Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 22
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VṛttiGovind
LSK 699
हेतु-कर्तृसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
तत्प्रयोजको हेतुश्च
Aṣṭādhyāyī 1.4.55
Vṛtti Varadarājācārya

कर्तुः प्रयोजको हेतुसंज्ञः कर्तृसंज्ञश्च स्यात्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६९९- तत्प्रयोजको हेतुश्च। तस्य (कर्तुः) प्रयोजकः(प्रवर्तयिता) तत्प्रयोजकः। तत्प्रयोजकः प्रथमान्तं, हेतुः प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में स्वतन्त्रः कर्ता से कर्ता की अनुवृत्ति आती है।

कर्ता के प्रयोजक की हेतुसंज्ञा और कर्तृसंज्ञा होती हैं।

प्रेरक की दोनों संज्ञाएँ होती हैं। जैसे राम पढ़ता है यह सामान्य वाक्य है। इसको प्रेरणार्थक में बनाया जाय तो श्याम राम को पढ़ाता है, ऐसा वाक्य बनेगा। राम जो पहले के वाक्य में कर्ता है, वह इस वाक्य में कर्म बना हुआ है। पढ़ने का कार्य राम कर रहा है और पढ़ाने का कार्य श्याम कर रहा है। अतः श्याम प्रेरक होने से कर्ता भी बन गया अर्थात् कर्तृसंज्ञक हो गया। श्याम राम को पढ़ाने में हेतु भी है, अतः वह हेतुसंज्ञक भी हो जाता है। तात्पर्य यह है कि जहाँ प्रेरणार्थक-ण्यन्त धातु होती है वहाँ दो कर्ता होते हैं- प्रयोज्य कर्ता और प्रयोजक कर्ता। प्रयोज्य कर्ता वह है जो प्रेरक के द्वारा किसी क्रिया के करने में प्रेरित होता हो। जैसे- रामः पठति में पठन-क्रिया करने वाला राम है। अतः वह पठन-क्रिया में स्वतन्त्ररूप से विवक्षित होने से कर्ता है और जब ऐसे पढ़ते हुए राम को पढ़ने के लिए (ज्ञान बढ़ाने के लिए) जो सहायता करता है, वह प्रयोजक (प्रेरक) कर्ता कहलाता है। जैसे- पठन्तं रामं (पठितुम्) प्रेरयति, पाठयति श्यामः। पढ़ते हुए राम को पढ़ने के लिए प्रेरणा देता है श्याम। इस वाक्य में प्रेरक, सहायक हुआ श्याम। अतः इस इस प्रयोजक, प्रेरक, सहायक श्याम की कर्तृसंज्ञा और हेतुसंज्ञा दोनों ही होती हैं। इसलिए श्याम प्रयोजक कर्ता कहलाता है और प्रयोजक की प्रेरणा से पढ़ने वाला राम प्रयोज्य कर्ता कहलाता है।