एकाचो ग्रहेर्विहितस्येटो दीर्घो न तु लिटि। ग्रहीता। गृह्णातु। हलः श्नः शनञ्झविति श्नः शनजादेशः। गृहाणा। गृह्यात्, ग्रहीषीष्ट। ह्म्यन्तेति न वृद्धिः। अग्रहीत्। अग्रहीष्टाम्।
अग्रहीष्ट। अग्रहीषाताम्॥ कुष निष्कर्षे॥ १७॥
कुष्णाति। कोषिता। अश भोजने॥ १८॥
अश्नाति। आश। अशिता। अशिष्यति।
अश्नातु। अशान॥ मुष स्तेये॥ १९॥
मोषिता। मुषाण॥ ज्ञा अवबोधने॥ २०॥
जज्ञौ॥ वृङ् सम्भक्तौ॥ २१॥
वृणीते। ववृषे। ववृढ्वे। वरिता, वरीता। अवरीष्ट, अवरिष्ट, अवृत॥
इति क्र्यादयः॥ २०॥
लट्- वृणाति। वृणीते। लिट्- ववार, ववरे। लुट्- वरीता-वरिता, वरीतासि-वरितासि, वरीतासे, वरितासे। लृट्- वरीष्यति-वरिष्यति, वरीष्यते-वरिष्यते। लोट्- वृणातु, वृणीताम्। लङ्- अवृणातु, अवृणीत। विधिलिङ्- वृणीयात्, वृणीत। आशीर्लिङ्- वूर्यात्, वरिषीष्ट-वूर्षीष्ट। लिङ्- अवारीत्, अवरीष्ट-अवरिष्ट, अवूर्घ्ट। लृङ्- अवरीष्यत्-अवरिष्यत्, अवरीष्यत-अवरिष्यत।
धूञ् कम्पने। धूञ् धातु कँपाना, हिलाना अर्थ में है। जित् होने के कारण उभयपदी और ऊदन्त होने के कारण सेट् है किन्तु स्वरतिसूतिसूयतिधूञ्दितो वा इस सूत्र में पढ़े जाने से वेट् अर्थात् विकल्प से इट् होने वाला है। प्वादि के अन्तर्गत आता है, अतः शित् के परे होने पर प्वादीनां ह्रस्वः से ह्रस्व होता है। सार्वधातुक लकारों में पूञ् धातु की तरह और आर्धधातुक लकारों में स्वादिगण के धूञ् की तरह ही रूप होते हैं।
लट्- धुनाति। धुनीते। लिट्- दुधाव, दुधुवतुः, दुधुवुः। दुधुवे, दुधुवाते, दुधुविरे। लुट्- धविता-धोता, धवितासि-धोतासि, धवितासे-धोतासे। लृट्- धविष्यति-धोष्यति, धविष्यते-धोष्यते। लोट्- धुनातु, धुनीताम्। लङ्- अधुनात्, अधुनीत। विधिलिङ्- धुनीयात्, धुनीत। आशीर्लिङ्- धविषीष्ट-धोषीष्ट। लिङ्- यहाँ पर स्तुसुधूञ्भ्यः परस्मैपदेषु से नित्य से इट् होता है- अधावीत्। अधविष्ट-अधोष्ट। लृङ्- अधविष्यत्-अधोष्यत्, अधविष्यत-अधोष्यत।
लघुसिद्धान्तकौमुदी में प्वादि यहीं पर समाप्त हो जाते हैं। अतः आगे के धातुओं में ह्रस्व का प्रसंग नहीं रहेगा।
ग्रह उपादाने। ग्रह धातु ग्रहण करना अर्थ में है। अन्त्य अकार स्वरित है। स्वरितेत् होने से उभयपदी है। हकारान्त अनुदात्तों में परिगणित न होने से यह सेट् है। श्ना को सार्वधातुकमपित् से डिद्वत् हो जाने के कारण उसके परे रहते ग्रहिन्यावयिव्यधिविष्ट-विचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां डिति च से ग्रह् के ग्+र्+अह् में रेफ को सम्प्रसारण होकर ऋकार हो जाता है जिससे गृ+अह् हो जाता है। उसके बाद सम्प्रसारणाच्च से ऋकार और अकार में पूर्वरूप होकर ऋकार ही बन जाता है। इस तरह ग्रह् धातु गृह् में बदल जाता है। श्ना के नकार को णत्व करके गृह्णा बन जाता है जिससे गृह्णाति आदि रूप बनते हैं। आर्धधातुक के परे अर्थात् श्ना न होने के स्थलों पर तो ग्रह् ही रह जाता है। रूप-गृह्णाति, गृह्णीतः, गृह्णन्ति, गृह्णासि आदि।
