Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 18
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VṛttiGovind
LSK 667
श्नम्-विधायकं विधिसूत्रम्
रुधादिभ्यः श्नम्
Aṣṭādhyāyī 3.1.78
Vṛtti Varadarājācārya

शपोऽपवादः। रुणद्धि। श्नसोरल्लोपः- रुन्धः। रुन्धन्ति। रुणत्सि। रुन्धः।

रुन्ध। रुणद्वि। रुन्ध्वः। रुन्ध्मः। रुन्धे। रुन्धाते। रुन्धते। रुन्त्से। रुन्धाथे।

रुन्ध्वे। रुन्धे। रुन्ध्वहे। रुन्ध्महे। रुरोध-रुरुधे। रोद्धासि-रोद्धासे।

रोत्स्यति-रोत्स्यते। रुणद्धु-रुन्धात्। रुन्धाम्। रुन्धन्तु। रुन्धि।

रुणधानि। रुणधाव। रुणधाम। रुन्धाम्। रुन्धाताम्। रुन्धताम्। रुन्त्स्व।

रुणधै। रुणधावहै। रुणधामहै। अरुणत्-अरुणद्। अरुन्धाम्। अरुन्धन्।

अरुणः। अरुणत्-अरुणद्। अरुन्ध। अरुन्धाताम्। अरुन्धत। अरुन्धाः।

रुन्ध्यात्। रुन्धीत। रुध्यात्। रुत्सीष्ट। अरुधत्, अरोत्सीत्। अरुद्ध।

अरुत्साताम्। अरुत्सत। अरोत्स्यत्, अरोत्स्यत।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

रुधिर् आवरणे॥१॥

धातु-प्रकरण में रुधादिप्रकरण सातवाँ है। रुधिर् धातु आदि में होने के कारण यह रुधादिप्रकरण कहलाता है। जैसे भ्वादि में धातु और प्रत्ययों के बीच में विकरण के रूप में शप्, अदादि में शप् होकर उसका लुक्, जुहोत्यादि में शप् होकर श्लु, दिवादि में श्यन् और स्वादि में श्नु और तुदादि में श हुए, उसी प्रकार रुधादि में शप् को बाधकर श्नम् होता है। श्नम् में मकार की हलन्त्यम् से तथा शकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप होकर केवल न बचता है। मित् होने के कारण मिदचोऽन्त्यात्परः के नियम से अन्त्य अच् के बाद बैठेगा। रुध् में रु के बाद और ध् के पहले बैठेगा। न शित् है, अतः उसकी तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा होती है। सार्वधातुक होते हुए भी अपित् है, अतः इसको सार्वधातुकमपित् से ङिद्धद्भाव हो जाता है। ङित् होने से इसके पूर्व को प्राप्त गुण और वृद्धि का विङ्ति च से निषेध होता है। इसलिए न के परे होने पर पूर्व को गुण और वृद्धि दोनों ही नहीं होते। श्नम् करने के पहले भी गुणवृद्धि नहीं कर सकते, क्योंकि रुधादिभ्यः श्नम् से श्नम् और गुण-वृद्धि एक साथ प्राप्त होते हैं और श्नम् के नित्य होने के कारण पहले नित्यकार्य श्नम् ही होता है।

भिदिर् विदारणे॥२॥ छिदिर् द्वैधीकरणे॥३॥ युजिर् योगे॥४॥

रिचिर् विरेचने॥५॥ रिणक्ति, रिङ्क्ते। रिरेच। रेक्ता। रेक्ष्यति। अरिणक्।

अरिचत्, अरैक्षीत्, अरिक्त। विचिर् पृथग्भावे॥६॥ विनक्ति, विङ्क्ते।

क्षुदिर् सम्पेषणे॥७॥ क्षुणत्ति, क्षुन्ते। क्षोत्ता। अक्षुदत्। अक्षौत्सीत्,

अक्षुत्त। उच्छृदिर् दीप्तिदेवनयोः॥८॥ छृणत्ति, छृन्ते। चच्छर्द। सेऽसिचीति

वेट्। चच्छृदिषे, चच्छृत्से। छर्दिता। छर्दिष्यति, छर्त्स्यति। अच्छृदत्,

अच्छर्दीत्, अच्छर्दिष्ट। उतृदिर् हिंसानादरयोः॥९॥ तृणन्ति, तृन्ते॥

कृती वेष्टने॥१०॥ कृणत्ति॥ तृह, हिसि हिंसायाम्॥११-१२॥

.....

