Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 21
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VṛttiGovind
LSK 696
आत्मनेपदविधायकं विधिसूत्रम्
णिचश्च
Aṣṭādhyāyī 1.3.74
Vṛtti Varadarājācārya

णिजन्तादात्मनेपदं स्यात् कर्तृगामिनि क्रियाफले। चोरयते। चोरयामास।

चोरयिता। चोर्यात्, चोरयिषीष्ट। णिश्रीति चङ्। णौ चङीति ह्रस्वः।

चङीति द्वित्वम्। हलादिशेषः। दीर्घो लघोरित्यभ्यासस्य दीर्घः। अचूचुरत्,

अचूचुरत। अचोरयत्-अचोरयत। कथ वाक्यप्रबन्धे॥२॥

अल्लोपः।

अचः परस्मिन् पूर्वविधौ। अल्विध्यर्थमिदम्। परनिमित्तोऽजादेशः

स्थानिवत् स्यात् स्थानिभूतादचः पूर्वत्वेन दृष्टस्य विधौ कर्तव्ये। इति

स्थानिवत्त्वान्नोपधावृद्धिः। कथयति। अग्लोपित्वादीर्घसन्वद्भावौ न।

अचकथत्। गण संख्याने॥३॥

गणयति।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६९६- णिचश्च। णिचः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अनुदात्तङित

आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् और स्वरितजितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से कर्त्रभिप्राये

और क्रियाफले की अनुवृत्ति आती है।

णिजन्त धातुओं से आत्मनेपद का विधान होता है, यदि क्रिया का फल

कर्ता को प्राप्त हो रहा हो तो।

जिस प्रकार से स्वरितजितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले यह उभयपद का विधान

करता है, उसी प्रकार यह सूत्र भी क्रिया का फल कर्ता को प्राप्त हो तो णिजन्त धातु से

आत्मनेपद का विधान करता है और क्रिया का फल कर्ता को नहीं मिल रहा हो तो परस्मैपद

भी हो जाता है।

चोरयते। चुर् धातु से णिच् आदि करके चोरि बनाने के बाद लट् के स्थान पर

णिचश्च से आत्मनेपद का विधान हुआ, त आया, उसकी सार्वधातुकसंज्ञा, उसको शप्,

अनुबन्धलोप करके चोरि+अ+त बना। शप् वाला अकार सार्वधातुक है, उसके परे रहते

सार्वधातुकार्धधातुकयोः से चोरि के इकार को गुण करके चोरे+अत बना। अय् आदेश

होने पर चोर्+अय्+अत बना, वर्णसम्मेलन होने पर चोरयत बना। त में अकार को टित

आत्मनेपदानां टेरे से एत्व हुआ- चोरयते सिद्ध हुआ। इस प्रकार से लट्-लकार के

आत्मनेपद के रूप बनते हैं- चोरयते, चोरयेते, चोरयन्ते। चोरयसे, चोरयेथे, चोरयध्वे।

चोरये, चोरयावहे, चोरयामहे।

चुरादिगण में णिच् के आ जाने से सब धातु अनेकाच् बन जाते हैं। अतः सभी

धातुओं से लिट् में आम्-प्रत्यय आदि वलादि आर्धधातुक को इट् भी हो जाते हैं।

कास्यनेकाच् आम् वक्तव्यो लिटि। इस वार्तिक का स्मरण करें। यह अनेकाच्

धातुओं से भी आम् का विधान करता है। आम् होने के बाद तो आमः से लिट् का लुक्

और कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि से लिट् को पर लेकर कृ, भू और अस् का अनुप्रयोग होता

