वृत इटो लिङि न दीर्घः। स्तरिषीष्ट। उश्चेति कित्वम्। स्तीर्षीष्ट।
सिचि च परस्मैपदेषु। अस्तारीत्। अस्तारिष्टाम्। अस्तारिषुः। अस्तरीष्ट,
अस्तरिष्ट। अस्तीर्ष्ट। कृञ् हिंसायाम्॥१३॥
कृणाति, कृणीते। चकार,
चकरे। वृञ् वरणे॥१४॥
वृणाति, वृणीते। ववार, ववरे। वरिता,
वरीता। उदोष्ठयेत्युत्वम्। वूर्यात्। वरिषीष्ट। वूर्षीष्ट। अवारीत्। अवारिष्टाम्।
अवरिष्ट, अवरीष्ट।
अवूर्ष्ट। धूञ् कम्पने॥१५॥
धुनाति, धुनीते।
धविता, धोता। अधावीत्।
अधविष्ट, अधोष्ट। ग्रह उपादाने॥१६॥
गृह्णाति, गृह्णीते। जग्राह, जगृहे।
.....
६९३- न लिङि। न अव्ययं, लिङि सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। वृतो वा से वृतः,
आर्धधातुकस्येड्वलादेः से इट् तथा ग्रहोऽलिटि दीर्घः से दीर्घः की अनुवृत्ति आती है।
.....
वृङ्, वृञ् और ऋदन्त धातुओं से परे इट् को दीर्घ नहीं होता है लिङ् परे रहते।
लिङ्सिचोरात्मनेपदेषु से इट् होने के पक्ष में वृतो वा से प्राप्त वैकल्पिक इट् के दीर्घ का इससे निषेध किया जाता है।
स्तरिषीष्ट, स्तीर्षीष्ट। आशीर्लिङ् में स्तृ+सीय्+स्+त बन जाने के बाद लिङ्सिचोरात्मनेपदेषु से विकल्प से इट् का आगम करके आर्धधातुक गुण करके स्तरि+सीय्+स्+त बना। वृतो वा से इट् को दीर्घ प्राप्त था, उसका न लिङि से निषेध किया गया। सकार का लोप, षत्व, ष्टुत्व करके स्तरिषीष्ट बना। इट् न होने के पक्ष में उश्च से झलादि लिङ् को किद्वद्भाव करके गुणनिषेध हुआ और ऋत इद्धातोः से रपर-इत्त्व करके हलि च से दीर्घ होने पर स्तीर्षीष्ट सिद्ध हुआ। इसी प्रकार आशीर्लिङ् में दो-दो रूप सिद्ध होंगे।
अस्तारीत्। लुङ् में सिच् का इट ईटि से लुक्, सवर्णदीर्घ आदि करके अस्तृ+ईत् बन जाने के बाद सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से वृद्धि होकर अस्तारीत् बन जाता है। अस्तारीत्, अस्तारिष्टाम्, अस्तारिषुः आदि। आत्मनेपद में लिङ्सिचोरात्मनेपदेषु से विकल्प से इट् होता है। इट् के पक्ष में वृतो वा से इट् को विकल्प से दीर्घ करने पर अस्तरीष्ट, अस्तरिष्ट दो रूप बन जाते हैं। इट् के अभाव में उश्च से सिच् को किद्वद्भाव हो जाने से गुण का निषेध हो जाता है। तब इत्त्व, रपर और हलि च से दीर्घ करके अस्तीष्ट बनता है। इस तरह इट्पक्ष और इडभाव में दो-दो रूप बन जाते हैं। इट् हो कर दीर्घ होने के पक्ष में-अस्तरीष्ट, अस्तरीषाताम्, अस्तरीषत और अस्तरिष्ट, अस्तरिषाताम्, अस्तरिषत। इट् न होने के पक्ष में अस्तीष्ट, अस्तीर्षाताम्, अस्तीर्षत आदि।
लृङ् में- अस्तरीष्यत्-अस्तरिष्यत्, अस्तरीष्यत-अस्तरिष्यत आदि।
कृञ् हिंसायाम्। कृञ् धातु हिंसा करना अर्थ में है। जित् होने के कारण उभयपदी और ऋदन्त होने के कारण सेट् है। प्वादि के अन्तर्गत आता है, अतः शित् के परे होने पर प्वादीनां ह्रस्वः से ह्रस्व होता है। लिट् में ऋच्छत्यृताम् से गुण हो जाता है। आशीर्लिङ् में ऋत इट् धातोः से इत्त्व, रपर आदि भी होते हैं। वृतो वा से विकल्प से इट् को दीर्घ होता है।
लट्- कृणाति। कृणीते। लिट्- चकार, चकरे। लुट्- करीता-करिता, करीतासि-करितासि, करीतासे, करितासे। लृट्- करीष्यति-करिष्यति, करीष्यते-करिष्यते। लोट्- कृणातु, कृणीताम्। लङ्- अकृणात्, अकृणीत। विधिलिङ्- कृणीयात्, कृणीत। आशीर्लिङ्- कीर्यात्, करिषीष्ट-कीर्षीष्ट। लिङ्- अकारीत्, अकरीष्ट-अकरिष्ट, अकीष्ट। लृङ्- अकरीष्यत्-अकरिष्यत्, अकरीष्यत-अकरिष्यत।
वृञ् वरणे। वृञ् धातु वरण करना, स्वीकार करना अर्थ में है। जित् होने के कारण उभयपदी और ऋदन्त होने के कारण सेट् है। प्वादि के अन्तर्गत आता है, अतः शित् के परे होने पर प्वादीनां ह्रस्वः से ह्रस्व होता है। इस तरह इसके सम्पूर्ण रूप कृञ् की तरह ही होते हैं किन्तु ओष्ठ्यपूर्व होने के कारण ऋकार को ऋत इद्धातोः से इत्त्व न होकर उदोष्ठ्यपूर्वस्य से उत्त्व हो जाता है। लिट् में ऋच्छत्यृताम् से गुण हो जाता है। इट् को वृतो वा से विकल्प से दीर्घ होता है।
लिट् के णल् में ग्रह् को द्वित्व, चुत्व, उपधा की अत उपधायाः से वृद्धि होकर जग्राह बनता है किन्तु पित्-भिन्न अतुस् आदि को असंयोगाल्लिट् कित् से किद्वद्भाव होकर ग्रहिन्यावयिव्यधिवष्टि-विचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां डिति च से सम्प्रसारण होता है जिससे जगृहतुः, जगृहुः आदि रूप बनते हैं। आत्मनेपद में सर्वत्र कित्व के विद्यमान रहने के कारण सम्प्रसारण होगा ही।
ग्रह् से विहित इट् को अग्रिम सूत्र ग्रहोऽलिटि दीर्घः से सर्वत्र दीर्घ हो जाता है किन्तु लिट् के इट् को नहीं। यह बात ध्यान में रखना चाहिए।