रुधिर् आवरणे। रुधिर् धातु रोकने अर्थ में है। इसमें इर् की इर इत्संज्ञा वाच्या इस वार्तिक से इत्संज्ञा होती है, रुध् शेष रहता है। स्वरित इ की इत्संज्ञा होने के कारण यह धातु स्वरितेत् है, अतः उभयपदी है। अनिट् होते हुए भी लिट् में इट् होता है।

६६७- रुधादिभ्यः शनम्। रुधादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, शनम् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में कर्तरि शप् से कर्तरि और सार्वधातुके यक् से सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।

कर्ता अर्थ में हुए सार्वधातुकसंज्ञक प्रत्यय के परे होने पर रुधादिगणपठित धातुओं से शप् का बाधक शनम् प्रत्यय होता है।

रुणद्धि। रुधिर् धातु है। इर इत्संज्ञा वाच्या से इर् की इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप होकर रुध् बचा। रुध् से लट्, तिप्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप् प्राप्त, उसे बाधकर रुधादिभ्यः शनम् से शनम्, अनुबन्धलोप करके अन्त्य अच् रु में जो उकार, उसके बाद न बैठा, रुनध् ति बना। रेफ से परे नकार के स्थान पर अट्कुप्वाङ्नुम्ब्यवायेऽपि से णत्व हुआ और झषस्तथोर्धोऽधः से झष् है रुध् में धकार, उससे परे प्रत्यय के तकार के स्थान पर धकार आदेश हुआ- रुणध्+धि बना। रुणध्+धि में प्रथम धकार के स्थान पर झलां जश् झशि से जश्त्व होकर द् आदेश हुआ, रुणद्+धि बना, वर्णसम्मेलन हुआ- रुणद्धि।

रुन्धः। रुध् से तस्, शनम्, अनुबन्धलोप, रुनध् तस् बना। सार्वधातुकमपित् से तस् ङित् है, अतः शनसोरल्लोपः से न के अकार का लोप हुआ, रुनध् तस् बना। झषस्तथोर्धोऽधः से तस् के तकार को धकार आदेश हुआ, प्रथम धकार का झरो झरि सवर्णे से वैकल्पिक लोप हुआ- रुन्+धस् बना। नकार को अट्कुप्वाङ्नुम्ब्यवायेऽपि से णत्व और नश्चापदान्तस्य झलि से अनुस्वार प्राप्त है। दोनों त्रिपादी हैं, किन्तु णत्वविधायक सूत्र के परत्रिपादी होने के कारण पूर्वत्रिपादी अनुस्वारविधायक सूत्र के प्रति णत्वविधान असिद्ध होने के कारण अनुस्वार ही हुआ और अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से अनुस्वार को परसवर्ण होकर पुनः नकार ही बन गया। वर्णसम्मेलन और सकार को रुत्वविसर्ग होने पर रुन्धः सिद्ध हुआ। धकार के लोप न होने के पक्ष में प्रथम धकार को जश्त्व करके दकार बनने पर रुन्द्धः सिद्ध होता है।

रुन्धन्ति। रुध् से झि, अन्त् आदेश, शनम्, अनुबन्धलोप, रुनध्+अन्ति बना। सार्वधातुकमपित् से अन्ति ङित् है, अतः शनसोरल्लोपः से न के अकार का लोप हुआ, रुनध्+अन्ति बना। नकार के स्थान पर नश्चापदान्तस्य झलि से अनुस्वार और अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से परसवर्ण होकर पुनः नकार ही बन गया, वर्णसम्मेलन हुआ- रुन्धन्ति।

रुणत्सि। रुध् से सिप्, शनम्, अनुबन्धलोप, रुनध् सि बना। पित् होने के कारण सार्वधातुकमपित् से सि डित् न हो सका, अतः शनसोरल्लोपः से न के अकार का लोप भी नहीं हुआ, रुनध्+सि है। नकार को णत्व और धकार को जश्त्व करके दकार हुआ, रुणद्+सि बना। सकार के परे होने पर दकार के स्थान पर खरि च से चर्त्व होकर तकार आदेश हुआ, रुणत्+सि बना, वर्णसम्मेलन होकर रुणत्सि सिद्ध हुआ।

