शपोऽपवादः। क्रीणाति। ई हल्यघोः। क्रीणीतः। श्नाभ्यस्तयोरातः।
क्रीणन्ति। क्रीणासि। क्रीणीथः। क्रीणीथ। क्रीणामि। क्रीणीवः।
क्रीणीमः। क्रीणीते। क्रीणाते। क्रीणते। क्रीणीषे। क्रीणाथे। क्रीणीध्वे।
क्रीणे। क्रीणीवहे। क्रीणीमहे। चिक्राय। चिक्रियतुः। चिक्रियुः।
चिक्रियथ-चिक्रेथ। चिक्रिय। चिक्रिये। क्रेता। क्रेष्यति-क्रेष्यते।
क्रीणातु-क्रीणीतात्। क्रीणीताम्। अक्रीणात्-अक्रीणीत। क्रीणीयात्-
क्रीणीत। क्रीयात्-क्रेषीष्ट। अक्रैषीत्-अक्रेष्ट। अक्रेष्यत्-अक्रेष्यत।
प्रीञ् तर्पणे कान्तौ च॥२॥
प्रीणाति, प्रीणीते। श्रीञ् पाके॥३॥
श्रीणाति, श्रीणीते। मीञ् हिंसायाम्॥४॥
डुक्रीञ् द्रव्यविनिमये॥१॥
धातु-प्रकरण में क्र्यादिप्रकरण का नवम स्थान है। क्री धातु आदि में होने के कारण क्र्यादिप्रकरण कहलाता है। जैसे भ्वादि में धातु और प्रत्ययों के बीच में विकरण के रूप में शप्, अदादि में शप् होकर उसका लुक्, जुहोत्यादि में शप् होकर श्लु, दिवादि में श्यन् और स्वादि में श्नु, तुदादि में श, रुधादि में श्नम् और तनादि में उ होते हैं, उसी प्रकार क्र्यादि में शप् को बाधकर श्ना होता है।
डुक्रीञ् द्रव्यविनिमये। डुक्रीञ् धातु द्रव्यों का परिवर्तन करना अर्थात् खरीदना अर्थ में है। डु की आदिर्ञिटुडवः से और जकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है। केवल क्री ही शेष रहता है। जित् होने के कारण यह उभयपदी हो जाता है। यह अनिट् अर्थात् तासि आदि में इट् न होने वाला धातु है।
६८५- क्र्यादिभ्यः श्ना। क्र्यादिभ्यः पञ्चम्यन्तम्, श्ना लुप्तप्रथमाकं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में कर्तरि शप् से कर्तरि और सार्वधातुके यक् से सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।
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कर्ता अर्थ में हुए सार्वधातुकसंज्ञक प्रत्यय के परे होने पर क्र्यादिगणपठित धातुओं से श्ना प्रत्यय होता है।
शकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा होती है। शित् होने से सार्वधातुक हैं और अपित् होने से सार्वधातुकमपित् से डित् हो जाता है। अतः इसके परे होने पर क्डिति च से निषेध होने के कारण गुण और वृद्धि नहीं होते। यह शप् का बाधक है।
क्रीणाति। क्री धातु से लट्, तिप्, शप् प्राप्त, उसे बाधकर श्ना, अनुबन्धलोप, क्री+ना+ति बना। क्री के रेफ से परे ना के नकार को अट्कुष्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि से णत्व होकर क्रीणाति रूप सिद्ध हो जाता है।
क्रीणीतः। क्री से द्विवचन तस्, श्ना करके क्री+ना+तस् बना। तस् डित् है, अतः उसके परे होने पर ना के आकार के स्थान पर ई हल्यघोः से ईकार आदेश हुआ, क्री+नी+तस् बना, णत्व और रुत्वविसर्ग करके क्रीणीतः सिद्ध हुआ।
