पदान्तस्य धातोः सस्य रुः स्याद्वा, पक्षे दः।
अहिनः, अहिनत्, अहिनद्।
उन्दी क्लेदने॥१३॥
उनत्ति। उन्तः।
उन्दन्ति। उन्दाञ्चकार। औनत्, औनद्। औन्ताम्। औन्दन्। औनः,
औनत्, औनद्।
औनदम्। अञ्जू व्यक्तिप्रक्षणकान्तिगतिषु॥१४॥
अनक्ति। अङ्क्तः। अञ्जन्ति। अङ्क्ता। आनञ्ज। आनञ्जिथ, आनङ्क्थ।
अञ्जिता, अङ्क्ता। अङ्गिध। अनजानि। आनक्।।
६७१-सिपि धातो रुर्वा। सिपि सप्तम्यन्तं, धातोः षष्ठ्यन्तं, रुः प्रथमान्तं, वा अव्ययपदम्,
अनेकपदमिदं सूत्रम्। ससजुषो रुः से सः की अनुवृत्ति आती है और पदस्य का अधिकार
आ रहा है।
सिप् के परे होने पर धातु के पदान्त सकार को विकल्प से रु आदेश होता
है।
रुत्व न होने के पक्ष में झलां जशोऽन्ते से दकार ही हो जाता है।
अहिनः, अहिनत्, अहिनद्। सिप् में अहिनस्+स् बनने के बाद अपृक्त सकार
का हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप होकर अहिनस् बना। सकार के स्थान पर
झलां जशोऽन्ते से दकार आदेश प्राप्त था, उसे बाधकर सिपि धातो रुर्वा से वैकल्पिक
रुत्व हुआ। उसके बाद रेफ को विसर्ग करके अहिनः यह रूप बना। रुत्व वैकल्पिक है, न
होने के पक्ष में झलां जशोऽन्ते से दकार आदेश होकर वैकल्पिक चर्त्व करने पर तिप् की
तरह सिप् में भी अहिनत्, अहिनद् ये दो रूप बन गये। इस तरह सिप् में तीन रूप बने। लङ् के रूप- अहिनत्-अहिनद्, अहिंस्ताम्, अहिंसन्, अहिनः-अहिनत्-अहिनद्, अहिंस्तम्, अहिंस्त, अहिनसम्, अहिंस्व, अहिंस्म।
विधिलिङ्- हिंस्यात्, हिंस्याताम्, हिंस्युः। आशीर्लिङ्- हिंस्यात्, हिंस्यास्ताम्, हिंस्यासुः आदि। लुङ्- अहिंसीत्, अहिंसिष्टाम्, अहिंसिषुः आदि। लृङ्- अहिंसिष्याम्।
उन्दी क्लेदने। उन्दी धातु भीगोना, गीला करना अर्थ में है। ईकार की इत्संज्ञा होती है। यह धातु उदात्त है और उदात्तेत् होने से सेट् व परस्मैपदी भी है। लिट् में इजादि और गुरुमान् होने के कारण इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः से आम् होकर कृ, भू, अस् का अनुप्रयोग आदि होते हैं।
उनत्ति, उन्तः, उन्दन्ति। उन्दाञ्चकार, उन्दाम्बभूव, उन्दामास। उन्दिता। उन्दिष्यति। उन्दतु। औनत्-औनद्। उन्द्यात्। उद्यात्। औन्दीत्। औन्दिष्यत्।
अञ्जू व्यक्तिप्रक्षणकान्तिगतिषु। अञ्जू धातु विवेचन करना, स्निग्ध करना, चमकना और गति अर्थों में है। जकारोत्तरवर्ती उदात्त ऊकार की इत्संज्ञा होती है, अतः ऊदित् कहलाता है। उदात्तेत् होने से परस्मैपदी और ऊदित् होने से स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा से वेट् हो जाता है। जकार के पहले के नकार के स्थान पर चुत्व होकर जकार बना हुआ है। लोप के प्रसंग में नकार मानकर ही उसका श्नान्नलोपः से लोप हो जाता है।
लट् के तिप् में- अनक्ति। तस् में नकार के लोप और श्नसोरल्लोपः से अकार के लोप होने पर अन्ज्+तस् बना है। जकार को चोः कुः से कुत्व होकर गकार और गकार को खरि च से चर्त्व होकर ककार हो जाता है, फिर नकार को अनुस्वार और परसवर्ण करने पर डकार हो जाता है। इस तरह अङ्क्तस् इस स्थिति में रुत्वविर्गः होकर अङ्क्तः ऐसा रूप बन जाता है। बहुवचन में कुत्व आदि की प्राप्ति नहीं है। अतः अञ्जन्ति बनता है। आगे- अनक्षि, अङ्क्थः, अङ्क्थ, अनज्मि, अञ्ज्वः, अञ्ज्मः। लिट् में- तिप्, णल्, द्वित्व, अत आदेः से दीर्घ एवं तस्मान्नुड् द्विहलः से नुट् का आगम होकर आनञ्ज बनता है। आगे- आनञ्जतुः, आनञ्जुः, आनञ्जिथ-आनङ्क्थ, आनञ्जथुः, आनञ्ज, आनञ्ज,
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आनञ्जिव-आनञ्ज्य, आनञ्जिम-आनञ्ज्म बनते हैं। लृट्- अञ्जिता-अङ्क्ता। लृट्- अञ्जिष्यति-अङ्क्ष्यति। लोट्- अनक्तु। लङ्- आनक्-आनग्। विधिलिङ्- अञ्यात्। आशीर्लिङ्- अज्यात्।