रुन्धः। रुन्ध। रुध् से थस्, शनम्, अनुबन्धलोप, रुनध् थस् बना। सार्वधातुकमपित् से थस् डित् है, अतः शनसोरल्लोपः से न के अकार का लोप हुआ, रुनध् थस् बना। झषस्तथोर्धोऽधः से थस् के थकार को धकार आदेश हुआ, प्रथम धकार का झरो झरि सवर्णे से वैकल्पिक लोप हुआ- रुन्+धस् बना, नकार के स्थान पर नश्चापदान्तस्य झलि से अनुस्वार और अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से परसवर्ण होकर पुनः नकार ही बन गया। वर्णसम्मेलन और सकार का रुत्वविसर्ग हुआ- रुन्धः। धकार के लोप न होने के पक्ष में प्रथम धकार को जश्त्व करके दकार बनने पर रुन्द्धः सिद्ध होता है। इसी प्रकार बहुवचन में रुन्ध, रुन्द्ध भी बनाइये।

रुणद्वि। रुध् से मिप्, शनम्, अनुबन्धलोप, रुनध् मि बना। पित् होने के कारण सार्वधातुकमपित् से मि डित् न हो सका, अतः शनसोरल्लोपः से न के अकार का लोप भी नहीं हुआ, रुनध्+मि है। नकार को णत्व और धकार को जश्त्व करके दकार हुआ, रुणद्+मि बना, वर्णसम्मेलन होकर रुणद्वि सिद्ध हुआ।

रुन्ध्वः। रुन्ध्मः। रुध् से वस्, शनम्, अनुबन्धलोप, रुनध् वस् बना। सार्वधातुकमपित् से वस् डित् है, अतः शनसोरल्लोपः से न के अकार का लोप हुआ, रुनध् वस् बना। नकार के स्थान पर नश्चापदान्तस्य झलि से अनुस्वार और अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से परसवर्ण होकर पुनः नकार ही बन गया। वर्णसम्मेलन और सकार को रुत्वविसर्ग- रुन्ध्वः। इसी तरह रुन्ध्मः भी बनाइये। इस तरह से रुध् धातु के परस्मैपद लट् में रूप सिद्ध हुए- रुणद्धि, रुन्धः-रुन्द्धः, रुन्धन्ति। रुणत्सि, रुन्धः-रुन्द्धः, रुन्ध-रुन्द्ध। रुणद्वि, रुन्ध्वः, रुन्ध्मः।

आत्मनेपद में पित् न होने के कारण सभी नौ प्रत्यय सार्वधातुकमपित् से डित् हैं। इसलिए सभी रूपों में शनसोरल्लोपः से न के अकार का लोप होता है। तस्, थस् और थ के तकार, थकार के स्थान पर झषस्तथोर्धोऽधः से धकार आदेश, अनुस्वार, परसवर्ण, एत्व झरो झरि सवर्णे से वैकल्पिक धकार का लोप करके रूप बनाइये- रुन्धे-रुन्द्धे, रुन्धाते, रुन्धते (आत्मनेपदेष्वनतः )। रुन्त्से, रुन्धाथे, रुन्ध्वे-रुन्द्ध्वे। रुन्धे, रुन्ध्वहे, रुन्ध्महे।

लिट्-लकार में तिप्, णल्, द्वित्व आदि करके रूप बनाइये- रुरोध, रुरुधतुः, रुरुधुः। रुरोधिथ, रुरुधथुः, रुरुध। रुरोध, रुरुधिव, रुरुधिम। आत्मनेपद में- रुरुधे, रुरुधाते, रुरुधिरे। रुरुधिषे, रुरुधाथे, रुरुधिध्वे। रुरुधे, रुरुधिवहे, रुरुधिमहे।

लुट्-लकार में लघूपधगुण, तास् के तकार के स्थान पर झषस्तथोर्धोऽधः से धकार आदेश, जश्त्व आदि करके रूप बनते हैं- परस्मैदपद- रोद्धा, रोद्धारौ, रोद्धारः। रोद्धासि, रोद्धास्थः, रोद्धास्थ। रोद्धास्मि, रोद्धास्वः, रोद्धास्मः। आत्मनेपद- रोद्धा, रोद्धारौ, रोद्धारः। रोद्धासे, रोद्धासाथे, रोद्धाध्वे। रोद्धाहे, रोद्धास्वहे, रोद्धास्महे।

लोट् परस्मैपद में एरुः से उत्व, धत्व, जश्त्व आदि करके- रुणद्धु, रुन्धात्-रुन्द्धात्, रुन्धाम्-रुन्द्धाम्, रुन्धन्तु। सिप् में- सेह्विपिच्च से हि आदेश और हि के स्थान पर हुइत्न्थ्यो

