अञ्जेः सिचो नित्यमिद् स्यात्।
आञ्जीत्॥ तञ्चू संकोचने॥१५॥
तनक्ति।
तञ्चिता, तङ्क्ता॥ ओविजी भयचलनयोः॥१६॥
विनक्ति, विङ्क्तः। विज इडिति डित्वम्। विविजिथ। विजिता। अविनक्।
अविजीत्॥ शिष्लृ विशेषणे॥१७॥
शिनष्टि। शिष्टः। शिषन्ति। शिनक्षि।
शिशेष। शिशेषिथ। शेष्टा। शेक्ष्यति। हेर्धिः। शिण्ड्ढि। शिनषाणि।
अशिनट्। शिंष्यात्। शिष्यात्।
अशिषत्। एवं पिष्लृ संचूर्णने॥ १८॥
भञ्जो आमर्दने॥१९॥
श्नान्नलोपः। भनक्ति। बभञ्जिथ, बभङ्क्थ।
भङ्क्ता।
भङ्गिध। अभाङ्क्षीत्॥ भुज पालनाभ्यवहारयोः॥२०॥
भुनक्ति। भोक्ता। भोक्ष्यति। अभुनक्।
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६७२- अञ्जेः सिचि। अञ्जेः पञ्चम्यन्तं, सिचि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इडत्यर्तिव्ययतीनाम् से इट् की अनुवृत्ति आती है।
अञ्जू धातु से परे सिच् को नित्य से इट् का आगम होता है।
स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा से विकल्प से प्राप्त इट् को बाध कर यह नित्य से इट् का आगम करता है।
आञ्जीत्। आ+अञ्ज्+स्+ईत् होने के बाद विकल्प से प्राप्त इट् को बाधकर अञ्जेः सिचि से नित्य से इट् आगम हुआ- बीच के सकार का इट ईटि से लोप होने पर इ+ई में सवर्णदीर्घ करके आ+अ में आटश्च से वृद्धि करके आञ्जीत् सिद्ध हो जाता है। आञ्जीत्, आञ्जिष्टाम्, आञ्जिषुः आदि। लृङ्- आञ्जिष्यत्, आङ्क्ष्यत्।
तञ्चू संकोचने। तञ्चू धातु संकोचन अर्थात् संकुचित करना अर्थ में है। यह भी अञ्जू की तरह नकारोपध, परस्मैपदी और ऊदित होने के कारण वेट् है। इसकी सारी प्रक्रिया अञ्जू की तरह होती है किन्तु जब खरि च से चर्त्व की आवश्यकता नहीं होती और लृङ् में अञ्जेः सिचि नहीं लगता अर्थात् विकल्प से इट् होता है।
लृट् में- तनक्ति, तङ्क्तः, तञ्चन्ति, तनक्षि, तङ्क्थः, तङ्क्थ, तनच्मि, तञ्च्वः, तञ्च्मः। लिट् में- तिप्, णल्, द्वित्व, ततञ्च, ततञ्चतुः, ततञ्चुः। लृट्- तञ्चिता-तङ्क्ता। लृट्- तञ्चिष्यति-तङ्क्ष्यति। लोट्- तनक्तु। लङ्- अतनक्-अतनग्। विधिलिङ्- तञ्च्यात्। आशीर्लिङ्- तच्यात्। लृङ् के इडभावपक्ष में वदव्रजहलन्तस्याचः से वृद्धि और इट्पक्ष में नेटि से निषेध होकर अतञ्चीत्-अताङ्क्षीत् बनते हैं। लृङ्- अतञ्चिष्यत्-अतङ्क्ष्यत्।
ओविजी भयचलनयोः। ओविजी धातु डरना और चलना अर्थ में है। ओकार और ईकार इत्संज्ञक हैं, विज् बचता है। उदात्तेत् होने से परस्मैपदी है, सेट् है। विज इट् से इडादि प्रत्ययों को ङिद्धद्भाव होता है। विनक्ति, विङ्क्तः, विञ्जन्ति। विवेज, विविजतुः। विजिता। विजिष्यति। विनक्तु। अविनक्। विञ्यात्। विज्यात्। अविजीत्। अविजिष्यत्।
शिष्लृ विशेषणे। शिष्लृ धातु विशेषण अर्थात् विशेषित करना, विशेष करके बताना आदि अर्थों में है। उदात्त लृकार की इत्संज्ञा होकर शिष् शेष रहता है। परस्मैपदी है किन्तु अनुदात्तों में परिगणित होने से अनिट् है। लिट् में क्रादिनियम से इट् होता है। लृदित् का प्रयोजन पुषादिद्युताद्यलृदितः परस्मैपदेषु की प्रवृत्ति है। अन्त में षकार होने के कारण इसके योग में प्रत्यय के तकार आदि को ष्टुत्व हो जाता है। स्य आदि के परे षकार को षढोः कः सि से ककार होकर उसके योग में आगे के सकार को षत्व और ककार तथा षकार के योग में क्षत्व आदि तो होते ही हैं।