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६९४- ग्रहोऽलिटि दीर्घः। ग्रहः पञ्चम्यन्तम्, अलिटि सप्तम्यन्तं, दीर्घः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। आर्धधातुकस्येड्वलादेः से विभक्तिविपरिणाम करके इटः और एकाच उपदेशोऽनुदात्तात् से एकाचः की अनुवृत्ति आती है। विहितस्य का अध्याहार है।
एक अच् वाली ग्रह धातु से परे विधान किये गये इट् को दीर्घ होता है किन्तु लिट् के परे नहीं।
ग्रहीता, ग्रहीष्यति, ग्रहीषीष्ट और अग्रहीत् में ग्रहोऽलिटि दीर्घः से दीर्घ हो जाता है।
अग्रहीत्। लुङ् लकार में अग्रह्+इस्+ईत् बनने के बाद वदव्रजहलन्तस्याचः से वृद्धि प्राप्त थी, उसका नेटि निषेध करता है। पुनः अतो हलादेर्लघोः से वैकल्पिक वृद्धि प्राप्त होती है, उसका भी ह्य्यन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् से निषेध हो जाता है। तब ग्रहोऽलिटि दीर्घः से इट् को दीर्घ होकर अग्रह्+ईस्+ईत् बना। एकदेशविकृतन्यायेन पूर्व ईकार को इट् ही मानकर इट ईटि से सकार का लोप, दीर्घ करके अग्रहीत् बनता है। शेष रूपों को आप स्वयं बनायें। स्मरण रहे कि लोट् के सिप् में हलः शनः शानन्द्गौ से शानच् आदेश होकर गृहाण बनता है।
इस धातु का उपयोग पर्याप्त मात्रा में होता है। इस लिए सारे रूप अवश्य याद करें। छात्रों के सुविधार्थ ग्रह धातु के रूप दिये जा रहे हैं।
लट्( परस्मैपद ) गृह्णाति, गृह्णीतः, गृह्णन्ति, गृह्णासि, गृह्णीथः, गृह्णीथ, गृह्णामि, गृह्णीवः, गृह्णीमः। आत्मनेपद- गृह्णीते, गृह्णाते, गृह्णते, गृह्णीषे, गृह्णाथे, गृह्णीध्वे, गृह्णे, गृह्णीवहे, गृह्णीमहे।
लिट्-( परस्मैपद ) जग्राह, जगृहतुः, जगृहुः, जग्रहिथ, जगृहथुः, जगृह, जग्राह-जग्रह, जगृहिव, जगृहिम। ( आत्मनेपद ) जगृहे, जगृहाते, जगृहिरे, जगृहिषे, जगृहाथे, जगृहिद्वे-जगृहिध्वे, जगृहे, जगृहिवहे, जगृहिमहे।
लुट्( परस्मैपद ) ग्रहीता, ग्रहीतारौ, ग्रहीतारः, ग्रहीतासि, ग्रहीतास्थः, ग्रहीतास्थ, ग्रहीतास्मि, ग्रहीतास्वः, ग्रहीतास्मः। ( आत्मनेपद ) ग्रहीता, ग्रहीतारौ, ग्रहीतारः, ग्रहीतासे, ग्रहीतासाथे, ग्रहीताध्वे, ग्रहीताहे, ग्रहीतास्वहे, ग्रहीतास्महे।
लृट्( परस्मैपद ) ग्रहीष्यति, ग्रहीष्यतः, ग्रहीष्यन्ति, ग्रहीष्यसि, ग्रहीष्यथः, ग्रहीष्यथ, ग्रहीष्यामि, ग्रहीष्यावः, ग्रहीष्यामः। ( आत्मनेपद ) ग्रहीष्यते, ग्रहीष्येते, ग्रहीष्यन्ते, ग्रहीष्यसे, ग्रहीष्येथे, ग्रहीष्यध्वे, ग्रहीष्ये, ग्रहीष्यावहे, ग्रहीष्यामहे।
लोट्( परस्मैपद ) गृह्णातु-गृह्णीतात्, गृह्णीताम्, गृह्णन्तु, गृहाण-गृह्णीतात्, गृह्णीतम्, गृह्णीत, गृह्णानि, गृह्णाव, गृह्णाम। ( आत्मनेपद ) गृह्णीताम्, गृह्णाताम्, गृह्णाताम्, गृह्णीष्व, गृह्णाथाम्, गृह्णीध्वम्, गृह्णे, गृह्णावहे, गृह्णामहे।
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लङ्( परस्मैपद ) अगृह्णात्, अगृहीताम्, अगृह्णन्, अगृह्णः, अगृहीतम्, अगृहीत, अगृह्णम्, अगृहीव, अगृहीम। ( आत्मनेपद ) अगृहीत, अगृह्णाताम्, अगृह्णत, अगृहीथाः, अगृह्णाथाम्, अगृहीध्वम्, अगृह्णि, अगृहीवहि, अगृहीमहि।