क्रीणन्ति। वहुवचन में क्री+ना+अन्ति बनने के बाद श्नाभ्यस्तयोरातः से ना के आकार का लोप हुआ, नकार का णत्व करके वर्णसम्मेलन करने पर क्रीणन्ति सिद्ध हुआ। इसी प्रकार आगे भी हलादि डित् सार्वधातुक के परे ईत्व और अजादि डित् सार्वधातुक के परे होने पर आकार का लोप करने पर सभी रूप बन जायेंगे। लट् के रूप परस्मैपद में- क्रीणाति, क्रीणीतः, क्रीणन्ति। क्रीणासि, क्रीणीथः, क्रीणीथ। क्रीणामि, क्रीणीवः, क्रीणीमः। आत्मनेपद में- क्रीणीते, क्रीणाते, क्रीणते। क्रीणीषे, क्रीणाथे, क्रीणीध्वे। क्रीणे, क्रीणीवहे, क्रीणीमहे।
लिट् परस्मैपद में तिप्, णल्, अनुबन्धलोप होकर क्री+अ होने के बाद क्री को द्वित्व, हलादिशेष करके कीक्री अ बना। ह्रस्वः से प्रथम क्री के ईकार को ह्रस्व ईकार आदेश हुआ, किक्री+अ में कुहोश्चुः से चुत्व, चिक्री, अचो ज्यिति से वृद्धि, चिक्रै+अ, आय् आदेश, वर्णसम्मेलन करने पर चिक्राय रूप सिद्ध हुआ। अतुस् आदि में असंयोगाल्लिट् कित् से कित्व होकर गुण का निषेध होता है और अचि श्नुधातुभुवां य्वोरियङ्वडौ से ईकार के स्थान पर इयङ् आदेश होकर चिक्रियतुः आदि रूप सिद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिए।
लिट् परस्मैपद के रूप- चिक्राय, चिक्रियतुः, चिक्रियुः। चिक्रियथ-चिक्रेथ, चिक्रियथुः, चिक्रिय। चिक्राय-चिक्रय, चिक्रियिव, चिक्रियिम। आत्मनेपद में- चिक्रिये, चिक्रियाते, चिक्रियिरे। चिक्रियिषे, चिक्रियाथे, चिक्रियिद्वे-चिक्रियिध्वे। चिक्रिये, चिक्रियिवहे, चिक्रियिमहे।
लुट् परस्मैपद में- क्रेता, क्रेतारौ, क्रेतारः। क्रेतासि, क्रेतास्थः, क्रेतास्थ। क्रेतास्मि, क्रेतास्वः, क्रेतास्मः। आत्मनेपद में- क्रेता, क्रेतारौ, क्रेतारः। क्रेतासे, क्रेतासाथे, क्रेताध्वे। क्रेताहे, क्रेतास्वहे, क्रेतास्महे।
लृट् परस्मैपद में- क्रेष्यति, क्रेष्यतः, क्रेष्यन्ति। क्रेष्यसि, क्रेष्यथः, क्रेष्यथ। क्रेष्यामि, क्रेष्यावः, क्रेष्यामः। आत्मनेपद में- क्रेष्यते, क्रेष्येते, क्रेष्यन्ते। क्रेष्यसे, क्रेष्येथे, क्रेष्यध्वे। क्रेष्ये, क्रेष्यावहे, क्रेष्यामहे।
लोट् परस्मैपद में- क्रीणातु-क्रीणीतात्, क्रीणीताम्, क्रीणन्तु। क्रीणीहि-क्रीणीतात्, क्रीणीतम्, क्रीणीत। क्रीणानि। लोट् लकार के वस् और मस् में आडुत्तमस्य पिच्च से पित् आट्-आगम होने के कारण आकार का व्यवधान है। अतः हल् परे नहीं मिलता है जिससे
ईत्व नहीं होता और पित् होने के कारण आकार का लोप भी नहीं होता। अतः सवर्णदीर्घ होकर- क्रीणाव, क्रीणाम। आत्मनेपद में- क्रीणीताम्, क्रीणाताम्, क्रीणताम्। क्रीणीष्व, क्रीणाथाम्, क्रीणीध्वम्। क्रीणे, क्रीणावहे, क्रीणामहे।
