Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 22
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VṛttiGovind
LSK 704
ह्रस्वविधायकं विधिसूत्रम्
मितां ह्रस्वः
Aṣṭādhyāyī 6.4.92
Vṛtti Varadarājācārya

घटादीनां ज्ञापादीनां चोपधाया ह्रस्वः स्याण्णौ। घटयति।

ज्ञप ज्ञाने ज्ञापने च॥३॥ ज्ञपयति। अजिज्ञपत्॥

इति ण्यन्तप्रक्रिया॥२२॥

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७०४- मितां ह्रस्वः। मितां षष्ठ्यन्तं, ह्रस्वः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। ऊदुपधाया गोहः से उपधायाः और दोषो णौ से णौ की अनुवृत्ति आती है।

णि के परे होने पर मित् अर्थात् घटादि धातुओं और ज्ञपादि धातुओं के उपधा को ह्रस्व होता है।

धातुपाठ में कुछ निसर्गतः अमित् धातुओं को मित् अतिदेश किया गया है। ऐसे धातु हैं घटादि धातु और चुरादि के ज्ञप् आदि धातु। इनमें स्वतः मित् नहीं हुआ है किन्तु मितां ह्रस्वः आदि सूत्रों की प्रवृत्ति के लिए मिद्वद्भाव किया गया है।

घाट्+इ में इस सूत्र से उपधाभूत आकार को ह्रस्व होकर घट्+इ बन जाता है जिससे घटयति आदि रूप बनते हैं।

लट्- घटयति, घटयते। लिट्- घटयाञ्चकार, घटयाञ्चक्रे, घटयाम्बभूव, घटयामास। लुट्- घटयिता, घटयितासि, घटयितासे। लृट्- घटयिष्यति, घटयिष्यते। लोट्- घटयतु-घटयतात्, घटयताम्। लङ्- अघटयत्, अघटयत। विधिलिङ्- घटयेत्, घटयेत। आशीर्लिङ्- घट्यात्, घटयिषीष्ट। लुङ्- अजीघटत्, अजीघटत। लृङ्- अघटयिष्यत्, अघटयिष्यत।

ज्ञप ज्ञाने ज्ञापने च। यह धातु जानना और जनाना अर्थ में है। अकार का लोप होता है, णिच् के बाद उपधा की वृद्धि होती है और मित् मान करके मितां ह्रस्वः से ह्रस्व होकर ज्ञपि की धातुसंज्ञा होती है जिससे ज्ञपयति, ज्ञपयते आदि रूप बनते हैं। लुङ् में च्लि को चङ्, द्वित्व, णिलोप, सन्वद्भाव होकर सन्यतः से इत्व करके अजिज्ञपत् सिद्ध होता है। स्मरण रहे कि अभ्यास में लघु न होने से दीर्घो लघोः से दीर्घ नहीं होता।

लट्- ज्ञपयति, ज्ञपयते। लिट्- ज्ञपयाञ्चकार, ज्ञपयाञ्चक्रे, ज्ञपयाम्बभूव, ज्ञपयामास। लुट्- ज्ञपयिता, ज्ञपयितासि, ज्ञपयितासे। लृट्- ज्ञपयिष्यति, ज्ञपयिष्यते। लोट्- ज्ञपयतु-ज्ञपयतात्, ज्ञपयताम्। लङ्- अज्ञपयत्, अज्ञपयत। विधिलिङ्- ज्ञपयेत्, ज्ञपयेत। आशीर्लिङ्- ज्ञप्यात्, ज्ञपयिषीष्ट। लुङ्- अजिज्ञपत्, अजिज्ञपत। लृङ्- अज्ञपयिष्यत्, अज्ञपयिष्यत।

अब एक प्रश्न उठता है कि चुरादि में णिच् होने के बाद उस धातु से प्रेरणा आदि अर्थ के लिए ण्यन्तप्रक्रिया का णिच् करना पड़ेगा ही। ऐसी स्थिति में दोनों णिचों का श्रवण किस तरह से होगा या क्या रूप बनेंगे? चुरादिगणीय धातुओं से जब हेतुमति च से णिच् करते हैं तो तब वहाँ पर दो णिच् उपस्थित होते ही हैं, एक स्वार्थ णिच् और एक प्रयोजकव्यापार वाला णिच्। यहाँ पर स्वार्थ णिच् का णेरनिटि से लोप करके एक ही णिच् रह जाता है और रूप चुरादिगण जैसा ही बनता है अर्थात् हेतुमणिच् के रहने पर भी इसकी रूपमाला और प्रक्रिया चुरादिगण की तरह ही होती है, कुछ भी अन्तर नहीं होता।

णिजन्त में ऐसे बहुत से धातुओं के रूप आप स्वयं बना सकते हैं। कुछ धातुएँ, उनके अर्थ एवं लट् तथा लुङ् लकार के प्रथमपुरुष एकवचन के रूप दिये जा रहे हैं। शेष रूपों को बनाना आपका काम है। कुछ धातु ऐसे हैं जिनके अकार के स्थान पर सन्यतः से इत्व होकर दीर्घो लघोः से दीर्घ होता है। जहाँ धातु में पहले से ही दीर्घ है, वहाँ पर

.....