है। आप गोपायाञ्चकार की प्रक्रिया का स्मरण करें।

चोरयाञ्चकार। चुर्-धातु से लिट् लकार की प्राप्ति थी, उसे बाधकर स्वार्थ में सत्याप-पाश-रूप-वीणा-तूल-श्लोक-सेना-लोम-त्वच-वर्म-वर्ण-चूर्ण-चुरादिभ्यो णिच् से णिच् प्रत्यय हुआ। णिच् में णकार की चुटू से और चकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा हुई तथा दोनों का तस्य लोपः से लोप हुआ, इ बचा। चुर्+इ बना। णिच् वाले इकार की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा हुई और पुगन्तलघूपधस्य च से उपधाभूत चुर् के उकार को गुण होकर चोर्+इ हुआ, वर्णसम्मेलन हुआ तो चोरि बना। चुर् प्रकृति और णिच् प्रत्यय का समुदाय चोरि है, उसकी सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा हुई। धातु होने के कारण परोक्षभूत काल में परोक्षे लिट् से लिट् लकार और उसके स्थान पर तिप्, उसके स्थान पर णल् करके चोरि+अ बना। कास्यनेकाच आम् वक्तव्यो लिटि वार्तिक से धातु के बाद आम् हुआ। चोरि+आम्+अ बना। चोरि के इकार के स्थान पर अयामन्ताल्वाय्येत्विष्णुषु से अय् आदेश हुआ, चोर्+अय्+आम् बना, वर्णसम्मेलन हुआ, चोरयाम्+अ बना। आमः से लिट् के अ का लोप हुआ। कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि से लिट् को साथ में लेकर पहले कृ का अनुप्रयोग हुआ। चोरयाम्+कृ+लिट् बना। लिट् के स्थान पर तिप्, उसके स्थान पर णल्, अनुबन्धलोप, कृ को लिटि धातोरनभ्यासस्य से द्वित्व, उरत् से अर्, हलादिशेष, कुहोश्चुः से चुत्व आदि करके चोरयाम्+चकृ+अ बना। कृ के ऋकार की अचो ञ्णिति से आर्-वृद्धि हुई चोरयाम्+चकृ+आर्+अ=चोरयाम्+चकार बना। मकार का अनुस्वार और अनुस्वार का परसवर्ण करके ञकार बना। इस तरह चोरयाञ्चकार सिद्ध हुआ। आगे के रूप आप स्वयं बनायें।

चुरादिगणीय सभी धातु णिच् के कारण अनेकाच् हो जाते हैं, अतः सभी धातुओं से लिट् में आम्, कृ, भू, अस् का अनुप्रयोग आदि होता ही है। आम् प्रत्यय की प्रकृति बनी हुई ण्यन्त चोरि धातु के उभयपदी होने से अनुप्रयुज्यमान कृ-धातु भी उभयपदी हो जाती है।

लिट् परस्मैपद में- चोरयाञ्चकार, चोरयाञ्चक्रतुः, चोरयाञ्चक्रुः। चोरयाञ्चकर्थ, चोरयाञ्चक्रथुः, चोरयाञ्चक्र। चोरयाञ्चकार-चोरयाञ्चकर, चोरयाञ्चकृव, चोरयाञ्चकृम। आत्मनेपद में- चोरयाञ्चक्रे, चोरयाञ्चक्राते, चोरयाञ्चक्रिरे। चोरयाञ्चकृषे, चोरयाञ्चक्राथे, चोरयाञ्चकृढ्वे। चोरयाञ्चक्रे, चोरयाञ्चकृवहे, चोरयाञ्चकृमहे।

भू और अस् के अनुप्रयोग होने पर केवल परस्मैपद ही होगा, क्योंकि भू और अस् धातु केवल परस्मैपदी हैं- चोरयाम्बभूव, चोरयाम्बभूवतुः, चोरयाम्बभूवुः। चोरयाम्बभूविथ, चोरयाम्बभूवथुः, चोरयाम्बभूव। चोरयाम्बभूव, चोरयाम्बभूविव, चोरयाम्बभूविम। इसी प्रकार चोरयामास, चोरयामासतुः, चोरयामासुः। चोरयामासिथ, चोरयामासथुः, चोरयामास। चोरयामास, चोरयामासिव, चोरयामासिम।

