Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 22
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VṛttiGovind
LSK 703
इदादेशविधायकं विधिसूत्रम्
तिष्ठतेरित्
Aṣṭādhyāyī 7.4.5
Vṛtti Varadarājācārya

उपधाया इदादेशः स्याच्चङ्परे णौ। अतिष्ठिपत्।

घट चेष्टायाम्॥२॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७०३-तिष्ठतेरित्। तिष्ठतेः षष्ठ्यन्तम्, इत् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। णौ चङ्युपधाया ह्रस्वः से णौ, चङि और उपधायाः की अनुवृत्ति आती है।

चङ्-परक णि परे हो तो स्था-धातु की उपधा के स्थान पर ह्रस्व इकार आदेश होता है।

अतिष्ठिपत्। स्थापि इस णिजन्त धातु से लुङ्, तिप्, अट्, च्लि, चङ् तथा णि का लोप करने पर अस्थाप्+अत् बना। अब यहाँ चङ्-परक णि के परे होने से स्थाप् के उपधाभूत आकार के स्थान पर तिष्ठतेरित् से ह्रस्व इकार आदेश हुआ, अस्थिप्+अत् बना। चङि से स्थिप् को द्वित्व, स्थिप् स्थिप् में हलादिशेष होने पर शर्पूर्वाः खयः (यह सूत्र हलादि शेष में यदि शर् पहले हो तो खय् को शेष और अन्य हलों का लोप करता है। यह हलादि शेषः बाधक है।) से सकार और पकार का लोप हुआ, थि बचा। थिस्थिप् बना। अभ्यासे चर्च से चर्त्व होकर ति हुआ, अतिस्थिप्+अत् बना। ति के इकार से परे सकार के स्थान पर आदेशप्रत्यययोः से षत्व हुआ और पकार से परे थकार को ष्टुना ष्टुः से ष्टुत्व हुआ- अतिष्ठिप्+अत् हुआ, वर्णसम्मेलन हुआ- अतिष्ठिपत् सिद्ध हुआ।

परस्मैपद- अतिष्ठिपत्, अतिष्ठिपताम्, अतिष्ठिपन्। अतिष्ठिपः, अतिष्ठिपतम्, अतिष्ठिपत। अतिष्ठिपम्, अतिष्ठिपाव, अतिष्ठिपाम। आत्मनेपद- अतिष्ठिपत, अतिष्ठिपेताम्, अतिष्ठिपन्त। अतिष्ठिपथाः, अतिष्ठिपेथाम्, अतिष्ठिपध्वम्। अतिष्ठिपे, अतिष्ठिपावहि, अतिष्ठिपामहि।

लृङ्- परस्मैपद- अस्थापयिष्यत्, अस्थापयिष्यताम्, अस्थापयिष्यन्। अस्थापयिष्यः, अस्थापयिष्यतम्, अस्थापयिष्यत। अस्थापयिष्यम्, अस्थापयिष्याव, अस्थापयिष्याम। आत्मनेपद में- अस्थापयिष्यत, अस्थापयिष्येताम्, अस्थापयिष्यन्त। अस्थापयिष्यथाः, अस्थापयिष्येथाम्, अस्थापयिष्यध्वम्। अस्थापयिष्ये, अस्थापयिष्यावहि, अस्थापयिष्यामहि।

घट चेष्टायाम्। घट धातु चेष्टा करना, प्रयत्न करना अर्थ में है। यह धातु भ्वादिगण में अनुदात्तेत् के रूप में पठित होने से आत्मनेपदी है। वहाँ घटते, जघटे आदि रूप बनते हैं। यहाँ पर णिच् होने के बाद णिचश्च की प्रवृत्ति के कारण उभयपदी बन जाता है। इस प्रकरण में प्रयोजक व्यापार, प्रेरणा आदि अर्थ के लिए हेतुमति च से णिच् होकर अत उपधायाः से वृद्धि होकर घाट्+इ बनता है। इस स्थिति में ह्रस्व करने के लिए अग्रिम सूत्र है।