विधिलिङ्( परस्मैपद ) गृहीयात्, गृहीयाताम्, गृहीयुः, गृहीयाः, गृहीयातम्, गृहीयात, गृहीयाम्, गृहीयाव, गृहीयाम। ( आत्मनेपद ) गृहीत, गृहीयाताम्, गृहीरन्, गृहीथाः, गृहीयाथाम्, गृहीध्वम्, गृहीय, गृहीवहि, गृहीमहि।
आशीर्लिङ्( परस्मैपद ) गृह्यात्, गृह्यास्ताम्, गृह्यासुः, गृह्याः, गृह्यास्तम्, गृह्यास्त, गृह्यासम्, गृह्यास्व, गृह्यास्म। ( आत्मनेपद ) ग्रहीषीष्ट, ग्रहीषीष्टास्ताम्, ग्रहीषीरन्, ग्रहीषीष्टाः, ग्रहीषीष्टास्थाम्, ग्रहीषीद्वम्-ग्रहीषीध्वम्, ग्रहीषीय, ग्रहीषीवहि, ग्रहीषीमहि।
लुङ्( परस्मैपद ) अग्रहीत्, अग्रहीष्टाम्, अग्रहीषुः, अग्रहीः, अग्रहीष्टम्, अग्रहीष्ट, अग्रहीषम्, अग्रहीष्व, अग्रहीष्म। ( आत्मनेपद ) अग्रहीष्ट, अग्रहीषाताम्, अग्रहीषत, अग्रहीष्टाः, अग्रहीषाथाम्, अग्रहीद्वम्-अग्रहीष्वम्, अग्रहीषि, अग्रहीष्वहि, अग्रहीष्महि।
लृङ्( परस्मैपद ) अग्रहीष्यत्, अग्रहीष्यताम्, अग्रहीष्यन्, अग्रहीष्यः, अग्रहीष्यतम्, अग्रहीष्यत, अग्रहीष्यम्, अग्रहीष्याव, अग्रहीष्याम। ( आत्मनेपद ) अग्रहीष्यत, अग्रहीष्येताम्, अग्रहीष्यन्त, अग्रहीष्यथाः, अग्रहीष्येथाम्, अग्रहीष्यधवम्, अग्रहीष्ये, अग्रहीष्यावहि, अग्रहीष्यामहि। उभयपदी धातुओं का विवेचन पूर्ण हुआ। अब परस्मैपदी धातुओं का विवेचन प्रारम्भ करते हैं।
कुष निष्कर्षे। कुष धातु निष्कर्ष अर्थात् बाहर निकालना अर्थ में प्रयुक्त है। उदात्त अकार की इत्संज्ञा होती है, कुष् शेष रह जाता है। आत्मनेपद के निमित्तों से हीन होने के कारण शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् से परस्मैपद का विधान होता है। यह धातु अनुदात्तों में परिगणित नहीं है, अतः सेट् है। इसके रूप सरल हैं। यह धातु हलन्त है, अतः लोट्, परस्मैपद के सि में हलः शनः शानन्द्गौ से शानच् होकर कुषाण बनता है।
लट्- कुष्णाति, कुष्णीतः, कुष्णन्ति। लिट्- चुकोष, चुकुषुतः, चुकुषुः, चुकोषिथ। लृट्- कोषिता, कोषितासि। लृट्- कोषिष्यति। लोट्- कुष्णातु-कुष्णीतात्। लङ्- अकुष्णात्। विधिलिङ्- कुष्णीयात्। आशीर्लिङ्- कुष्यात्। लुङ्- अकोषीत्। लृङ्- अकोषिष्यत्।
अश भोजने। अश धातु भोजन करना अर्थ में प्रयुक्त है। उदात्त अकार की इत्संज्ञा होती है, अश् शेष रह जाता है। आत्मनेपद के निमित्तों से हीन होने के कारण शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् से परस्मैपद का विधान होता है। यह धातु अनुदात्तों में परिगणित नहीं है, अतः सेट् है। इसके भी रूप सरल ही हैं। यह धातु हलन्त है, अतः लोट्, परस्मैपद के सि में हलः शनः शानन्द्गौ से शानच् होकर अशान बनता है।
लट्- अशनाति, अशनीतः, अशनन्ति। लिट्- आश, आशतुः, आशुः, आशिथ। लृट्- अशिता, अशितासि। लृट्- अशिष्यति। लोट्- अशनातु-अशनीतात्, अशान। लङ्- आशनात्, आशनीताम्। विधिलिङ्- अशनीयात्। आशीर्लिङ्- अशयात्। लुङ्- आशीत्। लृङ्- आशिष्यत्।