लङ् परस्मैपद में- अक्रीणात्, अक्रीणीताम्, अक्रीणन्। अक्रीणाः, अक्रीणीतम्, अक्रीणीत। अक्रीणाम्, अक्रीणीव, अक्रीणीम। आत्मनेपद में- अक्रीणीत, अक्रीणाताम्, अक्रीणत। अक्रीणीथाः, अक्रीणाथाम्, अक्रीणीध्वम्। अक्रीणि, अक्रीणीवहि, अक्रीणीमहि।
विधिलिङ् परस्मैपद में- क्रीणीयात्, क्रीणीयाताम्, क्रीणीयुः। क्रीणीयाः, क्रीणीयातम्, क्रीणीयात। क्रीणीयाम्, क्रीणीयाव, क्रीणीयाम। आत्मनेपद में- क्रीणीत, क्रीणीयाताम्, क्रीणीरन्। क्रीणीथाः, क्रीणीयाथाम्, क्रीणीध्वम्। क्रीणीय, क्रीणीवहि, क्रीणीमहि।
आशीर्लिङ् में- क्रीयात्, क्रीयास्ताम्, क्रीयासुः। क्रीयाः, क्रीयास्तम्, क्रीयास्त। क्रीयासम्, क्रीयास्व, क्रीयास्म। आत्मनेपद में- क्रेषीष्ट, क्रेषीयास्ताम्, क्रेषीरन्। क्रेषीष्ठाः, क्रेषीयास्थाम्, क्रेषीढ्वम्। क्रेषीय, क्रेषीवहि, क्रेषीमहि।
लुङ् परस्मैपद में- सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से वृद्धि। अक्रैषीत्, अक्रैष्टाम्, अक्रैषुः। अक्रैषीः, अक्रैष्टम्, अक्रैष्ट। अक्रैषम्, अक्रैष्व, अक्रैष्म। आत्मनेपद में- सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण। अक्रैष्ट, अक्रैषाताम्, अक्रैषत। अक्रैष्ठाः, अक्रैषाथाम्, अक्रैढ्वम्, अक्रैषि, अक्रैष्वहि, अक्रैष्महि।
लृङ् परस्मैपद में- अक्रैष्यत्, अक्रैष्यताम्, अक्रैष्यन्। अक्रैष्यः, अक्रैष्यतम्, अक्रैष्यत। अक्रैष्यम्, अक्रैष्याव, अक्रैष्याम। आत्मनेपद में- अक्रैष्यत, अक्रैष्येताम्, अक्रैष्यन्त। अक्रैष्यथाः, अक्रैष्येथाम्, अक्रैष्यध्वम्। अक्रैष्ये, अक्रैष्यावहि, अक्रैष्यामहि।
प्रीञ् तर्पणे कान्तौ च। प्रीञ् धातु तृप्त करना, तृप्त होना, चमकना अर्थों में है। यह भी क्रीञ् धातु की तरह जित् होने से उभयपदी है। इसके भी रूप क्रीञ् की तरह ही चलते हैं। यहाँ पर लट् लकार के पूरे रूप और शेष लकारों के प्रथमपुरुष के एकवचन के ही रूप दिये जा रहे हैं, शेष रूप आप स्वयं बनाने का प्रयत्न करें।
लट् परस्मैपद में- प्रीणाति, प्रीणीतः, प्रीणन्ति। प्रीणासि, प्रीणीथः, प्रीणीथ। प्रीणामि, प्रीणीवः, प्रीणीमः। आत्मनेपद में- प्रीणीते, प्रीणाते, प्रीणते। प्रीणीषे, प्रीणाथे, प्रीणीध्वे। प्रीणे, प्रीणीवहे, प्रीणीमहे।
लिट्- पिप्राय-पिप्रिये। लुट्- प्रेता, प्रेतासि-प्रेतासे। लृट्- प्रेष्यति-प्रेष्यते। लोट्- प्रीणातु-प्रीणीताम्। लङ्- अप्रीणात्-अप्रीणीत। विधिलिङ्- प्रीणीयात्-प्रीणीत। आशीर्लिङ्- प्रीयात्-प्रेषीष्ट। लुङ्- अप्रैषीत्-अप्रेष्ट। लृङ्- अप्रेष्यत्-अप्रेष्यत।
श्रीञ् पाके। श्रीञ् धातु पकाना अर्थ में है। यह भी प्रीञ् धातु की तरह जित् होने से उभयपदी है। इसके भी रूप क्रीञ् की तरह ही चलते हैं। यहाँ पर लट् लकार के पूरे रूप और शेष लकारों के प्रथमपुरुष के एकवचन के ही रूप दिये जा रहे हैं, शेष रूप आप स्वयं बनाने का प्रयत्न करें।
