Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 19
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VṛttiGovind
LSK 684
सुडागमविधायकं विधिसूत्रम्
उपात् प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु
Aṣṭādhyāyī 6.1.139
Vṛtti Varadarājācārya

उपात्कृञः सुट् स्यादेष्वर्थेषु चात्प्रागुक्तयोरर्थयोः। प्रतियत्नो गुणाधानम्।

विकृतमेव वैकृतं विकारः। वाक्याध्याहार आकाङ्क्षितैकदेशपूरणम्। उपस्कृता कन्या।

उपस्कृता ब्राह्मणाः। एधो दकस्योपस्कुरुते। उपस्कृतं भुङ्क्ते। उपस्कृतं व्रूते। वनु

याचने॥७॥

वनुते। ववने। मनु अवबोधने॥८॥

मनुते। मेने। मनिता। मनिष्यते।

मनुताम्। अमनुत। मन्वीत। मनिषीष्ट। अमत, अमनिष्ट। अमनिष्यत॥

इति तनादिप्रकरणम्॥१९॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६८४- उपात्प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु च। प्रतियत्नश्च वैकृतश्च वाक्याध्याहारश्च

तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहाराः, तेषु। उपात् पञ्चम्यन्तं,

प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं त्रिपदं सूत्रम्। सम्परिभ्यां करोतौ

.....

भूषणे से करोतौ और भूषणे की समवाये च से समवाये की अनुवृत्ति तथा सुट् कात्पूर्वः

का अधिकार है।

उप उपसर्ग से परे कृ धातु को सुट् का आगम होता है, यदि प्रतियत्न,

वैकृत और वाक्याध्याहार गम्यमान हो तो।

सूत्र में च पढ़ा गया है, अतः पूर्व के सूत्रों से भूषणे, समवाये का अनुवर्तन

किया गया है। प्रतियत्नो गुणाधानम्। किसी वस्तु में नये गुणों का आधान अर्थात् उनको

उत्पन्न करना प्रतियत्न है। विकृतमेव विकारः। विकार को ही वैकृत कहा गया है।

वाक्याध्याहार आकाङ्क्षितैकदेशपूरणम्। आकांक्षित वाक्य के एकदेश अर्थात् पदों के

अध्याहार को वाक्याध्याहार कहा जाता है। ये तीनों और भूषण तथा समवाय अर्थ में भी

उप इस उपसर्ग परे कृ धातु को सुट् आगम का विधान किया गया।

प्रतियत्न का उदाहरण- एधो दकस्योपस्कुरुते। एधः=लकडी, दकस्य=जल

को उपस्कुरुते=उपस्कृत अर्थात् गुणयुक्त करती है। आयुर्वेद में विभिन्न लकड़ियों का गुण

जल में उतारने का प्रयोग मिलता है। इस तरह यहाँ पर प्रतियत्न अर्थात् गुणाधान अर्थ बन

रहा है। अतः उप+कुरुते में उपात्प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु च से सुट् होकर उपस्कुरुते

बन गया। कृ धातु यद्यपि उभयपदी है तथापि गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्न-

प्रकथनोपयोगेषु कृजः से प्रतियत्न अर्थ में केवल आत्मनेपद ही हुआ है।

वैकृत का उदाहरण- उपस्कृतं भुङ्क्ते। विकृत ढंग से खाता है। उप+कृतम् में

वैकृत अर्थ के आधार पर उपात्प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु च से सुट् आगम होकर

उपस्कृतम् बना है।

वाक्याध्याहार का उदाहरण- उपस्कृतं ब्रूते। वाक्यगत पदों का अध्याहार करते

हुए बोलता है। यहाँ पर भी उपात्प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु च से सुट् आगम हुआ है।

भूषण अर्थात् सजाना अर्थ का उदाहरण- उपस्कृता कन्या। सजी हुई कन्या।

यहाँ पर भी उपात्प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु च से सुट् का आगम हुआ है।

समवाय अर्थात् इकट्ठा होना अर्थ का उदाहरण- उपस्कृता ब्राह्मणाः। इकट्ठे

हुए ब्राह्मण। धातूनामनेकार्थाः अथवा शब्दानामनेकार्थाः अर्थात् शब्दों के अनेकार्थ होते हैं,

इस नियम के अनुसार उपस्कृत एक ही शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं।

