Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 21
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VṛttiGovind
LSK 695
णिच्-विधायकं विधिसूत्रम्
सत्यापपाशरूपवीणातूलश्लोकसेनालोमत्वचवर्मवर्णचूर्णचुरादिभ्यो णिच्
Aṣṭādhyāyī 3.1.25
Vṛtti Varadarājācārya

एभ्यो णिच् स्यात्। चूर्णान्तेभ्यः प्रातिपदिकाद्धात्वर्थ इत्येव सिद्धे

तेषामिह ग्रहणं प्रपञ्चार्थम्। चुरादिभ्यस्तु स्वार्थ। पुगन्तेति गुणः।

सनाद्यन्ता इति धातुत्वम्। तिप्शबादि। गुणायादेशौ। चोरयति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

चुर स्तेये॥१॥

अब चुरादिप्रकरण का प्रारम्भ होता है। तिङन्त-प्रकरण अथवा धातु-प्रकरण में यह दसवाँ प्रकरण है। किन्तु अन्य प्रकरणों से यह नितान्त भिन्न है। अन्य प्रकरणों में धातु और लकार के बीच में शप् आदि विकरण होते हैं किन्तु इस प्रकरण में मूलधातु से चोर विकरण नहीं होता। जब धातु से लकार आने के पहले ही स्वार्थ में णिच् प्रत्यय होता है, उस ण्यन्त की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा होनेपर लकार आते हैं, तब शप् होता है। णिच् किसी अर्थ को लेकर नहीं होता। जिस प्रत्यय में किसी अर्थ विशेष की अपेक्षा नहीं रखी जाती, वह प्रत्यय स्वार्थ में विहित होता है अर्थात् प्रकृति के अर्थ को ही परिपुष्ट करने के लिए ही होता है, अन्य किसी विशेष अर्थ का प्रतिपादन नहीं करता। कहा भी गया है- अनिर्दिष्टार्थाः प्रत्ययाः स्वार्थे भवन्ति। इस प्रकरण में होने वाला णिच् लकार के पहले आता है और णिजन्त होने के बाद सनाद्यन्ता धातवः से पुनः धातुसंज्ञक बन जाता है। उसके बाद ही लट्, तिप्, शप् आदि होते हैं।

चुर स्तेये। चुर् धातु चोरी करना अर्थ में है। अन्त्य अकार इत्संज्ञक नहीं है, उच्चारणार्थ लगा हुआ है अर्थात् उभयपद के विधान के लिए नहीं है क्योंकि उभयपद के विधान के लिए आगे णिचश्च कहा जा रहा है।

६९५- सत्याप-पाश-रूप-वीणा-तूल-श्लोक-सेना-लोम-त्वच-वर्म-वर्ण-चूर्ण-चुरादिभ्यो णिच्। चुर् आदिर्येषां ते चुरादयः। सत्यापश्च, पाशश्च, रूपञ्च, वीणा च, तूलञ्च, श्लोकश्च, सेना च, लोम च, त्वचश्च वर्म च वर्णञ्च, चूर्णञ्च, चुरादयश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः

.....

सत्याप-पाश-रूप-वीणा-तूल-श्लोक-सेना-लोम-त्वच-वर्म-वर्ण-चूर्ण-चुरादयस्तेभ्यः,

बहुव्रीहिगर्भो द्वन्द्वः। सत्याप-पाश-रूप-वीणा-तूल-श्लोक-सेना-लोम-त्वच-वर्म-वर्ण-चूर्ण-

चुरादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, णिच् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में प्रत्ययः और परश्च इन

दोनों सूत्रों का अधिकार है।

सत्याप, पाश, रूप, वीणा, तूल, श्लोक, सेना, लोम, त्वच, वर्म, वर्ण,

चूर्ण आदि नामधातुओं और चुर् आदि गणपठित धातुओं से परे स्वार्थ में णिच् प्रत्यय

होता है।

णिच् में चकार की हलन्त्यम् से तथा णकार की चुटू से इत्संज्ञा होकर दोनों का

तस्य लोपः से लोप हो जाता है। केवल इ बचता है। णित् होने के कारण अत उपधायाः,

अचो ञ्णिति आदि से वृद्धि या पुगन्तलघूपधस्य च से गुण आदि होते हैं। इसके वाद

प्रकृति-प्रत्ययरूप समुदाय की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा हो जाती है।