शिनष्टि, शिंष्टः, शिंषन्ति, शिनक्षि, शिंष्टः, शिंष्ठ, शिनष्मि, शिंष्वः, शिंष्मः। शिशेष, शिशिषतुः, शिशिषुः, शिशेषिथ-शिशिष्ठ, शिशिषथुः, शिशिष, शिशेष, शिशिषिव, शिशिषिम। शेष्टा। शेक्ष्यति। शिनष्टु-शिंष्टात्, शिंष्टाम्, शिंषन्तु, शिण्ढि-शिंष्टात्, शिंष्टम्, शिंष्ट, शिनषाणि, शिनषाव, शिनषाम। अशिनट्-अशिनड्। शिंष्यात्। शिष्यात्। लृङ् में लृदित्त्वादङ् होकर- अशिषत्, अशिषताम्, अशिषन् आदि। अशेक्ष्यत्।
पिष्लृ सञ्चूर्णने। पिष्लृ धातु संचूर्णन अर्थात् पीसना अर्थ में है। उदात्त लृकार की इत्संज्ञा होकर पिष् शेष रहता है। परस्मैपदी है किन्तु अनुदात्तों में परिगणित होने से अनिट् है। लिट् में क्रादिनियम से इट् होता है। लृदित् का प्रयोजन पुषादिद्युताद्यूलृदितः परस्मैपदेषु की प्रवृत्ति है। अन्त में षकार होने के कारण इसके योग में प्रत्यय के तकार आदि को ष्टुत्व हो जाता है। स्य आदि के परे षकार को षढोः कः सि से ककार होकर उसके योग में आगे के सकार को षत्व, ककार तथा षकार के योग में क्षत्व आदि तो होते ही हैं।
पिनष्टि, पिंष्टः, पिंषन्ति, पिनक्षि, पिंष्ठः, पिंष्ठ, पिनष्मि, पिंष्वः, पिंष्मः। पिपेष, पिपिषतुः। पेष्टा। पेक्ष्यति। पिनष्टु-पिंष्टात्, पिंष्टाम्, पिंषन्तु, पिण्ढि-पिंष्टात्, पिंष्टम्, पिंष्ट, पिनषाणि, पिनषाव, पिनषाम। अपिनट्-अपिनड्। पिंष्यात्। पिष्यात्। लुङ् में लृदित्त्वादङ् होकर- अपिषत्, अपिषताम्, अपिषन् आदि। अपेक्ष्यत्।
भञ्जो आमर्दने। भञ्जो धातु आमर्दन अर्थात् तोड़ना अर्थ में है। उदात्त ओकार की इत्संज्ञा होने के कारण ओदित् और परस्मैपदी है। ओदित् होने का फल क्त और क्तवतु प्रत्ययों के तकार को ओदितश्च से नकारादेश करना है। अनुदात्तों में परिगणित है, अतः अनिट् है। यह धातु मूल रूप में भन्ज् है, जकार के योग में श्चुत्व होकर जकार बना है। अतः श्नान्नलोपः से श्नम् के उत्तरवर्ती जकार बने नकार का लोप हो जाता है।
भनक्ति। भङ्क्तः, भञ्जन्ति, भनक्षि, भङ्क्थः, भङ्क्थ, भनज्मि, भञ्ज्वः, भञ्ज्मः। बभञ्ज, बभञ्जतुः, बभञ्जुः। भङ्क्ता। भङ्क्ष्यति। भनक्तु। अभनक्-अभनग्। भञ्ज्यात्। भज्यात्। अभाङ्क्षीत्। अभङ्क्ष्यत्।
भुज पालनाभ्यवहारयोः। भुज धातु पालन और भक्षण करना अर्थों में है। उदात्त अकार की इत्संज्ञा होती है, भुज् शेष रहता है। यह पालन करना अर्थ में परस्मैपदी है और भक्षण करना अर्थ में अग्रिम सूत्र भुजोऽनवने से आत्मनेपदी हो जाता है। अनुदात्तों में परिगणित होने से अनिट् भी है किन्तु लिट् में क्रादिनियम से इट् हो जाता है।
भुनक्ति। भङ्क्तः, भुञ्जन्ति, भुनक्षि, भङ्क्थः, भङ्क्थ, भुनज्मि, भुञ्ज्वः, भुञ्ज्मः। बुभोज, बुभुजतुः, बुभुजुः। भोक्ता। भोक्ष्यति। भुनक्तु। अभुनक्-अभुनग्। भुञ्ज्यात्। भुज्यात्। अभोक्षीत्। अभोक्ष्यत्।
यहाँ तक परस्मैपद धातुओं का वर्णन हुआ। अब आत्मनेपदी धातुओं का
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वर्णन करते हैं। भुज धातु पालन अर्थ में परस्मैपदी था, अब भक्षण अर्थ में आत्मनेपद के लिए सूत्र उपस्थापित करते हैं-