Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 19
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VṛttiGovind
LSK 680
उकारलोपविधायकं विधिसूत्रम्
नित्यं करोतेः
Aṣṭādhyāyī 6.4.108
Vṛtti Varadarājācārya

करोते: प्रत्ययोकारस्य नित्यं लोपो म्वो: परयो:।

कुर्व:। कुर्म:। कुरुते। चकार, चक्रे। कर्तासि, कर्तासे। करिष्यति,

करिष्यते। करोतु। कुरुताम्। अकरोत्, अकुरुत।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६८०- नित्यं करोते:। नित्यं प्रथमान्तं, करोते: पञ्चम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात् से प्रत्ययस्य और उत: की विभक्तिविपरिणाम करके तथा लोपश्चास्यान्यतरस्यां म्वो: से लोप: और म्वो: की अनुवृत्ति आती है।

मकार और वकार के परे होने पर कृ-धातु से परे प्रत्यय के उकार का नित्य से लोप होता है।

लोपश्चास्यान्यतरस्यां म्वो: से विकल्प से प्राप्त उकारलोप को बाधकर यह सूत्र नित्य से करता है।

कुर्व:, कुर्म:। कुर्+उ+वस्, कुर्+उ+मस् में वस् और मस् के वकार और मकार को आधार मानकर नित्यं करोते: से उकार का लोप हुआ। कुर्+वस्, कुर्+मस् बना,

वर्णसम्मेलन और सकार को रुत्वविसर्ग करने पर कुर्वः और कुर्मः सिद्ध हो गये। इस तरह कृधातु के लट् लकार परस्मैपद में रूप बने- करोति, कुरुतः, कुर्वन्ति। करोपि, कुरुथः, कुरुथ। करोमि, कुर्वः, कुर्मः। आत्मनेपद में- कुरुते, यण् करके कुर्वाते, कुर्वते। कुरुषे, कुर्वाथे, कुरुध्वे। कुर्वे, कुर्वहे, कुर्महे।

चकार। आपने गोपायाञ्चकार और एधाञ्चक्रे ये रूप उन प्रकरणों में बनाये थे न? उनकी प्रक्रिया में कृ और लिट् की प्रक्रिया का स्मरण करें। कृ से लिट्, तिप्, णल्, अ करके कृ+अ बना। द्वित्व, कृ+कृ अ। उरत्, रपर, कर्+कृ+अ, हलादिशेष, कुहोश्चुः से चुत्व, चकृ+अ, अचो ञ्णिति से रपर-सहित वृद्धि, चकार्+अ, वर्णसम्मेलन- चकार। आत्मनेपद में णित् न होने के कारण वृद्धि नहीं होती। अतः चकृ+ए में इको यणचि से यण् करके चक्रे बनता है। इस प्रकार से कृ-धातु के लिट् में रूप बने- परस्मैपद में- चकार, चक्रतुः, चक्रुः। चकर्थ, चक्रथुः, चक्र। चकार-चकर, चकृव, चकृम। आत्मनेपद में- चक्रे, चक्राते, चक्रिरे। चकृषे, चक्राथे, चकृढ्वे। चक्रे, चकृवहे, चकृमहे।

लृट् लकार के परस्मैपद में- कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः। कर्तासि, कर्तास्थः, कर्तास्थ। कर्तास्मि, कर्तास्वः, कर्तास्मः। आत्मनेपद में- कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः। कर्तासे, कर्तासाथे, कर्ताध्वे। कर्ताहे, कर्तास्वहे, कर्तास्महे।

करिष्यति। कृ धातु से लृट्, ति, स्य करके ऋद्धनोः स्ये से स्य को इट् आगम हुआ, टित् होने के कारण स्य के आदि में बैठा, कृ+इ+स्यति बना। स्य की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा करके कृ के ऋकार को सार्वधातुकार्धधातुकयोः से रपरसहित गुण करके कर्+इ+स्यति बना। इकार से परे सकार को पत्व करके वर्णसम्मेलन करने पर करिष्यति यह रूप बनता है।

लृट् लकार के परस्मैपद में- करिष्यति, करिष्यतः, करिष्यन्ति। करिष्यसि, करिष्यथः, करिष्यथ। करिष्यामि, करिष्यावः, करिष्यामः। आत्मनेपद में- करिष्यते, करिष्येते, करिष्यन्ते। करिष्यसे, करिष्येथे, करिष्यध्वे। करिष्ये, करिष्यावहे, करिष्यामहे।

लोट् परस्मैपद में- करोतु-कुरुतात्, कुरुताम्, कुर्वन्तु। कुरु-कुरुतात्, कुरुतम्, कुरुत। करवाणि, करवाव, करवाम। आत्मनेपद में- कुरुताम्, कुर्वाताम्, कुर्वताम्। कुरुष्व, कुर्वाथाम्, कुरुध्वम्। करवै, करवावहै, करवामहै।

लङ् परस्मैपद में- अकरोत्, अकुरुताम्, अकुर्वन्। अकरोः, अकुरुतम्, अकुरुत। अकरवम्, अकुर्व, अकुर्म। आत्मनेपद में- अकुरुत, अकुर्वाताम्, अकुर्वत। अकुरुथाः, अकुर्वाथाम्, अकुरुध्वम्। अकुर्वि, अकुर्वहि, अकुर्महि।