लुट् में णिच् आदि करके चोरि बनाने के बाद तिप्, तासि, इट् आदि करके चोरि+इ+तास्+ति बना है। इकार को गुण अयादेश, डा आदेश, टिलोप, वर्णसम्मेलन करके चोरयिता सिद्ध होता है। परस्मैपद में- चोरयिता, चोरयितारौ, चोरयितारः। चोरयितासि, चोरयितास्थः, चोरयितास्थ। चोरयितास्मि, चोरयितास्वः, चोरयितास्मः। आत्मनेपद में- चोरयिता, चोरयितारौ, चोरयितारः। चोरयितासे, चोरयितासाथे, चोरयिताध्वे। चोरयिताहे, चोरयितास्वहे, चोरयितास्महे।

लृट् परस्मैपद- चोरयिष्यति, चोरयिष्यतः, चोरयिष्यन्ति। चोरयिष्यसि,

चोरयिष्यथः, चोरयिष्यथ। चोरयिष्यामि, चोरयिष्यावः, चोरयिष्यामः। आत्मनेपद में-

चोरयिष्यते, चोरयिष्येते, चोरयिष्यन्ते। चोरयिष्यसे, चोरयिष्येथे, चोरयिष्यध्वे। चोरयिष्ये,

चोरयिष्यावहे, चोरयिष्यामहे।

लोट् परस्मैपद- चोरयतु-चोरयतात्, चोरयताम्, चोरयन्तु। चोरय-चोरयतात्,

चोरयतम्, चोरयत। चोरयाणि, चोरयाव, चोरयाम। आत्मनेपद में- चोरयताम्, चोरयेताम्,

चोरयन्ताम्। चोरयस्व, चोरयेथाम्, चोरयध्वम्। चोरयै, चोरयावहै, चोरयामहै।

लङ् परस्मैपद- अचोरयत्, अचोरयताम्, अचोरयन्। अचोरयः, अचोरयतम्,

अचोरयत। अचोरयम्, अचोरयाव, अचोरयाम। आत्मनेपद- अचोरयत, अचोरयेताम्, अचोरयन्त।

अचोरयथाः, अचोरयेथाम्, अचोरयध्वम्। अचोरये, अचोरयावहि, अचोरयामहि।

विधिलिङ् परस्मैपद- चोरयेत्, चोरयेताम्, चोरयेयुः। चोरयेः, चोरयेतम्, चोरयेत।

चोरयेयम्, चोरयेव, चोरयेम। आत्मनेपद- चोरयेत, चोरयेयाताम्, चोरयेरन्। चोरयेथाः, चोरयेयाथाम्,

चोरयेध्वम्। चोरयेय, चोरयेवहि, चोरयेमहि।

चोर्यात्। चोरि बनने के बाद आशीर्लिङ्, ति, यासुट् करके चोरि+यास्+त् बना।

यास् आर्धधातुक तो है, परन्तु वलादि न होने के कारण उससे इट् नहीं हुआ। णि है चोरि

का इकार, अतः णेरनिटि से चोरि के इकार का लोप हुआ- चोर्+यास्+त् बना, सकार

का लोप करके चोर्यात् यह रूप सिद्ध हुआ। शेष रूप आप स्वयं सिद्ध करें।

परस्मैपद में- चोर्यात्, चोर्यास्ताम्, चोर्यासुः। चोर्याः, चोर्यास्तम्, चोर्यास्त। चोर्यासम्,

