सन्नन्तस्य यङन्तस्य च धातोरनभ्यासस्य प्रथमस्यैकाचो द्वे स्तोऽजादेस्तु द्वितीयस्य। सन्यतः। पठितुमिच्छति पिपठिषति। कर्मणः किम्? गमनेन इच्छति। समानकर्तृकात् किम्? शिष्याः पठन्तु इतीच्छति गुरुः। वा ग्रहणाद्वाक्यमपि। लुङ्सनोर्धस्लृ।
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७०६- सन्यङोः। सन् च यङ् च तयोरितरतरयोगद्वन्द्वः सन्यङौ, तयोः सन्यङोः। सन्यङोः षष्ठ्यन्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। एकाचो द्वे प्रथमस्य और अजादेर्द्वितीयस्य का अधिकार आ रहा है।
सन्नन्त और यङन्त धातु के प्रथम एकाच् को द्वित्व होता है, यदि वे अजादि हों तो उनके द्वितीय एकाच् को द्वित्व होता है।
ज्यादातर धातु एकाच् ही मिलते हैं, अतः पूरे धातु को द्वित्व होता है। अनेकाच् धातु मिले और वह हलादि हो तो दो अचों में प्रथम एकाच् को द्वित्व, यदि धातु अजादि है तो द्वितीय एकाच् का द्वित्व होगा।
पठ् से धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा से सन्, अनुबन्धलोप करके स बचा। पठ्+स बना। स की आर्धधातुकसंज्ञा और इट् का आगम करके पठ्+इस बना। सन्यङोः से पठ् को द्वित्व करके पठ्+पठ्+इस बना। अभ्याससंज्ञा और हलादिशेष करके पठ्+इस बना। पठ्+इस् में सन्यतः से अभ्याससंज्ञक प्रथम प के अकार के स्थान पर इकार आदेश करके पठ्+इस बन जाता है। इ से परे सकार के स्थान पर आदेशप्रत्यययोः से षत्व करके पठ्+इष बना, वर्णसम्मेलन हुआ, पिपठिष बना। पिपठिष की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा होकर लट् आदि लकार आते हैं।
पिपठिषति। पठ् धातु से सन्, इट्, द्वित्व, इत्व, षत्व करके पिपठिष की धातुसंज्ञा की गई। उसके बाद लट्, तिप्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप करके पिपठिष+अति बना है। अतो गुणे से पिपठिष के षकारोत्तरवर्ती अकार और शप् के अकार के स्थान पर पररूप होकर एक ही अकार बना- पिपठिषति। अब इसी प्रकार से आगे के रूपों की सिद्धि आप स्वयं करें। सभी लकारों के रूप दिये जा रहे हैं।
लट्- पिपठिषति, पिपठिषतः, पिपठिषन्ति। पिपठिषसि, पिपठिषथः, पिपठिषथ। पिपठिषामि, पिपठिषावः, पिपठिषामः।
लिट् में पिपठिष-धातु के अनेकाच् होने से कास्यनेकाच आम्वक्तव्यो लिटि इस वार्तिक से आम् प्रत्यय करके अतो लोपः से षकारोत्तरवर्ती अकार का लोप करें। इसके
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बाद की प्रक्रिया भावयाञ्चकार की तरह ही होती है। पिपठिषाञ्चकार, पिपठिषाञ्चक्रतुः, पिपठिषाञ्चक्रुः। पिपठिषाञ्चकर्थ, पिपठिषाञ्चक्रथुः, पिपठिषाञ्चक्र। पिपठिषाञ्चकार-पिपठिषाञ्चकर, पिपठिषाञ्चकृव, पिपठिषाञ्चकृम।
लुट्- अतो लोपः से अलोप करके- पिपठिषिता, पिपठिषितारौ, पिपठिषितारः। पिपठिषितासि, पिपठिषितास्थः, पिपठिषितास्थ। पिपठिषितास्मि, पिपठिषितास्वः, पिपठिषितास्मः।
