कृञ उलोपो यादौ प्रत्यये परे। कुर्यात्-कुर्वीत। क्रियात्, कृषीष्ट।
अकार्षीत्, अकृत। अकरिष्यत्, अकरिष्यत।
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६८१- ये च। ये सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में नित्यं करोतेः से करोतेः, उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात् से उतः और प्रत्ययात् का विभक्तिविपरिणाम करके तथा लोपश्चास्यान्यतरस्याम्बोः से लोपः की अनुवृत्ति आती है।
यकारादि प्रत्यय के परे होने पर कृ-धातु से परे प्रत्यय के उकार का लोप होता है।
कुर्यात्। कृ-धातु से विधिलिङ्, तिप्, यासुट्, गुण, उत्व आदि करके कृ+उ+यास्+त् बना। धातु से परे उकार का ये च से लोप हुआ, सकार का लिङ्ः सलोपोऽनन्त्यस्य से लोप हुआ, वर्णसम्मेलन हुआ- कुर्यात्। विधिलिङ् परस्मैपद के रूप- कुर्यात्, कुर्याताम्, कुर्यः। कुर्याः, कुर्यातम्, कुर्यात। कुर्याम्, कुर्याव, कुर्याम। आत्मनेपद में सीयुट् होकर सकार का लिङ्ः सलोपोऽनन्त्यस्य से लोप होता है, यकारादि प्रत्यय के अभाव में ये च नहीं लगता, यण्, वर्णसम्मेलन करके बनते हैं- कुर्वीत, कुर्वीयाताम्, कुर्वीरन्। कुर्वीथाः, कुर्वीयाथाम्, कुर्वीढ्वम्। कुर्वीय, कुर्वीवहि, कुर्वीमहि।
क्रियात्। कृ-धातु से आशीर्वाद अर्थ में लिङ्, तिप्, यासुट् करके कृ+यास्+त् बना है। यकारादि आर्धधातुक लिङ् परे है यास्, इसलिए रिङ् शयग्लिङ्क्षु से कृ के ऋकार के स्थान पर रिङ् आदेश, अनुबन्धलोप, कृ+रि+यास्+त् बना। सकार का स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से लोप हुआ, वर्णसम्मेलन हुआ, क्रियात्।
आशीर्लिङ् परस्मैपद में- क्रियात्, क्रियास्ताम्, क्रियासुः। क्रियाः, क्रियास्तम्, क्रियास्त। क्रियासम्, क्रियास्व, क्रियास्म। आत्मनेपद में- कृषीष्ट, कृषीयास्ताम्, कृषीरन्। कृषीष्टाः, कृषीयास्थाम्, कृषीढ्वम्। कृषीय, कृषीवहि, कृषीमहि।
लुङ् में तिप्, अट् आगम, च्लि, सिच्, अपृक्तहल् को ईट् आगम करके अकृ+स्+ईत् बना। सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से कृ के ऋकार की वृद्धि करके अकार्+स्+ईत् बना, सकार को षत्व और वर्णसम्मेलन करके अकार्षीत् बना। अकार्षीत्, अकार्ष्टाम्, अकार्षुः। अकार्षीः, अकार्ष्टम्, अकार्ष्ट। अकार्षम्, अकार्ष्व, अकार्ष्म।
अकृत। कृ धातु से लुङ्-लकार के आत्मनेपद में त, अट् आगम, च्लि, सिच् करके अकृ+स्+त बना। झल् के परे होने पर सकार का ह्रस्वादङ्गात् से लोप हुआ- अकृत। झल् परे न होने के कारण सकार का लोप नहीं हुआ- अकृषाताम् बना। अकृत, अकृषाताम्, अकृषत। अकृष्ठाः, अकृषाथाम्, अकृढ्वम्। अकृषि, अकृष्वहि, अकृष्महि।
लृङ्, परस्मैपद में- अकरिष्यत्, अकरिष्यताम्, अकरिष्यन्। अकरिष्यः, अकरिष्यतम्, अकरिष्यत। अकरिष्यम्, अकरिष्याव, अकरिष्याम। आत्मनेपद में- अकरिष्यत, अकरिष्येताम्, अकरिष्यन्त। अकरिष्यथाः, अकरिष्येथाम्, अकरिष्यध्वम्। अकरिष्ये, अकरिष्यावहि, अकरिष्यामहि।