सस्य तः स्यात् सादावार्धधातुके। अत्तुमिच्छति जिघत्सति।
एकाच इति नेट्।
७०७- सः स्यार्धधातुके। सः षष्ठ्यन्तं, सि सप्तम्यन्तम्, आर्धधातुके सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। अच उपसर्गात्तः से तः की अनुवृत्ति आती है।
सकारादि आर्धधातुक के परे होने पर सकार के स्थान पर तकार आदेश होता है।
यह सूत्र वहीं लगता है जहाँ पर पूर्व में सकार ही हो और पर में भी सकार ही हो किन्तु पर सकार आर्धधातुकसंज्ञक हो अर्थात् सकार आदि में स्थित आर्धधातुक परे हो। घस्+स में ऐसी स्थिति में इससे तकार आदेश होता है। इसी प्रकार अन्य स्थलों पर भी यह सूत्र प्रवृत्त होता है। जैसे- वस् धातु के लृट् के वस्+स्यति में भी पूर्व सकार को तकार आदेश होकर वत्स्यति बनता है।
जिघत्सति। अत्तुमिच्छति। अद् से सन् करके धातु के स्थान पर लुङ्सनोर्घस्लृ से घस्लृ आदेश होकर घस्+स बना है। सन् वाला स आर्धधातुक है। घस् यह धातु अनुदात्त एकाच् है। अतः इट् का आगम नहीं होता। अतः सः स्यार्धधातुके से पूर्व सकार के स्थान पर तकार आदेश होकर घत्+स बना। सन् के परे घत् को द्वित्व, हलादिशेष, कुहोश्चुः से कुत्व और अभ्यासे चर्च से जश्त्व होने पर जघत्+स बना। सन्यतः से प्रथम अकार को इत्व होकर जिघत्स बना। इसकी सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा हुई। लट्, तिप्, शप् करके जिघत्स+अति बना। अतो गुणे से पररूप होकर जिघत्सति सिद्ध हुआ। जिघत्सति, जिघत्सतः, जिघत्सन्ति आदि।
लट्- जिघत्सति। लिट्- जिघत्साञ्चकार, जिघत्साम्बभूव, जिघत्सामास। लुट्- जिघत्सिता। लृट्- जिघत्सिस्यति। लोट्- जिघत्सतु। लङ्- अजिघत्सत्। विधिलिङ्- जिघत्सेत्। आशीर्लिङ्- जिघत्स्यात्। लुङ्- अजिघत्सीत्। लृङ्- अजिघत्स्यत्।