Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 23
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VṛttiGovind
LSK 705
सन्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा
Aṣṭādhyāyī 3.1.7
Vṛtti Varadarājācārya

इषिकर्मण इषिणैककर्तृकाद्धातोः सन् प्रत्ययो वा स्यादिच्छायाम्।

पठ व्यक्तायां वाचि॥१॥

श्रीधरमुखोल्लासिनी

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब सन्नन्तप्रकरण का आरम्भ होता है। सन्+अन्त=सन्नन्त, सन् अन्त में हो ऐसी धातुओं का प्रकरण। इस प्रकरण में अलग से कोई धातुएँ नहीं होती हैं किन्तु भ्वादि से चुरादि तक की धातुओं से इस प्रकरण में सन् आदि करके कार्य किया जाता है। सन् प्रत्यय करने के बाद उस सन्नन्त की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा की जाती है। उसके बाद लट् आदि लकार होते हैं। यह सन् प्रत्यय इच्छा अर्थ में होता है। जैसे पढ़ने की इच्छा करता है- पिपठिषति। जाने की इच्छा करता है- जिगमिषति। करने की इच्छा करता है- चिकीर्षति।

७०५- धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा। समानः कर्ता यस्य स समानकर्तृकस्तस्मात्। धातोः पञ्चम्यन्तं, कर्मणः पञ्चम्यन्तं, समानकर्तृकाद् पञ्चम्यन्तम्, इच्छायां सप्तम्यन्तं, वा अव्ययपदम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में गुप्तिज्किद्ध्यः सन् से सन् की अनुवृत्ति आती है।

जो इच्छार्थक इष्-धातु का कर्म हो और इष्-धातु के साथ समानकर्तृक भी हो उस धातु से इच्छा अर्थ में विकल्प से सन् प्रत्यय होता है।

किसी भी धातु से सन् प्रत्यय तब होता है, जब यदि वह धातु दो शर्तों को पूरा करता हो तो। जैसे इष्-धातु (चाहना) का कर्म हो, और इष् धातु का जो कर्ता, उस क्रिया का भी वही कर्ता हो। जैसे- रामः पठितुमिच्छति इति पिपठिषति। राम पढ़ना चाहता है। यहाँ पठ् धातु से इच्छा अर्थ में सन्-प्रत्यय हुआ है। पठ् धातु यहाँ अर्थरूप से इष् का ही कर्म है तथा इष् के साथ समानकर्तृक भी है अर्थात् इष् का जो कर्ता है, वही कर्ता पठ् का है।

सन् में नकार की इत्संज्ञा होती है, स अवशिष्ट रहता है। इस स की आर्थधातुकसंज्ञा होती है और यदि धातु सेट् है तो इसको इट् आगम होता है, अनिट् हो तो नहीं। ऐसी सन्नन्त धातुओं से परे आर्थधातुक प्रत्यय हो तो स के अकार का अतो लोपः से लोप हो जाता है। शप् आदि के परे होने पर तो अतो गुणे से पररूप हो जाता है।

सन्नन्त का विग्रह तुमुन् प्रत्ययान्त के साथ इच्छति लगाकर किया जाता है। जैसे- पठितुम् इच्छति- पिपठिषति। भवितुम् इच्छति- बुभूषति।

पठ व्यक्तायां वाचि। पठ-धातु व्यक्त वाणी बोलना अर्थात् पढ़ना, इस अर्थ में है। यह भ्रादिगणीय धातु है। केवल परस्मैपदी है। सन्नन्त होने के बाद भी पूर्वधातु यदि आत्मनेपदी है तो सन्नन्त से भी आत्मनेपद ही होगा और यदि पूर्व अवस्था में परस्मैपदी है तो सन्नन्त से भी परस्मैपद ही होगा। इसके लिए पाणिनीय सूत्र हैं- पूर्ववत्सनः।