तनादेः सिचो वा लुक् स्यात् तथासोः।
अतत, अतनिष्ट। अतथाः, अतनिष्ठाः। अतनिष्यत्, अतनिष्यत।
षणु दाने॥२॥
सनोति, सनुते॥
६७५- तनादिभ्यस्तथासोः। तन् आदिर्येषां ते तनादयः, तेभ्यस्तनादिभ्यः। तश्च थाश्च
तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वस्तथासौ, तयोस्तथासोः। तनादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, तथासोः सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं
सूत्रम्। गातिस्थाधुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु से सिचः, ण्यक्षत्रियार्षजितो यूनि लुगणिजोः
से लुक् और विभाषा घ्राधेट्शाच्छासः से विभाषा की अनुवृत्ति आती है।
तनादिगणीय धातुओं से परे सिच् का विकल्प से लुक् होता है त और थास्
के परे होने पर।
अतत-अतनिष्ठ। तन् से लुङ् के आत्मनेपद में त आने के बाद अट्, सिच् होकर
अतन्+सत बना है। सिच् के सकार का तनादिभ्यस्तथासोः से वैकल्पिक लुक् होकर
अतन्+त बना। नकार का अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि क्ङिति
से लोप होकर अतत सिद्ध हुआ। सिच् के लुक् न होने के पक्ष में इट् का आगम, षत्व और
ष्टुत्व होकर अतनिष्ठ बनता है।
आत्मनेपद में- अतत-अतनिष्ठ, अतनिषाताम्, अतनिषत। अतथाः-अतनिष्ठाः,
अतनिषाथाम्, अतनिष्वम्। अतनिषि, अतनिष्वहि, अतनिष्महि।
लृङ् परस्मैपद में- अतनिष्यत्, अतनिष्यताम्, अतनिष्यन्। अतनिष्यः, अतनिष्यतम्,
अतनिष्यत। अतनिष्यम्, अतनिष्याव, अतनिष्याम। आत्मनेपद में- अतनिष्यत, अतनिष्येताम्,
अतनिष्यन्त। अतनिष्यथाः, अतनिष्येथाम्, अतनिष्यध्वम्। अतनिष्ये, अतनिष्यावहि, अतनिष्यामहि।
षणु दाने। षणु धातु देना अर्थ में है। धात्वादेः षः सः से आदि षकार के स्थान
पर सकार आदेश होता है और निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के नियम से णकार भी
नकार को प्राप्त होता है। उकार की इत्संज्ञा होती है, सन् शेष रहता है। इस तरह यह धातु
उदित् और स्वरितेत् है। उदित् का फल उदितो वा से क्त्वा को इट् विकल्प से होना है
तो स्वरितेत् होने से उभयपदी हो जाता है। अनुदात्तों में इसकी गणना नहीं है, अतः सेट् है।
आशीर्लिङ् और लुङ् लकारों में अग्रिम सूत्रों से आत्त्व हो जाने के कारण भिन्न रूप बनते
हैं और शेष लकारों में इसके रूप तन् धातु की तरह ही होते हैं।
सन् से लट्, तिप्, उ करके सन्+उ+ति बना है। गुण करके वर्णसम्मेलन करने
पर सनोति बन जाता है। आत्मनेपद में गुण नहीं होता। अतः सनुते बनता है। अन्य लकारों
के रूप भी बना लें और विशेष रूप के लिए अग्रिम सूत्रों को समझें।