र के अनुसार सन् की प्रकृति धातु आत्मनेपदी हो तो आत्मनेपद और परस्मैपदी हो तो परस्मैपद होता है। कृ धातु के उभयपदी होने के कारण सन्नन्त से भी उभयपद होता है।
लट्- चिकीर्षति, चिकीर्षते। लिट्- चिकीर्षाञ्चकार, चिकीर्षाम्बभूव, चिकीर्षामास, चिकीर्षाञ्चक्रे। लुट्- चिकीर्षिता, चिकीर्षितासि, चिकीर्षितासे। लृट्- चिकीर्षिष्यति, चिकीर्षिष्यते। लोट्- चिकीर्षतु, चिकीर्षताम्। लङ्- अचिकीर्षत्, अचिकीर्षत। विधिलिङ्- चिकीर्षत्, चिकीर्षेत। आशीर्लिङ्- चिकीर्ष्यात्, चिकीर्षीष्ट। लुङ्- अचिकीर्षीत्, अचिकीर्षिष्ट। लृङ्- अचिकीर्षिष्यत्, अचिकीर्षिष्यत।