एषामाकारोऽन्तादेशः स्यात् सनि झलादौ क्ङिति॥
असात, असनिष्ट।
असाथाः, असनिष्ठाः। क्षणु हिंसायाम्॥३॥
क्षणोति, क्षणुते। ह्ययन्तेति न वृद्धिः। अक्षणीत्, अक्षत, अक्षणिष्ट।
अक्षथाः, अक्षणिष्ठाः। क्षिणु च॥४॥
उप्रत्यये लघूपधस्य गुणो वा।
क्षेणोति, क्षिणोति। क्षेणिता। अक्षेणीत्, अक्षित, अक्षेणिष्ट।
तृणु अदने॥५॥
तृणोति, तर्णोति, तृणुते, तर्णुते।
डुकृञ् करणे॥६॥
करोति॥
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६७७- जनसनखनां सञ्झलोः। जनश्च सनश्च खन् च तेषामितरेतरद्वन्द्वो जनसनखनः, तेषां जनसनखनाम्। सन् च झल् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः सञ्झलौ, तयोः। जनसनखनां षष्ट्यन्तं, सञ्झलोः सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। विड्वनोरनुनासिकस्यात् से आत् और अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि क्ङिति से क्ङिति की अनुवृत्ति आती है।
जन्, सन् और खन् धातुओं के नकार को आकार आदेश होता है सन् या झलादि कित्, डित् प्रत्ययों के परे रहने पर।
यह सूत्र अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि क्ङिति का बाधक है।
लुङ् के आत्मनेपद में असन्+स्+त बनने के बाद सिच् के सकार का तनादिभ्यस्तथासोः से वैकल्पिक लोप होकर असन्+त बना है। झलादि डित् है त क्योंकि सार्वधातुकमपित् से डिद्वन्द्व हुआ है। अतः जनसनखनां सञ्झलोः से नकार को आत्व होकर सर्वर्णदीर्घ हुआ- असात बना। सकार के लोप न होने के पक्ष में इट् का आगम होता है। अतः असन्+इस्+त बनने के बाद षत्व, ष्टुत्व करके असनिष्ट बन जाता है। यही प्रक्रिया थल् में भी अपनायी जाती है, जिससे असाथाः, असनिष्ठाः ये दो रूप बन जाते हैं।
षणु के रूप- लट्- सनोति, सनुतः, सन्वन्ति। सनुते, सन्वाते, सन्वते इत्यादि।
लिट्- ससान, सेनतुः, सेनुः। सेने, सेनाते, सेनिरे इत्यादि।
लृट्- सनिता, सनितारौ, सनितारः। सनितासे। सनितासाथे, सनिताध्वे इत्यादि।
लृट्- सनिष्यति, सनिष्यते। लृट्- सनोतु-सनुतात्, सनुताम्, सन्वन्तु। सनुताम्, सन्वाताम्।
लङ्- असनोत्, असनुताम्, असन्वन्। असनुत, असन्वाताम्, असन्वत।
विधिलिङ्- सनुयात्, सनुयाताम्, सनुयुः। सन्वीत, सन्वीयाताम्, सन्वीरन्।
आशीर्लिङ्- सायात्, सायास्ताम्, सायासुः। सन्यात्, सन्यास्ताम्, सन्यासुः। सनिषीष्ट,
सनिषीयास्ताम्, सनिषीरन् इत्यादि।
लुङ्- परस्मैपद के वृद्धिपक्ष में- असनोत्, असनिष्टाम्, असनिषुः आदि। वृद्धि न होने के पक्ष में- असनोत्, असनिष्टाम्, असनिषुः इत्यादि। आत्मनेपद में- असात-असनिष्ट, असनिषाताम्, असनिषत। असाथाः-असनिष्ठाः, असनिषाथाम्, असनिष्वम्। असनिषि, असनिष्वहि, असनिष्महि। लृङ्- असनिष्यत्, असनिष्यत इत्यादि।
