Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 19
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VṛttiGovind
LSK 676
वैकल्पिकात्वविधायकं विधिसूत्रम्
ये विभाषा
Aṣṭādhyāyī 6.4.43
Vṛtti Varadarājācārya

जनसनखनामात्त्वं वा यादौ क्ङिति। सायात्, सन्यात्॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६७६- ये विभाषा। ये सप्तम्यन्तं, विभाषा प्रथमान्तम्। जनसनखनां सञ्झलोः से जनसनखनाम्

तथा विड्वनोरनुनासिकस्यात् से आत् और अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो

झलि क्ङिति से क्ङिति की अनुवृत्ति आती है।

जन्, सन् और खन् धातुओं के नकार को विकल्प से आकार आदेश होता

है यकारादि कित्, ङित् प्रत्ययों के परे रहने पर।

आत्व के लिए अग्रिम सूत्र जनसनखनां सञ्झलोः भी है किन्तु वह सन् और झलादि कित्, डित् के परे नित्य से करता है और यह यकारादि कित् डित् के परे विकल्प से करता है। यही अन्तर है इन दोनों सूत्रों में।

आशीर्लिङ् में यासुट् होने के बाद स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से सलोप करके सन्+या+त् बना है। इसमें यकारादि प्रत्यय मिलता है। अतः नकार के स्थान पर विकल्प से आत्व होकर स+आ+यात् बना। दीर्घ आदि करने पर सायात् बना। आत्व न होने के पक्ष में सन्यात् ही रहता है। आत्मनेपद में सनिषीष्ट बनता है।

लुङ् के परस्मैपद में इट् होने के कारण झलादि नहीं मिलता, इस लिए आत्व नहीं हुआ। अतो हलादेर्लघोः से वैकल्पिक वृद्धि होकर अतानीत्-अतनीत् ये दो रूप बनते हैं किन्तु आत्मनेपद में अग्रिम सूत्र की प्रवृत्ति होती है।