चोर्यास्व, चोर्यास्म।

आत्मनेपद में- चोरयिषीष्ट, चोरयिषीयास्ताम्, चोरयिषीरन्। चोरयिषीष्ठाः,

चोरयिषीयास्थाम्, चोरयिषीद्वम्-चोरयिषीध्वम्। चोरयिषीय, चोरयिषीवहि, चोरयिषीमहि। -

अचूचुरत्। चोरि से लुङ्, तिप् अट् आगम करके अचोरि+त् बना। च्लि करके

उसके स्थान पर सिच् आदेश प्राप्त था, उसको बाधकर णिश्रिद्रुमुभ्यः कर्तरि चङ् से

ण्यन्त-धातु मानकर च्लि के स्थान पर चङ् आदेश हुआ। चकार और ङकार की इत्संज्ञा

और लोप होने के बाद अ बचा। अचोरि+अ+त् बना। अब णेरनिटि से णि के इकार का

लोप करने पर अचोर्+अ+त् बना। णौ चङ्युपधाया ह्रस्वः से उपधाभूत चो के ओकार

को ह्रस्व हुआ तो उकार हुआ। अचुर्+अत् बना। चङि से चुर् को द्वित्व हुआ, उसकी

अभ्याससंज्ञा और हलादि शेष कर अचुचुर्+अत् बना। सन्वल्लघुनि चङ्परेऽनग्लोपे इसने

अभ्यास चु के लिए सन्वद्भाव अर्थात् सन् के परे होने पर जो कार्य हो सकते हैं, वे कार्य

हो जायें ऐसा अतिदेश कर दिया। सन्वद्भाव होने के बाद अभ्यास चु को दीर्घो लघोः से

दीर्घ हुआ, अचूचुर्+अत् बना। वर्णसम्मेलन हुआ- अचूचुरत्। यही प्रक्रिया अन्य परस्मैपद

तस्, झि आदि और आत्मपेपद त, आताम् आदि में भी समझनी चाहिए।

चुरादिगण में विशेष ध्यान लुङ् लकार में देना होता है क्योंकि अन्य लकारों में

तो णिच् के बाद सरल ही रूप बनते हैं। लुङ् में चङ्, द्वित्व, सन्वद्भाव आदि कार्य विशेष

होते हैं।

चुर्-चोरि के लुङ् के रूप, परस्मैपद में- अचूचुरत्, अचूचुरताम्, अचूचुरन्।

अचूचुरः, अचूचुरतम्, अचूचुरत। अचूचुरम्, अचूचुराव, अचूचुराम। आत्मनेपद में- अचूचुरत,

अचूचुरेताम्, अचूचुरन्त। अचूचुरथाः, अचूचुरेथाम्, अचूचुरध्वम्। अचूचुरे, अचूचुरावहि, अचूचुरामहि।

.....

लृङ् परस्मैपद में- अचोरयिष्यत्, अचोरयिष्यताम्, अचोरयिष्यन्। अचोरयिष्यः, अचोरयिष्यतम्, अचोरयिष्यत। अचोरयिष्यम्, अचोरयिष्याव, अचोरयिष्याम। आत्मनेपद में- अचोरयिष्यत, अचोरयिष्येताम्, अचोरयिष्यन्त। अचोरयिष्यथाः, अचोरयिष्येथाम्, अचोरयिष्यध्वम्। अचोरयिष्ये, अचोरयिष्यावहि, अचोरयिष्यामहि।

कथ वाक्यप्रबन्धे। कथ धातु वाक्यप्रबन्ध अर्थात् वाक्यों का उच्चारण करना, बोलना आदि अर्थों में है। यह धातु अदन्त ही है अर्थात् अन्त्य अकार की इत्संज्ञा नहीं होती। पाणिनि जी ने इसमें अनुनासिकत्व की प्रतिज्ञा नहीं की है। इसी तरह के अनेक धातु हैं।

कथ इस अदन्त धातु से ही सत्याप-पाश-रूप-वीणा-तूल-श्लोक-सेना-लोम-त्वच-वर्म-वर्ण-चूर्ण-चुरादिभ्यो णिच् से णिच् प्रत्यय करके कथ+इ बन जाता है। णिच् को आर्धधातुक मानकर अतो लोपः से थकारोत्तरवर्ती अकार का लोप हुआ। कथ+इ में अत उपधायाः ककारोत्तरवर्ती उपधाभूत अकार की वृद्धि करने के लिए प्रवृत्त था किन्तु अचः परस्मिन् पूर्वविधौ से अकार के लोप को स्थानिवद्भाव करके वृद्धि को रोका जाता है। स्थानिवद्भावविधायक सूत्र का अर्थ है- पर को निमित्त मानकर हुआ अजादेश स्थानिवत् हो, यदि उस स्थानिभूत अच् से पूर्व देखे गये के स्थान पर कार्य करना हो तो। यहाँ पर अच् के स्थान पर हुआ आदेश है अतो लोपः से किया गया अकार का लोप, उस अकार से पूर्व में विद्यमान अकार की वृद्धि करनी है। इस तरह यह सूत्र पूरा का पूरा घट गया। फलतः लोप का स्थानिवद्भाव हुआ अर्थात् अकार के लोप होने पर भी स्थानिवत्त्वेन बीच में अकार मान लिया गया, जिससे कथ में उपधा अकार न बन कर थकार बन गया। थकार की वृद्धि का प्रसंग नहीं हो सकता। अतः अत उपधायाः से वृद्धि नहीं हो सकी, कथि ही बन गया। उपधावृद्धि हो जाती तो काथि बन जाता। अब कथि की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा करके णिचश्च से कर्तृगामी क्रियाफल में आत्मनेपद होता है, अन्यथा परस्मैपद का विधान होता है। परस्मैपद में लट्, तिप्, शप् करके कथि+अति बना। इकार को सार्वधातुकगुण, अयादेश करके कथयति सिद्ध हो जाता है। आत्मनेपद में कथयते। शेष रूप सरल ही हैं।