क्षणु हिंसायाम्। क्षणु धातु हिंसा करना अर्थ में है। उकार की इत्संज्ञा होती है, क्षणु शेष रहता है। अतः यह धातु उदित् और स्वरितेत् है। उदित् का फल उदितो वा से क्त्वा को इट् विकल्प से होना है तो स्वरितेत् होने का फल उभयपदी होना है। अनुदात्तों में इसकी गणना नहीं है, अतः सेट् है। लुङ् लकार में ह्यगन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् से वृद्धि निषिद्ध हो जाती है। शेष लकारों में इसके रूप तन् धातु की तरह ही होते हैं। क्षणु के रूप- लट्- क्षणोति, क्षणुतः, क्षण्वन्ति। क्षणुते, क्षण्वाते, क्षण्वते इत्यादि।
लिट्- चक्षाण, चक्षणतुः, चक्षणुः। चक्षणे, चक्षणाते, चक्षणिरे इत्यादि।
लृट्- क्षणिता, क्षणितारौ, क्षणितारः। क्षणितासि। क्षणितासे, क्षणितासाथे, क्षणिताध्वे इत्यादि।
लृट्- क्षणिष्यति, क्षणिष्यते। लोट्- क्षणोतु-क्षणुतात्, क्षणुताम्, क्षण्वन्तु। क्षणुताम्, क्षण्वाताम्।
लङ्- अक्षणोत्, अक्षणुताम्, अक्षण्वन्। अक्षणुत, अक्षण्वाताम्, अक्षण्वत।
विधिलिङ्- क्षणुयात्, क्षणुयाताम्, क्षणुयुः। क्षण्वीत, क्षण्वीयाताम्, क्षण्वीरन्।
आशीर्लिङ्- क्षण्यात्, क्षण्यास्ताम्, क्षण्यासुः। क्षणिषीष्ट, क्षणिषीयास्ताम्, क्षणिषीरन् इत्यादि।
लुङ्-अक्षणीत्, अक्षणिष्टाम्, अक्षणिषुः इत्यादि। आत्मनेपद में- अक्षत-अक्षणिष्ट।
लृङ्- अक्षणिष्यत्, अक्षणिष्यत इत्यादि।
क्षिणु च। क्षिणु धातु भी हिंसा करना अर्थ में ही है। उकार की इत्संज्ञा होती है, क्षिणु शेष रहता है। यह धातु क्षणु की तरह ही है किन्तु ह्यगन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् की प्रवृत्ति नहीं होती क्योंकि उक्त सूत्र में पढ़ी गई धातुओं में क्षिणु धातु नहीं आती।
उप्रत्यये लघूपधस्य गुणो वा। उ-प्रत्यय के परे होने पर पुगन्तलघूपधस्य च से होने वाला लघूपधगुण विकल्प से होता है, यह कथन कौमुदीकार का है। कौमुदीकार का अभिप्राय यह है संज्ञापूर्वको विधिरनित्यः अर्थात् जिस विधि में संज्ञा निमित्त हो, वह विधि अनित्य होती है। इस परिभाषा के अनुसार पुगन्तलघूपधस्य च से होने वाली गुणविधि उपधासंज्ञा-निमित्तक होने से अनित्य है। अनित्य का मतलब है- कभी होना और कभी न होना। इसीलिए इसके क्षेणोति, क्षेणुतः आदि गुण वाले और क्षिणोति, क्षिणुतः आदि गुणभाव वाले रूप बनते हैं।
क्षणु के रूप- लट्- क्षेणोति, क्षेणुतः, क्षण्वन्ति। क्षिणोति, क्षिणुतः क्षण्वन्ति। क्षिणुते, क्षिण्वाते, क्षिण्वते।
लिट्- चिक्षेण, चिक्षिणतुः, चिक्षिणुः। चिक्षिणे, चिक्षिणाते, चिक्षिणिरे इत्यादि।