मुष स्तेये। मुष धातु स्तेये अर्थात् चुराना अर्थ में है। उदात्त अकार की इत्संज्ञा होती है, मुष् शेष रह जाता है। आत्मनेपद के निमित्तों से हीन होने के कारण परस्मैपदी है। यह धातु षकारान्त अनुदात्तों में परिगणित नहीं है, अतः सेट् है। इसके भी रूप सरल हैं। यह
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धातु हलन्त है, अतः लोट्, परस्मैपद के सि में हलः शनः शानन्द्रौ से शानच् होकर मुषाणा बनता है।
लट्- मुष्णाति, मुष्णीतः, मुष्णन्ति। लिट्- मुमोष, मुमुषतुः, मुमुषुः, मुमोषिथ। लृट्- मोषिता, मोषितासि। लृट्- मोषिष्यति। लोट्- मुष्णातु-मुष्णीतात्। लङ्- अमुष्णात्। विधिलिङ्- मुष्णीयात्। आशीर्लिङ्- मुष्यात्। लुङ्- अमोषीत्। लृङ्- अमोषिष्यत्।
ज्ञा अवबोधने। ज्ञा धातु जानना अर्थ में है। भू की तरह यहाँ भी किसी वर्ण की इत्संज्ञा नहीं होती। आत्मनेपद के निमित्तों से हीन होने के कारण परस्मैपदी है। यह धातु ऊढ़ूदन्तै० इस कारिका में परिगणित नहीं है, अतः अनुदात्त है। फलतः इट् नहीं होगा किन्तु लिट् में क्रादिनियम से नित्य से इट् और थल् में भारद्वाजनियम से विकल्प से इट् होता है। शना इस शित् प्रत्यय के परे ज्ञाजनोर्जा से ज्ञा के स्थान पर जा आदेश होता है। लिट् में पपौ की तरह जज्ञौ बनता है। हलादि शेष होते समय ज्ञ का आदि वर्ण ज् ही शेष रहता है। यह धातु अनुपसर्गान्ज्ञः के अनुसार कर्तृगामि क्रियाफल में आत्मनेपदी भी हो जाती है। लट्- जानाति, जानीतः, जानन्ति। जानीते, जानाते, जानते। लिट्- जज्ञौ, जज्ञतुः, जज्ञुः, जज्ञिथ-जज्ञाथ। जज्ञे, जज्ञाते, जज्ञिरे। लृट्- ज्ञाता, ज्ञातासि, ज्ञास्यते। लृट्- ज्ञास्यति, ज्ञास्यते। लोट्- जानातु-जानीतात्, जानीताम्, जानन्तु। जानीताम्, जानाताम्, जानताम्। लङ्- अजानात्, अजानीताम्, अजानन्। अजानीत, अजानीताम्, अजानत। विधिलिङ्- जानीयात्, जानीयात। आशीर्लिङ् में वान्यस्य संयोगादेः से वैकल्पिक एत्व होकर ज्ञेयात्-ज्ञायात्। ज्ञासीष्ट। लृङ्-में यमरमनमातां सक् च से सक् एवम् इट् होकर अज्ञासीत्, अज्ञासिष्टाम्, अज्ञासिषुः आदि। आज्ञास्त। लृङ्- अज्ञास्यत्, अज्ञास्यत।
वृङ् सम्भक्तौ। यह धातु पूजा करना, सेवा करना अर्थ में है। डकार की इत्संज्ञा होती है। डित् होने से आत्मनेपदी बन जाता है। सेट् है। लिट् में कित्व के कारण श्रयुकः किति से इडागम का निषेध होता है।
लट्- वृणीते, वृणाते, वृणते। लिट्- वव्रे, वव्राते, वव्रिरे। लृट्- वरीता-वरिता। लृट्- वरीष्यते-वरिष्यते। लोट्- वृणीताम्, वृणाताम्, वृणताम्। वृणीष्व। लङ्- अवृणीत। विधिलिङ्- वृणीत। आशीर्लिङ्- अवरीष्ट-अवरिष्ट। लृङ्- अवरिष्ट-अवृत। लृङ्- अवरीष्यत-अवरिष्यत।
परीक्षा
१-
अपनी पुस्तिका में क्री धातु के सभी रूप लिखें।
१०
२-
क्री के लिट् तथा लुङ् के सभी रूपों की सिद्धि करे।
२०
३-
ज्ञृस्तम्भुमुचुः० इस सूत्र की सोदाहरण व्याख्या करें।
२०
श्री वरदाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी की
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
क्र्यादि-प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ चुरादयः