गणयतेरभ्यासस्य ई स्याच्चङ् परे णौ चादत्। अजीगणत्, अजगणत्।
इति चुरादयः॥२१॥
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६९७- ई च गणः। ई लुप्तप्रथमाकं पदं, च अव्ययपदं, गणः षष्ठ्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य और सन्वल्लघूनि चङ्परेऽनग्लोपे से चङ्परे की अनुवृत्ति आती है। चङ् परे हो ऐसा णि ही मिल सकता है, अतः णौ का अध्याहार किया जाता है।
चङ् परे हो ऐसे णि के परे होने पर गण धातु के अभ्यास को ईकार आदेश होता है, सूत्र में चकार पढ़ा गया है, इससे अत् आदेश भी हो सकता है अथवा अकार ही रह जाता है।
इस तरह से इस सूत्र से एक पक्ष में ईकार और एक पक्ष में अकार हो जाते हैं।
अजीगणत्, अजगणत्। गणि से लृङ्, तिप्, अडागम, च्लि, उसके स्थान पर प्राप्त सिच् को बाधकर ण्यन्त मानकर णिश्रिद्रुमुभ्यः कर्तरि चङ् से चङ्, णिलोप, द्वित्व तथा अभ्यास को चुत्व करके अजगण्+अत् बना है। ई च गणः से अभ्याससंज्ञक जकारोत्तरवर्ती अकार को ईकार आदेश करने पर अजीगण्+अत् बना। वर्णसम्मेलन करके अजीगणत् सिद्ध हुआ। अकार होने के पक्ष में अजगण्+अत् हैं। वर्णसम्मेलन, अजगणत्। इसी तरह आत्मनेपद में भी अजीगणत्, अजगणत् ऐसे रूप हो जाते हैं।
यहाँ पर सभी लकारों के प्रथमपुरुष के एकवचन के ही रूप दिये जा रहे हैं। आप सभी पुरुषों के तीनों वचनों में रूप बना लें, क्योंकि सरल ही हैं।
लट्- गणयति, गणयते। लिट्- गणयाञ्चकार, गणयाम्बभूब, गणयामास। लुट्- गणयिता, गणयितासि, गणयितासे। लृट्- गणयिष्यति, गणयिष्यते। लोट्- गणयतु-गणयतात्, गणयताम्। लङ्- अगणयत्, अगणयत। विधिलिङ्- गणयेत्, गणयेत। आशीर्लिङ्- अतो लोपः से अकार का और णेरनिटि से णि का लोप करके गणयात्। आत्मनेपद में गणयिषीष्ट बनता है। लृङ् में णि को मान कर अकार का लोप हुआ है। अतः अग्लोपी
है। फलतः सन्वल्लघूनि चङ्परेऽनग्लोपे से सन्वद्भाव और दीर्घ नहीं हुए। चङ् तो होगा ही, जिससे अजगणत्, अजगणत आदि रूप बन जाते हैं। लुङ्- अगणयिष्यत्, अगणयिष्यत।
चुरादि में ऐसे बहुत से धातु हैं, जिनके रूप आप स्वयं बना सकते हैं। कुछ धातुओं के अर्थ एवं लट्, लुङ् लकार के प्रथमपुरुष एकवचन के रूप दिये जा रहे हैं। शेष रूपों को बनाना आपका काम है। कुछ धातु ऐसे हैं जिनके अकार के स्थान पर सन्यतः से इत्व होकर दीर्घो लघोः से दीर्घ होता है।
धातु
अर्थ
लट्
लुङ्
भक्ष अदने
भक्षण करना
भक्षयति-भक्षयते
अबभक्षयत्-अबभक्षयत
तड आघाते
पीटना
ताडयति-ताडयते
अतीतडत्-अतीतडत
तुल उन्माने
तोलना
तोलयति-तोलयते
अतूतुलत्-अतूतुलत
पूज पूजायाम्
पूजा करना
पूजयति-पूजयते
अपूपुजत्-अपूपुजत
क्षल शौचकर्मणि
धोना
क्षालयति-क्षालयते
अचिक्षलत्-अचिक्षलत
चिति स्मृत्याम्
चिन्तन करना
चिन्तयति-चिन्तयते
अचिचिन्तत्-अचिचिन्तत
पाल रक्षणे
पालन करना
पालयति-पालयते
अपीपलत्-अपीपलत
वृजी वर्जने
छोड़ना
वर्जयति-वर्जयते
अवीवृजत्-अवीवृजत
लक्ष दर्शनाङ्कनयोः,
देखना, चिह्नित करना
लक्षयति-लक्षयते
अललक्षत्-अललक्षत
रच प्रतियत्ने
रचना करना
रचयति-रचयते
अररचत्- अररचत
स्पृह ईप्सायाम्
चाहना
स्पृहयति-स्पृहयते
अपस्पृहत्-अपस्पृहत
दण्ड दण्डनिपातने
दण्ड देना
दण्डयति-दण्डयते
अददण्डत्-अददण्डत
वर्ण वर्णने
वर्णन करना
वर्णयति-वर्णयते
अववर्णत्-अववर्णत
परीक्षा
१- अपनी पुस्तिका में चुर्, गण और कथ धातु के सारे रूप लिखें
और लुङ् के दोनों पदों के सभी रूपों की सिद्धि करें। ३०
२- सन्वद्भाव एवं उसको मानकर होने वाले कार्यों के सम्बन्ध में एक लेख लिखिये। १०
२- अन्य धातुप्रकरणों की अपेक्षा चुरादिप्रकरण की विशेषता बताइये १०
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
चुरादि-प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ ण्यन्तप्रक्रिया