Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 18
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VṛttiGovind
LSK 670
दत्त्वविधायकं विधिसूत्रम्
तिप्यनस्तेः
Aṣṭādhyāyī 8.2.73
Vṛtti Varadarājācārya

पदान्तस्य सस्य दः स्यात्तिपि न त्वस्तेः। ससजुषोरुरित्यस्यापवादः।

अहिनत्, अहिनद्। अहिंस्ताम्। अहिंसन्।।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६७०-तिप्यनस्तेः। न अस्ति: अनस्ति, तस्य अनस्तेः। तिपि सप्तम्यन्तम्, अनस्तेः षष्ठ्यन्तं,

द्विपदमिदं सूत्रम्। पदस्य का अधिकार आ रहा है। ससजुषोः रुः से सः की तथा

वसुम्रसंसुध्वंस्वनडुहां दः से दः की अनुवृत्ति आ रही है।

तिप् परे होने पर पदान्त सकार को दकार आदेश होता है किन्तु अस् धातु

के सकार को नहीं होता।

यह सूत्र ससजुषो रुः का अपवाद है।

अहिनत्-अहिनद्। लङ् लकार में नुम्, तिप्, अट्, शनम् करने के बाद नुम् वाले

नकार का लोप करके अहिन+स्त् बना है। तकार का हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल्

से लोप करके अहिन+स् बना। सकार के स्थान पर तिप्यनस्तेः से दकार आदेश करके

अहिनद् बना। दकार को वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करके अहिनत्, अहिनद् ये दो रूप

सिद्ध होते हैं। द्विवचन और बहुवचन में पूर्ववत् शनसोरल्लोपः से अकार का लोप होकर

अहिंस्ताम्, अहिंसन् ये रूप बनते हैं।