चूर्णान्तेभ्यः प्रातिपदिकाद्धात्वर्थ इत्येव सिद्धे तेषामिह ग्रहणं प्रपञ्चार्थम्।

चुरादिभ्यस्तु स्वार्थे। कौमुदीकार यहाँ पर कह रहे हैं कि इस सूत्र में सत्याप, पाश आदि

शब्दों को पढ़ना आवश्यक नहीं है, केवल चुरादिभ्यो णिच् कहने से काम चल जाता,

क्योंकि इनमें प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच्च इस गणसूत्र से ही काम चल सकता है।

प्रातिपदिकों से धातु के अर्थ में बहुल से णिच्च हो और उस णिच् को प्रत्यय की की

तरह मान कर के सभी कार्य हों। इस तरह सत्याप से चूर्ण पर्यन्त के धातुओं से णिच्

हो सकता है। फिर सत्याप से लेकर चूर्ण पर्यन्त की इतनी धातुओं का यहाँ पर कथन

करना केवल विस्तार मात्र अर्थात् स्पष्टतया ज्ञान कराना ही लक्ष्य है। यहाँ पर चुरादिभ्यो

णिच् इतना ही सूत्र करने से काम चल सकता है।

चुरादि धातुओं से तो स्वार्थ में ही णिच् होता है अर्थात् इस प्रत्यय के लगने

के वाद भी धातु के अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होता।

जिस तरह से आगे चुर् से णिच् करके चोरयति बनाया जा रहा है उसी तरह

सत्याप से सत्यापयति(सत्य को करता या कहता है), विपाशयति(पाश को छुड़ाता है),

रूपयति(रूप देता है), वीणयति(वीणा के साथ गाता है), तूलयति(तोलता है),

श्लोकयति(श्लोकों से स्तुति करता है) आदि बनाये जाते हैं।

चोरयति। चुर्-धातु से लट् लकार के आने के पहले ही स्वार्थ में

सत्याप-पाश-रूप-वीणा-तूल-श्लोक-सेना-लोम-त्वच-वर्म-वर्ण-चूर्ण-चुरादिभ्यो णिच्

से णिच् प्रत्यय हुआ। णिच् में णकार की चुटू से और चकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा हुई

तथा दोनों का तस्य लोपः से लोप हुआ, इ बचा। चुर्+इ बना। णिच् वाले इकार की

आर्थधातुकं शेषः से आर्थधातुकसंज्ञा हुई और पुगन्तलघूपधस्य च से उपधाभूत चुर् के

उकार को गुण होकर चोर्+इ हुआ, वर्णसम्मेलन हुआ तो चोरि बना। चुर् प्रकृति और णिच्

प्रत्यय का समुदाय चोरि है, उसकी सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा हुई। धातु होने के कारण

वर्तमान काल में वर्तमाने लट् से लट् लकार और उसके स्थान पर तिप्, उसकी

सार्वधातुकसंज्ञा, उसको शप्, अनुबन्धलोप करके चोरि+अ+ति बना। शप् वाला अकार

सार्वधातुक है, उसके परे रहते सार्वधातुकार्थधातुकयोः से चोरि के इकार को गुण करके

चोरि+अति बना। अय् आदेश होने पर चोर्+अय्+अति बना, वर्णसम्मेलन होने पर चोरयति

सिद्ध हुआ। इस प्रकार से लट्-लकार के परस्मैपद में रूप बनते हैं- चोरयति, चोरयतः,

चोरयन्ति। चोरयसि, चोरयथः, चोरयथ। चोरयामि, चोरयावः, चोरयामः।