लट् परस्मैपद में- श्रीणाति, श्रीणीतः, श्रीणन्ति। श्रीणासि, श्रीणीथः, श्रीणीथ। श्रीणामि, श्रीणीवः, श्रीणीमः। आत्मनेपद में- श्रीणीते, श्रीणाते, श्रीणते। श्रीणीषे, श्रीणाथे, श्रीणीध्वे। श्रीणे, श्रीणीवहे, श्रीणीमहे।
लिट्- शिश्राय-शिश्रिये। लृट्- श्रेता, श्रेतासि-श्रेतासे। लृट्- श्रेष्यति-श्रेष्यते।
लोट्- श्रीणातु-श्रीणीताम्। लङ्- अश्रीणात्-अश्रीणीत। विधिलिङ्- श्रीणीयात्-श्रीणीत।
आशीर्लिङ्- श्रीयात्-श्रेषीष्ट। लुङ्- अश्रेषीत्-अश्रेष्ट। लृङ्- अश्रेष्यत्-अश्रेष्यत।
मीञ् हिंसायाम्। यह धातु हिंसा करना अर्थ में है। ञकार की इत्संज्ञा होती है। मी शेष रह जाता है। ञित् होने से उभयपदी तथा उदात्तों में न पढ़े जाने के कारण अनुदात्त है, अतः तासि आदि के परे अनिट् है किन्तु क्रादिनियम से लिट् में इट् हो जाता है साथ ही थल् में भारद्वाज के नियम से विकल्प से इट् होता है।
लट् में मीनाति, ई हल्यघोः से ईत्त्व होकर मीनीतः, श्नाभ्यस्तयोरातः से आकार का लोप- मिनन्ति, मिनीते, मीनाते, मीनते आदि रूप बनते हैं। लिट् में मिनातिमिनोतिदीङां ल्यपि च से मी के ईकार को आत्त्व होकर मा बन जाता है। उसके बाद पपौ की तरह आत औ णलः से णल् के स्थान पर औकार आदेश, वृद्धि आदि होकर ममौ बनता है। अतुस् में कित्व होने से एज्निमित्त परे न मिलने के कारण आत्त्व नहीं होता। अतः मिमी+अतुस् में एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य से यण् होकर मिम्यतुः बन जाता है।
लिट् में इसके रूप- ममौ, मिम्यतुः, मिम्युः, ममिथ-ममाथ, मिम्यथुः, मिम्य, ममौ, मिम्यिव, मिम्यिम। मिम्ये, मिम्याते, मिम्यिरे, मिम्यिषे, मिम्याथे, मिम्यिढ्वे-मिम्यिध्वे, मिम्ये, मिम्यिवहे, मिम्यिमहे बनते हैं। लुट् में एज्निमित्त मिल जाने से मिनातिमिनोतिदीङां ल्यपि च से आत्त्व होकर- माता, मातारौ, मातारः, मातासि, मातासे। लृट् में- मास्यति, मास्यते। लोट् में- मीनातु-मीनीतात्, मीनीताम्, मीनन्तु, मीनीहि। आत्मनेपद में- मीनीताम्, मीनाताम् मीनताम्। लङ् में- अमीनात्, अमीनीताम्, अमीनन्। आत्मनेपद में- अमीनीत, अमीनीताम्, अमीनत। परस्मैपद विधिलिङ् में- मीनीयात्, मीनीयाताम्, मीनीयुः। आत्मनेपद में- मीनीत, मीनीयाताम्, मीनीरन्। आशीर्लिङ् में- मीयात्, मीयास्ताम्, मीयासुः। आत्मनेपद में- मासीष्ट, मासीयास्ताम्, मासीरन्। लृङ् में आत्त्व हो जाने के बाद यमरमनमातां सक् च से सक् और उसको इट् का आगम होकर- अमासीत्, अमासिष्टाम्, अमासिषुः आत्मनेपद में अमास्त, अमासाताम्, अमासत आदि रूप बनते हैं। लृङ् में- अमास्यत्, अमास्यत।