यदि धातु से णिच् करने के पहले ही चुर् की तरह अकार की इत्संज्ञा करके लोप किया जाता तो स्थानिवद्भाव का प्रसंग न आता, फलतः वृद्धि होकर काथि हो जाता और उससे काथयति ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता। चुर् में तो अत् न होने के कारण वृद्धि प्राप्त ही नहीं होती किन्तु उपधागुण होकर चोरि बनता है। णिच् आने के बाद अकार का लोप करने से धातु अग्लोपी बन जाता है, जिससे लृङ् में सन्वल्लघूनि चङ्परेऽनग्लोपे से सन्वद्भाव नहीं होगा। फलतः दीर्घ आदि कार्य भी नहीं होगे। अक्=प्रत्याहार है। जहाँ उसका लोप होता है, उसे अग्लोपी कहा जाता है।

चुरादिगण में धातुओं को अदन्त मानने के दो फल हैं- १- गुण, वृद्धि का निषेध, और २- अग्लोपी हो जाने से सन्वद्भाव का न होना।

यहाँ पर सभी लकारों के प्रथमपुरुष एकवचन के ही रूप दिये जा रहे हैं। आप सभी पुरुषों के तीनों वचनों में रूप बना लें, क्योंकि सरल ही हैं।

लट्- कथयति, कथयते। लिट्- कथयाञ्चकार, कथयाम्बभूब, कथयामास। लुट्- कथयिता, कथयितासि, कथयितासे। लृट्- कथयिष्यति, कथयिष्यते। लोट्- कथयतु-कथयतात्, कथयताम्। लङ्- अकथयत्, अकथयत। विधिलिङ्- कथयेत्, कथयेत।

आशीर्लिङ्- अतो लोपः से अकार का और णेरनिटि से णि का लोप करके कथ्यात्। आत्मनेपद में कथयिपीष्ट बनता है। लुङ् में णि को मानकर अकार का लोप हुआ है। अतः यह धातु अग्लोपी है। फलतः सन्वल्लघूनि चङ्परेऽनग्लोपे से सन्वद्भाव नहीं हुआ और दीर्घ भी नहीं हुआ। चङ् तो होगा ही, जिससे अचकथत्, अचकथत् आदि रूप बन जाते हैं। लृङ्- अकथयिष्यत्, अकथयिष्यत।

गण संख्याने! गण धातु गिनना अर्थ में है। यह भी कथ की तरह ही अदन्त है। स्वार्थ में णिच्, अतो लोपः से अन्त्य अकार का लोप, वृद्धि की प्राप्ति, स्थानिवद्भाव करके वृद्धि का अभाव, सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा करके कथयति की ही तरह गणयति बन जाता है। लट् से आशीर्लिङ् तक तथा लृङ् में कथ की तरह ही रूप होते हैं। लृङ् में अग्रिम सूत्र ई च गणः से एक पक्ष में ईकार आदेश और एक पक्ष में अकार ही रह जाने से अजीगणत्, अजगणत् ऐसे दो-दो रूप बन जाते हैं।