णौ चङ्युपधाया ह्रस्वः से ह्रस्व होकर तब इत्व, उसके बाद फिर दीर्घ होता है। आकारान्त धातुओं से तो णिच् के परे होने पर पुक् आगम होता ही है। णिच् होने के बाद धातुओं का अर्थ बदल जाता है। जैसे पढ़ना अर्थ है तो यहाँ पर पढ़ाना अर्थ हो जायेगा। पुनश्च आपको स्मरण कराते हैं कि जो धातुएँ चुरादि आदि में णिजन्त हुए हैं उनके णिजन्त प्रकरण में लगभग समान ही रूप होते हैं। जैसे चुरादि में चोरयति तो णिजन्त में भी चोरयति। क्योंकि दोनों प्रकरणों में णिच् ही हो रहा है।

धातु

ण्यन्तार्थ

सामान्य-रूप

णिजन्त-लट्

णिजन्त लुङ्

अद्

खिलाना

अत्ति

आदयति

आदिदत्

कुप्

कुपित करना

कुप्यति

कोपयति

अचूकुपत्

कृ

कराना

करेति

कारयति

अचीकरत्

क्री

खरीदवाना

क्रीणाति

क्रापयति

अचीक्रपत्

क्रीड्

खेलाना

क्रीडति

क्रीडयति

अचिक्रीडत्

खाद्

खिलाना

खादति

खादयति

अचखादत्

गम्

भिजवाना

गच्छति

गमयति

अजीगमत्

ग्रह्

ग्रहण करवाना

गृह्णाति

ग्राहयति

अजिग्रहत्

चल्

चलाना

चलति

चालयति

अचीचलत्

जन्

पैदा करना

जायते

जनयति

अजिज्ञपत्

जप्

जप कराना

जपति

जापयति

अजीजपत्

जागृ

जगाना

जागर्ति

जागरयति

अजजागरत्

जि

जीताना

जयते

जाययति

अजीजयत्

जीव्

जिलाना

जीवति

जीवयति

अजिजीवत्

ज्ञा

बोध कराना

जानाति

ज्ञापयति

अजिज्ञपत्

तप्

तपाना

तपति

तापयति

अतीतपत्

तुष्

प्रसन्न करना

तुष्यति

तोषयति

अतृतुषत्

त्यज्

छुड़ाना

त्यजति

त्याजयति

अतित्यजत्

दह्

जलाना

दहति

दाहयति

अदीदहत्

दा

दिलवाना

ददाति

दापयति

अदीदपत्

दृश्

दिखाना

पश्यति

दर्शयति

अदीदृशत्

ध्यै

ध्यान करवाना

ध्यायति

ध्यापयति

अदिध्यपत्

नम्

झुकाना

नमति

नामयति

अनीनमत्

नश्

नष्ट करना

नश्यति

नाशयति

अनीनशत्

पच्

पकवाना

पचति

पाचयति

अपीपचत्

पठ्

पढ़ाना

पठति

पाठयति

अपीपठत्

पा

पिलाना

पिवति

पाययति

अपीपिवत्

पुष्

पुष्ट करना

पुष्यति

पोषयति

अपूपुषत्

बुध्

बोध कराना

बुध्यति

बोधयति

अबूबुधत्

भाष्

बुलवाना

भाषते

भाषयति

अबीभपत्

भुज्

खिलाना

भुनक्ति

भोजयति

अबूभुजत्

मिल्

मिलाना

मिलति

मेलयति

अमीमिलत्

मुद्

प्रसन्न करना

मोदते

मोदयति

अमूमुदत्

मुह्

मुग्ध करना

मोहते

मोहयति

अमूमुहत्

यज्

यज्ञ करवाना

यजति

याजयति

अयीयजत्

युज्

मिलवाना

योजते

योजयति

अयूयुजत्

युध्

युद्ध करना

युध्यति

योधयति

अयूयुधत्

रक्ष्

रक्षा करना

रक्षति

रक्षयति

अरीरक्षत्

रम्

रमण करना

रमते

रमयति

अरीरमत्

रुच्

पसन्द करना

रोचते

रोचयति

अरूरुचत्

रुद्

रुलाना

रोदिति

रोदयति

अरूरुदत्

लभ्

प्राप्त करना

लभते

लम्भयति

अललम्भत्

लस्ज्

लज्जित करना

लज्जते

लज्जयति

अललज्जत्

लिख्

लिखाना

लिखति

लेखयति

अलीलिखत्

लुभ्

लुभाना

लोभते

लोभयति

अलूलुभत्

वच्

कहलवाना

वक्ति

वाचयति

अवीवचत्

वस्

वास करना

वसति

वासयति

अवीवसत्

वृध्

बढ़ाना

वर्धते

वर्धयति

अवीवृधत्

शी

सुलाना

शेते

शाययति

अशीशयत्

शुच्

शोक करना

शोचति

शोचयति

अशूशुचत्

शुध्

शुद्ध करना

शोधयति

शोधयति

अशूशुधत्

शुष्

सूखाना

शुष्यति

शोषयति

अशूशुषत्

श्रु

सुनाना

श्रृणोति

श्रावयति

अशुश्रवत्

सिच्

सिचवाना

सिञ्चति

सेचयति

असीषिचत्

स्ना

स्नान करना

स्नाति

स्नापयति

असिस्नपत्

स्मृ

स्मरण करना

स्मरति

स्मारयति

अमिस्मरत्

स्वप्

सुलाना

स्वपिति

स्वापयति

असूषुपत्

हन्

मरवाना

हन्ति

घातयति

अजीघतत्

हस्

हसना

हसति

हासयति

अजीहसत्

ह्

हरण करना

हरति

हारयति

अजीहरत्

परीक्षा

द्रष्टव्य:- सभी प्रश्न अनिवार्य हैं और उनके अंक भी दिये गये हैं।

१-

अपनी पुस्तिका में भू और स्था धातु के णिजन्त के सारे रूप लिखें

२०

२-

भू-धातु के णिजन्त लुङ् लकार के सभी रूपों की सिद्धि दिखाइये

१५

३-

अन्य धातुप्रकरणों की अपेक्षा णिजन्तप्रकरण की विशेषता बताइये

१५

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

ण्यन्त-प्रक्रिया पूरी हुई।

अथ सन्नन्तप्रक्रिया