स्थापयति।
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७०२-अर्ति-ह्री-ब्ली-री-क्नूयी-क्ष्माय्यातां पुङ् णौ। अतिश्च ह्रीश्च ब्लीश्च रीश्च क्नूयीश्च क्ष्मायीश्च आच्च तेषामितरेतरद्वन्द्व अर्तिह्रीब्लीरीक्नूयीक्ष्माय्यातस्तेषाम्। इस सूत्र में अङ्गस्य का अधिकार है।
ऋ, ह्री, ब्ली, री, क्नूयी, क्ष्मायी और आकारान्त धातुओं को पुक् का आगम होता है णि के परे होने पर।
पुक् में ठकार और ककार कि इत्संज्ञा होती है। प् शेष रहता है। कित् होने के कारण आद्यन्तौ टकितौ के नियम से धातु के अन्त में बैठता है जिससे ऋ+इ से अर्पि, ह्री+इ से ह्रेपि, ब्ली+इ से ब्लेपि, री+इ से रेपि, क्नू+इ से क्नोपि, क्ष्मा+इ से क्ष्मापि और आकारान्त स्था+इ से स्थापि, दा+इ से दापि, धा+इ से धापि, ज्ञा+इ से ज्ञापि बन जाते हैं। आगे लकार आदि करके अर्पयति, ह्रेपयति, ब्लेपयति, रेपयति, क्नोपयति, क्ष्मापयति, स्थापयति, दापयति, धापयति और ज्ञापयति बना लिए जाते हैं।
स्थापयति। छा से स्था बन जाने के बाद हेतुमचि च से प्रेरणार्थ में णिच् होकर अनुबन्धलोप होने के बाद स्था+इ बना। अर्ति-ह्री-ब्ली-री-क्नूयी-क्ष्माय्यातां पुङ् णौ से स्था को पुक् का आगम हुआ। अनुबन्धलोप होने के बाद प् बचा। कित् होने के कारण स्था के अन्त में बैठा। स्थाप्+इ बना। वर्णसम्मेलन होने पर स्थापि बना। स्थापि की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा होकर लट् लकार, तिप्, शप् करके स्थापि+अ+ति बना। इकार को गुण, अय् आदेश करके स्थाप्+अय्+अति बना। वर्णसम्मेलन होने पर स्थापयति सिद्ध हुआ। अब इसी प्रकार दोनों पदों के सभी लकारों में रूप बनाना चाहिए।
लट् परस्मैपद में- स्थापयति, स्थापयतः, स्थापयन्ति। स्थापयसि, स्थापयथः, स्थापयथ। स्थापयामि, स्थापयावः, स्थापयामः। आत्मनेपद में- स्थापयते, स्थापयेते, स्थापयन्ते। स्थापयसे, स्थापयेथे, स्थापयध्वे। स्थापये, स्थापयावहे, स्थापयामहे।
अब आगे के लकारों के प्रथमपुरुष एकवचन के रूप दिये जा रहे हैं, शेष रूपों को आप स्वयं जानने की चेष्टा करें।
लिट्- स्थापयाञ्चकार-स्थापयाञ्चक्रे, स्थापयाम्बभूव, स्थापयामास। लुट्- स्थापयिता,
स्थापयितासि-स्थापयितासे। लृट्- स्थापयिष्यति-स्थापयिष्यते। लोट्- स्थापयतु-स्थापयताम्। लङ्- अस्थापयत्-अस्थापयत। विधिलिङ्- स्थापयेत्-स्थापयेत। आशीर्लिङ्- स्थाप्यात्-स्थापयिषीष्ट।