क्रियायां स्वातन्त्र्येण विविक्षितोऽर्थः कर्ता स्यात्।
अब तिङन्त में णिजन्त अर्थात् ण्यन्तप्रकरण आरम्भ होता है। इस प्रकरण में अलग से कोई धातु नहीं हैं। भ्वादि से लेकर चुरादि तक के दशगणीय धातुओं से ही इस प्रकरण में णिच् होता है। उन धातुओं से प्रेरणा अर्थात् कराना अर्थ में णिच् किया जाता है। जैसे हिन्दी आदि भाषा में पढ़ने से पढ़ाना, करने से कराना, लिखने से लिखाना, खाने से खिलाना, देखने से दिखाना आदि क्रियाएँ बनती हैं, उसी प्रकार से संस्कृत के धातुओं से भी ऐसी ही अर्थों के लिए णिच् प्रत्यय करके क्रमशः पठति से पाठयति, करोति से कारयति, लिखति से लेखयति, खादति से खादयति, पश्यति से दर्शयति आदि बना लिया जाता है। जैसे पठ् धातु का अर्थ पढ़ना है, णिच् करके पाठि बनाने के बाद इसका अर्थ पढ़ाना हो जाता है। आइये, प्रेरणार्थक ण्यन्त अर्थात् णिजन्त प्रकरण को समझते हैं।
६९८- स्वतन्त्रः कर्ता। स्वतन्त्रः प्रथमान्तं, कर्ता प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। कारके का अधिकार चल रहा है।
क्रिया में स्वतन्त्र रूप से विवक्षित कारक कर्तृ( कर्ता )संज्ञक होता है।
वाक्य में कर्ता, कर्म, क्रिया आदि होते हैं। वाक्य में जो प्रधान होता है या क्रिया की सिद्धि के लिए जिसकी नितान्त अनिवार्यता होती है, जो वाक्य में प्रधानतया अवस्थित रहता है, जिसके विना क्रिया हो ही नहीं पाती है, ऐसे कारक की कर्तृसंज्ञा( कर्ता-संज्ञा ) इस सूत्र से की जाती है। कर्ता ही क्रिया का जनक होता है। कर्ता के अनुसार ही क्रिया में लिङ्ग, संख्या आदि का निर्धारण होता है। जैसे राम पढ़ता है इस वाक्य में क्रिया है- पढ़ता है, इस क्रिया की सिद्धि में राम की अनिवार्य भूमिका है, उसके विना क्रिया की सिद्धि हो ही नहीं सकती। अतः राम को कर्ता माना गया।