Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 20
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VṛttiGovind
LSK 686
गत्वविधायकं विधिसूत्रम्
हिनुमीना
Aṣṭādhyāyī 8.4.15
Vṛtti Varadarājācārya

उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्यैतयोर्नस्य णः स्यात्।

प्रमीणाति, प्रमीणीते। मिनातीत्यात्त्वम्। ममौ। मिम्यतुः। ममिथ, ममाथ।

मिम्ये। माता। मास्यति। मीयात्, मासीष्ट। अमासीत्। अमासिष्टाम्।

अमास्त। षिञ् बन्धने॥५॥

सिनाति, सिनीते। सिषाय, सिष्ये। सेता।

स्कुञ् आप्लवने॥६॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६८६- हिनुमीना। हिनुश्च मीनाश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वो हीनुमीनौ, तयोर्हीनुमीना इति लुप्तपष्ठीकं पदम्। यहाँ पर आचार्य ने विभक्ति के विना ही पढ़ा है। उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य से उपसर्गात् और रषाभ्यां नो णः समानपदे पूरा सूत्र अनुवृत्त होता है।

उपसर्गस्थ निमित्त से परे हिनु और मीना के नकार को णकार आदेश होता है। स्वादिगणीय हि धातु से श्नु और इस गण के मी धातु से श्ना करके हिनु और

मीना बन जाने के बाद उपसर्ग में यदि रेफ और षकार हो तो प्रत्यय वाले नकार को इससे णकार आदेश हो जाता है। स्मरण रहे कि सूत्रार्थ में उपसर्गस्थान्निमित्तात् का तात्पर्य रेफ और षकार ही है। स्वादि में प्र+हिनोति में प्रहिणोति रूप बन जाता है।

प्रमीणाति। प्र+मीनाति में उक्त सूत्र हिनुमीना से णत्व होकर प्रमीणाति बन जाता है। इसी तरह प्र+मीनीते से भी प्रमीणीते बनता है।

षिञ् बन्धने। यह धातु बाँधना अर्थ में है। ञकार की इत्संज्ञा होती है। धात्वादेः षः सः से सकार आदेश होता है। सि शेष रह जाता है। षोपदेश होने से सिषाय में आदेशावयव द्वितीय सकार को षत्व हो जायेगा। ञित् होने से उभयपदी तथा उदात्तों में न पढ़े जाने के कारण अनुदात्त है, अतः तासि आदि के परे अनिट् है किन्तु क्रादिनियम से लिट् में इट् हो जाता है साथ ही थल् में भारद्वाज के नियम से विकल्प से इट् होता है। इस धातु में आत्त्व का प्रसंग नहीं है, किन्तु ई हल्यघोः की प्रवृत्ति तो यथास्थान पर होती ही है। रूपमाला-

लट्- सिनाति, सिनीतः, सिनन्ति, सिनीते, सिनाते, सिनते। लिट्- सिषाय, सिष्यतुः, सिष्युः। सिष्ये, सिष्याते, सिष्यिरे। लुट्- सेता, सेतारौ, सेतारः, सेतासि, सेतासे। लृट्- सेष्यति, सेष्यते। लोट्- सिनातु-सिनीतात्, सिनीताम्, सिनन्तु। सिनीताम्, सिनाताम्, सिनताम्, लङ्- असिनात्, असिनीताम्, असिनन्। असिनीत, असिनीताम्, असिनत। विधिलिङ्- सिनीयात्, सिनीयाताम्, सिनीयुः। सिनीत, सिनीयाताम्, सिनीरन्। आशीर्लिङ्- सीयात्, सीयास्ताम्, सीयासुः। सेषीष्ट, सेषीयास्ताम्, सेषीरन्। लुङ्- सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु। असैषीत्, असैष्टाम्, असैषुः। असेष्ट, असेषाताम्, असेषत। लृङ्- असेष्यत्। असेष्यत।

स्कुञ् आप्रवणे। यह धातु कूदना, ऊपर उठाना अर्थ में है। ञकार की इत्संज्ञा होती है। स्कु शेष रह जाता है। ञित् होने से उभयपदी तथा उदात्तों में न पढ़े जाने के कारण अनुदात्त है, अतः तासि आदि के परे अनिट् होता है किन्तु क्रादिनियम से लिट् में नित्य से इट् हो जाता है साथ ही थल् में भारद्वाज के नियम से विकल्प से इट् होता है। इस धातु से आग्रेम सूत्र के द्वारा श्ना और श्नु दोनों का विधान किया गया है।