Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 19
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VṛttiGovind
LSK 683
समवाये च
Aṣṭādhyāyī 6.1.138
Vṛtti Varadarājācārya

सम्परिपूर्वस्य करोतेः सुट् स्याद् भूषणे संघाते चार्थे।

संस्करोति। अलङ्करोतीत्यर्थः। संस्कृर्वन्ति। सङ्घीभवन्तीत्यर्थः। सम्पूर्वस्य

क्वचिदभूषणेऽपि सुट्। संस्कृतं भक्षा इति ज्ञापकात्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६८३- समवाये च। समवाये सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। कौमुदीकार ने यहाँ

पर दोनों सूत्रों को सम्मिलित कर अर्थ किया है। यहाँ पर सुट् कात्पूर्वः इस सूत्र का अधि

कार आता है।

यदि सजाना या समूह अर्थ हो तो सम् और परि उपसर्ग से परे कृञ् धातु

के ककार से पहले ही सुट् आगम होता है।

सुट् में टकार और उकार की इत्संज्ञा होती है।

संस्करोति। सम् उपसर्गपूर्वक कृ धातु से संस्करोति रूप बनता है। करोति तो

आप बना ही चुके हैं। सम् और करोति के बीच में अर्थात् ककार से पहले सम्परिभ्यां

करोतौ भूषणे से सुट् का आगम, अनुबन्धलोप करके सम्+स्+करोति बना। मकार के स्थान

पर अनुस्वार करके वर्णसम्मेलन करने पर संस्करोति रूप बना। संस्करोति=संस्कार करता

है। परिष्करोति भी बनाइये। यहाँ पर सकार को षत्व होता है। सुट् होने से सम्+कृ से

संस्कृत भी बनता है।

संस्कुर्वन्ति। सम् उपसर्गपूर्वक कृ धातु से लट्, प्रथमपुरुष बहुवचन में संस्कुर्वन्ति

रूप बनता है। कुर्वन्ति तो आप बना ही चुके हैं। सम् और कुर्वन्ति के बीच में अर्थात् ककार

से पहले समवाये च से सुट् का आगम, अनुबन्धलोप करके सम्+स्+कुर्वन्ति बना। मकार

के स्थान पर अनुस्वार करके वर्णसम्मेलन करने पर संस्कुर्वन्ति रूप बना। इसका अर्थ हुआ

संघीभूत होते हैं या एकत्र होते हैं।

सम्पूर्वस्य क्वचिदभूषणेऽपि सुट्। संस्कृतं भक्षा इति ज्ञापकात्। सम्-पूर्वक कृ

धातु से कहीं-कहीं संस्कारभिन्न, भूषणभिन्न अर्थ में भी सुट् होता है, इसका प्रमाण है पाणिनि

जी का सूत्र संस्कृतं भक्षाः। यह सूत्र भक्ष्यविषयों को एक से दूसरे के मिलाने, सानने के

अर्थ में प्रत्यय का विधान करता है। वहाँ पर भक्ष्य अर्थ में संस्कृतम् का प्रयोग हुआ है

अर्थात् भक्ष्य वस्तुओं के सम्बन्ध में सुट् करके संस्कृत शब्द का प्रयोग किया गया है।