लुट्- क्षेणिता, क्षेणितारौ, क्षेणितारः। क्षेणितासि, क्षेणितास्थः। क्षेणितासे, क्षेणितासाथे, क्षेणिताध्वे।
लृट्- क्षेणिष्यति, क्षेणिष्यते। लुट्- क्षेणोतु-क्षेणुतात्, क्षेणुताम्, क्षेण्वन्तु। क्षिणोतु-क्षिणुतात्,
क्षिणुताम्, क्षिण्वन्तु। क्षेणुताम्, क्षेण्वाताम्, क्षेण्वताम्। क्षिणुताम्, क्षिण्वाताम्, क्षिण्वताम्।
लङ्- अक्षेणोत्, अक्षेणुताम्, अक्षेण्वन्। अक्षिणोत्, अक्षिणुताम्, अक्षिण्वन्। अक्षेणुत्, अक्षेण्वाताम्,
अक्षेण्वत। अक्षिणुत्, अक्षिण्वाताम्, अक्षिण्वत। विधिलिङ्- क्षेणुयात्, क्षेणुयाताम्, क्षेणुयुः।
क्षिणुयात्, क्षिणुयाताम्, क्षिणुयुः। क्षेण्वीत, क्षेण्वीयाताम्, क्षेण्वीरन्। क्षिण्वीत, क्षिण्वीयाताम्,
क्षिण्वीरन् इत्यादि। आशीर्लिङ्- क्षिण्यात्, क्षिण्यास्ताम्, क्षिण्यासुः। क्षिणिषीष्ट, क्षिणिषीयास्ताम्,
क्षिणिषीरन्। लुङ्-अक्षेणीत्, अक्षेणिष्टाम्, अक्षेणिषुः इत्यादि। आत्मनेपद मे- अक्षित-अक्षेणिष्ट।
लृङ्- अक्षेणिष्यत्, अक्षेणिष्यत इत्यादि।
तृणु अदने। तृणु धातु खाना अर्थ में है। उकार की इत्संज्ञा करके तृणु बचता है। यह
उदित्, उभयपदी और सेट् है। उ-प्रत्यय के परे रहने पर विकल्प से लघूपधगुण हो जाता है।
तृणु के रूप- लट्- तर्णोति-तृणोति। तर्णुते-तृणुते।
लिट्- ततर्ण, ततृणतुः, ततृणुः। ततृणे, ततृणाते, ततृणिरे।
लुट्- तर्णिता, तर्णितासि-तर्णितासे। लृट्- तर्णिष्यति, तर्णिष्यते।
लुट्- तर्णोतु-तृणोतु। तर्णुताम्-तृणुताम्। लङ्- अतर्णोत्, अतृणोत्। अतर्णुत-अतृणुत।
विधिलिङ्- तर्णुयात्-तृणुयात्। तर्ण्वीत, तृण्वीत। आशीर्लिङ्- तृण्यात्-तर्णिषीष्ट।
लुङ्- अतर्णीत्, अतर्णिष्टाम्, अतर्णिषुः। अतृत-अतर्णिष्ट, अतर्णिषाताम्, अतर्णिषत।
लृङ्- अतर्णिष्यत्, अतर्णिष्यत।
डुकृञ् करणे। डुकृञ् धातु का अर्थ है- करना। इसमें डु की आदिर्जिटुडवः
से इत्संज्ञा और जकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है, कृ मात्र बचता है।
डिवत् होने का फल डिवतः कित्रः से कित्र आदि प्रत्ययों का विधान होना है। उसके बाद
क्त्रेर्मम् नित्यम् से मप् प्रत्यय होकर पक्त्रिमम् आदि की सिद्धि होती है। जित् होने के कारण
यह धातु स्वरितजितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से उभयपदी बन जाता है। अनिट् है।
करोति। कृ-धातु से लट्, तिप्, शप् प्राप्त, उसे बाधकर उ-प्रत्यय, कृ+उ+ति
बना। उ आर्धधातुक है, उसके परे रहते कृ के ऋकार के स्थान पर सार्वधातुकार्धधातुकयोः
से रपर-सहित अर्-गुण हुआ- कर्+उ+ति बना। पुनः ति सार्वधातुक के परे रहते इसी सूत्र से
उ को भी ओ-गुण हुआ, कर्+ओ+ति बना, वर्णसम्मेलन हुआ- करोति सिद्ध हुआ।