यहाँ तक उभयपदी धातुओं का विवेचन करके अब आत्मनेपदी धातुओं का

विवेचन करते हैं।

वनु याचने। वनु धातु याचने अर्थात् मांगने अर्थ में है। उकार की इत्संज्ञा करके वन्

बचता है। यह उदित् होते हुए स्वरितेत् है, अतः आत्मनेपदी है और अनुदात्तों में परिगणित न होने

से सेट् है। तन् धातु के आत्मनेपद के रूपों की तरह इसके रूप होते हैं किन्तु लिट् में न

शसददवादिगुणानाम् से निषेध हो जाने के कारण एत्वाभ्यासलोप नहीं होता है।

वनु के रूप- लट्- वनुते, वन्वाते, वन्वते। लिट्- ववने, ववनाते, ववनिरे।

लुट्- वनिता, वनितारौ, वनितारः, वनितासे। लृट्- वनिष्यते, वनिष्येते, वनिष्यन्ते।

लुट्- वनुताम्, वन्वाताम्, वन्वताम्। लङ्- अवनुत, अवन्वाताम्, अवन्वत।

विधिलिङ्- वन्वीत, वन्वीयाताम्, वन्वीरन्। आशीर्लिङ्- वनिषीष्ट, वनिषीयास्ताम्, वनिषीरन्।

लुङ्- अवत-अवनिष्ट, अवनिषाताम्, अवनिषत, अवथाः-अवनिष्ठाः, अवनिषाथाम्, अवनिष्वम्,

अवनिषि, अवनिष्वहि, अवनिष्महि। लृङ्- अवनिष्यत, अवनिष्येताम्, अवनिष्यन्त।

मनु अवबोधने। मनु धातु अवबोधने अर्थात् जानना-मानना अर्थ में है। उकार की इत्संज्ञा करके मन् बचता है। यह उदित् होते हुए स्वरितेत् है, अतः आत्मनेपदी है और अनुदात्तों में परिगणित न होने से सेट् है। इसकी प्रक्रिया लगभग वन् धातु की तरह ही है किन्तु लिट् में अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि से एत्वाभ्यासलोप हो जाता है। वनु के रूप- लट्- मनुते, मन्वाते, मन्वते। लिट्- मेने, मेनाते, मेनिरे। लुट्- मनिता, मनितारौ, मनितारः, मनितासे। लृट्- मनिष्यते, मनिष्येते, मनिष्यन्ते। लुङ्- मेनुताम्, मन्वाताम्, मन्वताम्। लङ्- अमनुत, अमन्वाताम्, अमन्वत। विधिलिङ्- मन्वीत, मन्वीयाताम्, मन्वीरन्। आशीर्लिङ्- मनिषीष्ट, मनिषीयास्ताम्, मनिषीरन्। लुङ्- अमत-अमनिष्ट, अमनिषाताम्, अमनिषत, अमथाः-अमनिष्ठाः, अमनिषाथाम्, अमनिढ्वम्, अमनिषि, अमनिष्वहि, अमनिष्महि। लृङ्- अमनिष्यत, अमनिष्येताम्, अमनिष्यन्त।

धातु-प्रकरण में आप आठवाँ प्रकरण पूर्ण कर चुके हैं। धातु और धातु के रूपों का आपको अवश्य ज्ञान हो गया होगा। जितने धातु अभी तक बताये गये हैं, उनकी सिद्धि आप अच्छी तरह से कर सकें और सारे रूप मुखाग्र हों तो आगे बढ़ने में सुविधा होगी। आप पाणिनीयाष्टाध्यायी का मासिक पारायण कर ही रहे होंगे। प्रतिमाह एक अध्याय के नियम से पाठ करने पर आठ अध्याय आठ महीने में पूर्ण हो जाते हैं। इतने में ही सारे सूत्र मुखाग्र हो सकते हैं। यदि नहीं हो सके तो दुबारा आवृत्ति करने पर सोलह महीने में तो अवश्य ही कण्ठस्थ हो जायेंगे। आप प्रयास जारी रखें।

परीक्षा

द्रष्टव्यः- सभी प्रश्न अनिवार्य हैं और उनके अंक भी दिये गये हैं।

१-

अपनी पुस्तिका में तन् और कृ धातु के सारे रूप लिखें।

२५

३-

तन्, कृ, और मन् धातुओं के लिट्, लोट्, लङ् और लुङ् लकार के मध्यमपुरुष में सभी रूपों की सिद्धि दिखाइये।

२५

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का तनादि-प्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ क्र्यादयः