लृट्- पिपठिषिष्यति, पिपठिषिष्यतः, पिपठिषिष्यन्ति। पिपठिषिष्यसि, पिपठिषिष्यथः, पिपठिषिष्यथ। पिपठिषिष्यामि, पिपठिषिष्यावः, पिपठिषिष्यामः।
लोट्- पिपठिषतु-पिपठिषतात्, पिपठिषताम्, पिपठिषन्तु। पिपठिष-पिपठिषतात्, पिपठिषतम्, पिपठिषत। पिपठिषाणि, पिपठिषाव, पिपठिषाम।
लङ्- अपिपठिषत्, अपिपठिषताम्, अपिपठिषन्। अपिपठिषः, अपिपठिषतम्, अपिपठिषत। अपिपठिषम्, अपिपठिषाव, अपिपठिषाम।
विधिलिङ्- पिपठिषेत्, पिपठिषेताम्, पिपठिषेयुः। पिपठिषेः, पिपठिषेतम्, पिपठिषेत। पिपठिषेयम्, पिपठिषेव, पिपठिषेम।
आशीर्लिङ्- पिपठिष्यात्, पिपठिष्यास्ताम्, पिपठिष्यासुः। पिपठिष्याः, पिपठिष्यास्तम्, पिपठिष्यास्त। पिपठिष्यासम्, पिपठिष्यास्व, पिपठिष्यास्म।
लुङ्- अपिपठिषीत्, अपिपठिषिष्टाम्, अपिपठिषिषुः। अपिपठिषीः, अपिपठिषिष्टम्, अपिपठिषिष्ट। अपिपठिषम्, अपिपठिषिषाव, अपिपठिषिषाम।
लृङ्- अपिपठिष्यत्, अपिपठिष्यताम्, अपिपठिष्यन्। अपिपठिष्यः, अपिपठिष्यतम्, अपिपठिष्यत। अपिपठिष्यम्, अपिपठिष्याव, अपिपठिष्याम।
कर्मणः किम्? गमनेन इच्छति। अब प्रश्न करते हैं कि धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा इस सूत्र में कर्मणः क्यों कहा? उत्तर दिया गमनेन इच्छति अर्थात् जाने से वस्तु आदि की इच्छा करता है। इस वाक्य में गम् धातु इष् धातु का कर्म नहीं है, अपितु करण है। अतः समानकर्ता होते हुए भी पठ् धातु से सन् नहीं हुआ।
समानकर्तृकात् किम्? शिष्याः पठन्तु इतीच्छति गुरुः। अब दूसरा प्रश्न करते हैं कि इस सूत्र में समानकर्तृकात् यह शब्द क्यों पढ़ा जाय? उत्तर दिया- शिष्याः पठन्तु इतीच्छति गुरुः अर्थात् शिष्य पढ़ें, ऐसा चाहते हैं गुरु। यहाँ पर पठ् धातु के कर्ता है शिष्य और इष् धातु के कर्ता हैं गुरु। इस लिए भिन्न-भिन्न कर्ता होने अर्थात् समानकर्ता न होने के कारण पठ् से सन् नहीं हुआ।
वा ग्रहणाद्वाक्यमपि। धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा इस सूत्र में वा शब्द का कथन है तो एक पक्ष में वाक्य ही रहेगा अर्थात् पिपठिषति यह सन्-प्रत्ययान्त रूप तो होता ही है साथ ही पठितुमिच्छति यह वाक्य भी बनता है।
अब आगे अद भक्षणे धातु से सन् प्रत्यय की प्रक्रिया बता रहे हैं। अद् से अत्तुमिच्छति विग्रह से सन् होकर जिघत्सति बनता है। सन् होने के बाद लुङ्सनोर्घस्लृ से अद् के स्थान पर घस्लृ आदेश होकर घस्+स बनने के बाद स की आर्धधातुकसंज्ञा करके इट् प्राप्त हुआ किन्तु घस् धातु के अनुदात्त होने के कारण एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से इट् का निषेध हो जाता है और सकार के स्थान पर तकार आदेश करने के लिए अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है।