Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 19
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VṛttiGovind
LSK 678
उकारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
अत उत् सार्वधातुके
Aṣṭādhyāyī 6.4.110
Vṛtti Varadarājācārya

उप्रत्ययान्तस्य कृजोऽकारस्य उः स्यात् सार्वधातुके किङ्ति। कुरुतः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६७८- अत उत्सार्वधातुके। अतः षष्ठ्यन्तम्, उत् प्रथमान्तं, सार्वधातुके सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं

सूत्रम्। उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात् से प्रत्ययात्, नित्यं करोतेः से करोतेः तथा

गमहनजनखनघसां लोपः किङ्त्यनङि से किङ्ति की अनुवृत्ति आती है।

सार्वधातुक कित् या ङित् के परे होने पर उप्रत्ययान्त कृ धातु के अकार के

स्थान पर ह्रस्व उकार आदेश होता है।

तिप्, सिप् और मिप् को छोड़कर अन्यत्र कृ को गुण होकर अकार और रपर होकर अर् हो जाने पर इस सूत्र की प्रवृत्ति होती है।

कुरुत:। कृ-धातु से लट्, तस्, शप् प्राप्त, उसे बाधकर उ-प्रत्यय, कृ+उ+तस् बना। उ आर्धधातुक है, उसके परे रहते कृ के ऋकार के स्थान पर सार्वधातुकार्धधातुकयो: से रपर-सहित अर्-गुण हुआ- कर्+उ+तस् बना। तस् यह सार्वधातुकमपित् से डित् होने के कारण सार्वधातुक होते हुए भी इसके परे रहते सार्वधातुकार्धधातुकयो: से उ को गुण नहीं हुआ, कर्+उ+तस् ही रहा। अत उत्सार्वधातुके से कर् में ककारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर उकार आदेश हुआ-कुर्+उ+तस् बना, वर्णसम्मेलन हुआ और सकार को रुत्वविसर्ग करके कुरुत: सिद्ध हुआ।