चात् श्ना। स्कुनोति, स्कुनाति। स्कुनुते, स्कुनीते। चुस्काव, चुस्कुवे।
स्कोता। अस्कौषीत्, अस्कोष्ट।
स्तन्भ्वादयश्चत्वारः सौत्राः। सर्वे रोधनार्थाः परस्मैपदिनः।
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६८७- स्तन्भुस्तुन्भुस्कन्भुस्कुन्भुस्कुञ्ध्यः श्नुश्च। स्तन्भुश्च स्तुन्भुश्च स्कन्भुश्च स्कुन्भुश्च स्कुञ् च तेषामितरेतरद्वन्द्वः स्तन्भुस्तुन्भुस्कन्भुस्कुन्भुस्कुञ्ध्यः। स्तन्भुस्तुन्भुस्कन्भुस्कुन्भुस्कुञ्ध्यः पञ्चम्यन्तं, श्नुः प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदं सूत्रम्। व्रत्यादिभ्यः श्ना से श्ना, कर्तरि शप् गे कर्तरि और सार्वधातुके यक् से सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।
कर्त्रर्थक सार्वधातुक के परे होने पर स्तन्भु, स्तुन्भु, स्कन्भु, स्कुन्भु एवं स्कुञ् धातुओं से श्नु प्रत्यय होता है और पक्ष में श्ना भी होता है।
स्तन्भु आदि चार धातुएँ धातुपाठ में पठित नहीं हैं किन्तु पाणिनि जो ने सूत्र में पढ़ा है, अतः ये सौत्र धातु कहलाते हैं। इन सभी धातुओं का रोकना अर्थ है। यहाँ पर स्कुञ् धातु का प्रसंग है। श्ना होने के पक्ष में स्कुनाति और श्नु होने के पक्ष में स्कुनोति रूप बनते हैं।
रूपमाला-
लट्- परस्मैपद श्नुपक्ष- स्कुनोति, स्कुनुतः, स्कुन्वन्ति। परस्मैपद श्नापक्ष-स्कुनाति, स्कुनीतः, स्कुनन्ति। आत्मनेपद श्नुपक्ष- स्कुनुते, स्कुन्वाते, स्कुन्वते। आत्मनेपद श्नापक्ष- स्कुनीते, स्कुनाते, स्कुनते। लिट्- शर्पूर्वाः खयः। चुस्काव, चुस्कुवतुः, चुस्कुवुः, चुस्कविथ-चुस्कोथ। चुस्कुवे, चुस्कुवाते, चुस्कुविरे। लुट्- स्कोता, स्कोतारौ, स्कोतारः, स्कोतासि, स्कोतासे। लृट्- स्कोष्यति, स्कोष्यते। लोट्- परस्मैपद श्नुपक्ष- स्कुनोतु-स्कुनुतात्, स्कुनुताम्, स्कुन्वन्तु। परस्मैपद श्नापक्ष- स्कुनातु-स्कुनीतात्, स्कुनीताम्, स्कुनन्तु। आत्मनेपद श्नुपक्ष- स्कुनुताम्, स्कुन्वाताम्, स्कुन्वताम्। आत्मनेपद श्नापक्ष- स्कुनीताम्, स्कुनाताम्, स्कुनताम्। लङ्- परस्मैपद श्नुपक्ष- अस्कुनोत्, अस्कुनुताम्, अस्कुन्वन्। परस्मैपद श्नापक्ष- अस्कुनात्, अस्कुनीताम्, अस्कुनन्। आत्मनेपद श्नुपक्ष- अस्कुनुत, अस्कुन्वाताम्, अस्कुन्वत। आत्मनेपद श्नापक्ष- अस्कुनीत, अस्कुनाताम्, अस्कुनत। परस्मैपद विधिलिङ्- स्कुनुयात्, स्कुनीयात्। आत्मनेपद- स्कुनीत, स्कुन्वीत। परस्मैपद आशीर्लिङ्- स्कूयात्। आशीर्लिङ् में आर्धधातुक लकार होने के कारण श्ना, श्नु दोनों नहीं होते। अतः एक ही रूप बनता है। आत्मनेपद में भी और परस्मैपद में भी। स्कोषीष्ट। लुङ्- सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से वृद्धि- अस्कोषीत्, अस्कोष्टाम्, अस्कोषुः। सार्वधातुकगुण- अस्कोष्ट, अस्कोषाताम्, अस्कोषत। लृङ्- अस्कोष्यत्, अस्कोष्यत।
अव स्तन्भु आदि चार धातु के विषय में बताते हैं। ये चारो रोकने अर्थ में सूत्र में पठित सौत्र धातुएँ हैं। उकार की इत्संज्ञा होती है। स्तन्भ, स्तुन्भ, स्कन्भ और स्कुन्भ शेष रह जाते हैं। ये चारो उदित् और सेट् हैं। अतः परस्मैपदी हैं। स्तन्भुस्तुन्भुस्कन्भुस्कुन्भुस्कुञ्ध्यः श्नुश्च से श्ना और श्नु दोनों विकरण आते हैं और इनके अपितु शित् होने के कारण सार्वधातुकमपित् से धातुएँ डित् हो जाती हैं। अतः उपधाभूत नकार का अनिदितां हल उपधायाः विडन्ति से लोप हो जाता है। आर्धधातुक के परे रहते डित्त्वाभाव होने से लोप न हो पाने के कारण उपधाभूत नकार को अनुस्वार और परसवर्ण होकर स्तन्भ, स्तुन्भ, स्कन्भ और स्कुन्भ हो जाते हैं। लिट् में द्वित्व के बाद शर्पूर्वाः खयः से दो धातुओं में तकार और दो धातुओं में ककार शेष रह जाते हैं।
लट्-श्नुपक्ष- स्तभ्नोति, स्तभ्नुतः, स्तभ्नुवन्ति। यहाँ पर पूर्व में संयोग होने से हुश्नुवोः सार्वधातुके से यण् नहीं होता किन्तु अचि श्नुधातुभुवां य्वोरियडुवड्गै से उवड् हो जाता है। श्नापक्ष में स्तभ्नाति, स्तभ्नीतः। स्तभ्नन्ति। लिट्- तस्तन्भ, तस्तन्भुतः, तस्तन्भुः। तस्तन्भिथ। लुट्- स्तन्भिता। लृट्- स्तन्भिष्यति। लोट् के श्नु पक्ष में- स्तभ्नोतु-स्तभ्नुतात्,
स्तन्भुताम्, स्तन्भुवन्तु। श्ना के पक्ष में भी स्तन्भातु-स्तन्भीतात्, स्तन्भीताम्, स्तन्भुवन्तु बन जाने के बाद सिप् में कुछ विशेषता के लिए निम्नलिखित सूत्र प्रवृत्त होता है।