Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 18
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VṛttiGovind
LSK 673
आत्मनेपदविधायकं विधिसूत्रम्
भुजोऽनवने
Aṣṭādhyāyī 1.3.66
Vṛtti Varadarājācārya

तङ्गानौ स्तः। ओदनं भुङ्क्ते। अनवने किम्? महीं भुनक्ति।

जिइन्धी दीप्तौ॥२१॥

इन्द्धे। इन्धाते। इन्धते। इन्त्से। इन्ध्वे। इन्धाञ्चक्रे। इन्धिता। इन्धाम्। इन्धाताम्। इनधै। ऐन्ध।

ऐन्धाताम्। ऐन्धाः। विद विचारणे॥२२॥

विन्ते। वेत्ता॥

इति रुधादयः॥१८॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६७३- भुजोऽनवने। न अवनम् अनवनं, तस्मिन् अनवने। भुजः पञ्चम्यन्तम्, अनवने सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।

पालन से भिन्न( भक्षण ) अर्थ में भुज धातु से आत्मनेपद होता है।

ओदनं भुङ्के। भक्षण अर्थ में आत्मनेपद होकर भुङ्के बना किन्तु रक्षण, पालन अर्थ में तो महीं भुनक्ति बनता है।

अनवने किम्? महीं भुनक्ति। यदि इस सूत्र में अनवने यह पद नहीं रखा जायेगा तो पालन और भक्षण दोनों अर्थों में आत्मनेपद होने लगेगा। भक्षण अर्थ में आत्मनेपद तो अभीष्ट है किन्तु पालन अर्थ में आत्मनेपद अभीष्ट नहीं है, उसे रोकने के लिए इस सूत्र में अनवने यह पद देकर अवन अर्थात् पालन अर्थ में आत्मनेपद होने से रोका गया।

भुङ्के, भुञ्जाते, भुञ्जते। बुभुजे, बुभुजाते, बुभुजिरे। भोक्ता, भोक्तासि। भोक्तासे। भोक्ष्यते। भुङ्काम्, भुञ्जाताम्, भुञ्जताम्, भुङ्क्ष्व। अभुङ्क, अभुञ्जाताम्, अभुञ्जत। भुञ्जीत, भुञ्जीयाताम्, भुञ्जीरन्। भुक्षीष्ट, भुक्षीयास्ताम्, भुक्षीरन्। अभुक्त, अभुक्षाताम्, अभुक्षत। अभोक्ष्यत।

जिइन्धी दीप्तौ। जिइन्धी धातु दीप्ति अर्थात् चमकना अर्थ में है। आदि में विद्यमान जि की आदिर्जिटुडवः से इत्संज्ञा होती है। अन्त्य ईकार तो इत्संज्ञक है ही। इस तरह इन्ध् शेष रह जाता है। अनुदात्ते होने से आत्मनेपदी और अनुदात्तों की पंक्ति में न होने से सेट् है। जीत् होने से कृत्प्रकरण में जीतः क्तः से वर्तमानकाल में क्त प्रत्यय हो जायेगा और ईदित् करने का फल वहीं कृदन्त में श्वीदितो निष्ठायाम् से इट् का निषेध है। इस धातु में यथासम्भव लकार के स्थान पर हुए तकार आदि के स्थान पर इपस्तथोर्धोऽधः से धत्व, झलां जशोऽन्ते से जश्त्व और झरो झरि सवर्णे से झर् का वैकल्पिक लोप आदि होंगे। लिट् में इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः से आम्, उसके बाद कृ, भू, अस् का अनुप्रयोग आदि भी होंगे।

इन्धे-इन्द्रे, इन्धाते, इन्धते, इन्त्से, इन्धाथे, इन्ध्वे-इन्द्र्वे, इन्धे, इन्ध्वहे, इन्ध्महे। इन्धाञ्चक्रे, इन्धाम्बभूव, इन्धामास। इन्धिता। इन्धिष्यते। इन्धाम्-इन्द्राम्, इन्धाताम्, इन्धताम्, इन्त्स्व। ऐन्ध-ऐन्द्र। इन्धीत। इन्धिषीष्ट। ऐन्धिष्ट। ऐन्धिष्यत।

विद विचारणे। विद धातु विचारण अर्थात् विचार करना अर्थ में है। अनुदात्त अकार की इत्संज्ञा होकर विद् शेष बचता है। धातु अनुदात्तों में परिगणित है, अतः अनिट् भी है किन्तु क्रादिनियम से लिट् में इट् हो जाता है।

विद् धातु को चार गणों में भिन्न-भिन्न अर्थों में पढ़ा गया है। जैसे- अदादि में विद ज्ञाने, दिवादि में विद सत्तायाम्, तुदादि में विद्लृ लाभे और इस गण में विद विचारणे। सबके अलग अलग रूप बनते हैं।

विन्ते-विन्ते, विन्दाते, विन्दते, विन्त्से, विन्दाथे, विन्द्र्वे, विन्दे, विन्द्रहे, विन्द्यहे। विविदे, विविदाते, विविदिरे। वेत्ता, वेत्तासे। वेत्त्यते। विन्ताम्। अविन्त। विन्दीत। वित्सीष्ट। अवित्त। अवेत्त्यत।

परीक्षा

द्रष्टव्य:-

सभी प्रश्न अनिवार्य हैं और उनके अंक भी दिये गये हैं।

१-

अपनी पुस्तिका में इस गण के सभी धातुओं के सारे रूप लिखें।

५०

२-

इस गण के सभी बाईस धातुओं के लङ् लकार प्रथम पुरुष के

एकवचन के रूपों की सिद्धि सूत्र लगाकर दिखायें।

२०

३-

श्नम् में शित् करने का तात्पर्य समझाइये।

४-

इस गण के ओदित् धातुओं में ओदित् का फल बताइये

१०

५-

षढोः कः सि और ष्टुना ष्टुः का प्रयोग करके इस गण के

किन्हीं पाँच प्रयोगों की सिद्धि दिखाइये।

१०

६-

पूर्वप्रकरण से इस प्रकरण की तुलना में एक पेज का लेख लिखिये-५

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

रुधादिप्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ तनादयः