सनि परे यदङ्गं तदवयवाभ्यासोकारस्य इत् स्यात् पवर्गयण्जकारेष्ववर्णपरेषु
परतः। अबीभवत्। ष्ठा गतिनिवृत्तौ॥१॥
५११- ओः पुयण्यपरे। पुश्च, यण्च, ज् च तेषां समाहारद्वन्द्वः पुयण्ज्, तस्मिन् पुयण्जि।
अः परो यस्मात्, स अपरस्तस्मिन् अपरे। ओः षष्ठ्यन्तं, पुयण्जि सप्तम्यन्तम्, अपरे सप्तम्यन्तं,
त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य, भृजामित् से इत् और
सन्यतः से सनि की अनुवृत्ति आती है।
सन् परे होने पर जो अङ्ग, उसके अवयव अभ्यास के उकार के स्थान पर
इकार आदेश होता है, यदि पवर्ग, यण्, जकार में से कोई परे हो किन्तु इनसे भी परे
अकार होना चाहिए।
परिभाषा- णिच्यच आदेशो न द्वित्वे कर्तव्ये। द्वित्व करना हो तो णिच् को
मानकर अच् के स्थान पर आदेश नहीं करना चाहिए। इस परिभाषा के बल पर भू से
हेतुमति च द्वारा णिच् होने के बाद लुङ्-लकार में द्वित्व की कर्तव्यता में भू के स्थान पर
वृद्धिरूपी अचादेश नहीं होता। अत' भू+इ इसी अवस्था में सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा
होकर लुङ्, च्लि, चङ् आदि होने पर चङि से द्वित्व हो जाता है।
अबीभवत्। भू+इ से लुङ्, अट् आगम, तिप्, करके अभू+इ+त् बना। च्लि
करके उसके स्थान पर सिच् आदेश प्राप्त था, उसको बाधकर णिश्रिद्रुसुभ्यः कर्तरि चङ्
से प्यन्त-धातु मानकर च्लि के स्थान पर चङ् आदेश हुआ। चकार और ङकार की
इत्संज्ञा और लोप होने के बाद अ बचा। अभू+इ+अ+त् बना। णिच्यच आदेशो न द्वित्वे
कर्तव्ये इस परिभाषा की सहायता से पहले चङि सूत्र से भू को द्वित्व हुआ, उसकी
अभ्याससंज्ञा ह्रस्वः से प्रथम भू को ह्रस्व हुआ और अभ्यासे चर्च से जश्त्व होकर बु हुआ,
अबु+भू+इ+अत् बना। दीर्घ आदि के होने के बाद पहले निषिद्ध भू की अचो ज्णिति से
वृद्धि हो गई तो भू के स्थान पर भौ बन गया। आव् आदेश होकर अबु+भाव्+इ+अत्
बना। अब णौ चङ्युपधाया ह्रस्वः से उपधाभूत भाव् के आकार को ह्रस्व हुआ।
अबु+भव्+इ+अत् बना। णेरनिटि से णिच् वाले इकार का लोप हुआ। अबु+भव्+अत्
बना। सन्वल्लघुनि चङ्परेऽनग्लोपे से अभ्यास बु के लिए सन्वद्भाव अर्थात् सन् के परे
होने पर जो कार्य हो सकते हैं, वे कार्य हो जायें ऐसा अतिदेश कर दिया। सन्वद्भाव होने
के बाद अभ्यास बु को ओः पुयण्यपरे से इत् अर्थात् ह्रस्व इकार आदेश हुआ-
अबि+भव्+अत् बना। दीर्घो लघोः से बि के इकार को दीर्घ हुआ, अबी+भव्+अत् बना।
वर्णसम्मेलन हुआ- अबीभवत्। यही प्रक्रिया परस्मैपद और आत्मनेपद दोनों जगह समझनी
चाहिए।
लुङ् परस्मैपद में- अबीभवत्, अबीभवताम्, अबीभवन्। अबीभवः, अबीभवतम्,
अबीभवत। अबीभवम्, अबीभवाव, अबीभवाम। आत्मनेपद में- अबीभवत, अबीभवेताम्,
अबीभवन्त। अबीभवथाः, अबीभवेथाम्, अबीभवध्वम्। अबीभवे, अबीभवावहि, अबीभवामहि।
लृङ् परस्मैपद में- अभावयिष्यत्, अभावयिष्यताम्, अभावयिष्यन्।
अभावयिष्यः, अभावयिष्यतम्, अभावयिष्यत। अभावयिष्यम्, अभावयिष्याव, अभावयिष्याम।
आत्मनेपद में- अभावयिष्यत, अभावयिष्येताम्, अभावयिष्यन्त। अभावयिष्यथाः,
अभावयिष्येथाम्, अभावयिष्यध्वम्। अभावयिष्ये, अभावयिष्यावहि, अभावयिष्यामहि।
छा गतिनिवृत्तौ आदि धातुओं से भी णिजन्त में रूप बनाते हैं। छा धातु गति की निवृत्ति अर्थात् ठहरने अर्थ में है। यह भ्वादिगण का परस्मैपदी धातु है। धात्वादेः षः सः से षकार के स्थान पर सकार आदेश हुआ। षकार के कारण ही थकार जो है, वह ठकार बन गया था, जब षकार ही सकार में आ गया तो ठकार भी अपने पुराने रूप थकार में आ जाता है। निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः। इस तरह छा धातु स्था में बदल गया। भ्वादि में पाघ्राध्मास्थाम्ना० से तिष्ठ आदेश होकर तिष्ठति आदि रूप बनते हैं। अब णिजन्तप्रकरण में हेतुमति च से णिच् होने के बाद अग्रिम सूत्र अर्ति-ह्री-ब्ली-री-क्नूयी-क्ष्माय्यातां पुङ् णौ से पुक् का आगम होकर स्थापयति बनता है। तिष्ठति-ठहरता है और स्थापयति-ठहरवाता है, रूकवाता है।