हेर्धिः से धि आदेश करके रुन्धि-रुन्द्धि तातङ् के पक्ष में रुन्धात्-रुन्द्धात् बनते हैं। आगे- रुन्धम्-रुन्द्धम्, रुन्ध-रुन्द्ध, आद् आगम- आदुत्तमस्य पिच्च से- पित् होने से डित् नहीं है, अतः अकार का लोप भी नहीं हुआ- रुणधानि, रुणधाव, रुणधाम। आत्मनेपद में- रुन्धाम्-रुन्द्धाम्, रुन्धाताम्, रुन्धताम्। रुन्त्स्व, रुन्धाथाम्, रुन्ध्वम्-रुन्द्ध्वम्। रुणधै, रुणधावहै, रुणधामहै।

लङ्-लकार परस्मैपद में- प्रथमपुरुष एकवचन में अरुन्ध्+ति इस स्थिति में हल्ङ्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से अपृक्त तकार का लोप होकर पदान्त में विद्यमान धकार को झलां जशोऽन्ते से जश्त्व करके दकार और उसके स्थान पर वावसाने से चर्त्व करके तकार करने पर दो रूप अरुणत् और अरुणद् बनते हैं। इसी प्रकार सिप् में भी बनते हैं पर यहाँ दश्च से रुत्व होकर अरुणः भी बनता है।

लङ्-लकार परस्मैपद में- अरुणत्-अरुणद्, अरुन्धाम्-अरुन्द्धाम्, अरुन्धन्। अरुणः-अरुणत्-अरुणद्, अरुन्धम्-अरुन्द्धम्, अरुन्ध-अरुन्द्ध। अरुणधम्, अरुन्ध्व, अरुन्ध्म। आत्मनेपद में- अरुन्ध-अरुन्द्ध, अरुन्धाताम्, अरुन्धत। अरुन्धाः-अरुन्द्धाः, अरुन्धाथाम्, अरुन्ध्वम्-अरुन्द्ध्वम्। अरुन्धि, अरुन्ध्वहि, अरुन्ध्महि। विधिलिङ् परस्मैपद में- रुन्ध्यात्, रुन्ध्याताम्, रुन्ध्युः। रुन्ध्याः, रुन्ध्यातम्, रुन्ध्यात। रुन्ध्याम्, रुन्ध्याव, रुन्ध्याम। आत्मनेपद में- रुन्धीत, रुन्धीयाताम्, रुन्धीरन्। रुन्धीथाः, रुन्धीयाथाम्, रुन्धीध्वम्। रुन्धीय, रुन्धीवहि, रुन्धीमहि। आशीर्लिङ् परस्मैपद में- रुध्यात्, रुध्यास्ताम्, रुध्यासुः। रुध्याः, रुध्यास्तम्, रुध्यास्त। रुध्यासम्, रुध्यास्व, रुध्यास्म। आत्मनेपद में- रुत्सीष्ट, रुत्सीयास्ताम्, रुत्सीरन्। रुत्सीष्ठाः, रुत्सीयास्थाम्, रुत्सीध्वम्। रुत्सीय, रुत्सीवहि, रुत्सीमहि।

लङ् परस्मैपद में- इरितो वा से च्लि को विकल्प से अङ् आदेश होने के कारण बनते हैं- अरुधत्, अरुधताम्, अरुधन्, अरुधः, अरुधतम्, अरुधत, अरुधम्, अरुधाव, अरुधाम। अङ् न होने के पक्ष में च्लि के स्थान पर सिच् होकर वदव्रजहलन्तस्याचः से वृद्धि होकर धकार को चर्त्व करके बनते हैं- अरौत्सीत्, अरौद्धाम्, अरौत्सुः। अरौत्सीः, अरौद्धम्, अरौद्ध। अरौत्सम्, अरौत्स्व, अरौत्स्म। आत्मनेपद में- अरुद्ध, अरुत्साताम्, अरुत्सत। अरुद्धाः, अरुत्साथाम्, अरुध्वम्-अरुद्ध्वम्। अरुत्सि, अरुत्स्वहि, अरुत्स्महि।

लृङ् परस्मैपद में- अरोत्स्यत्, अरोत्स्यताम्, अरोत्स्यन्। अरोत्स्यः, अरोत्स्यतम्, अरोत्स्यत। अरोत्स्यम्, अरोत्स्याव, अरोत्स्याम। आत्मनेपद में- अरोत्स्यत, अरोत्स्येताम्, अरोत्स्यन्त। अरोत्स्यथाः, अरोत्स्येथाम्, अरोत्स्यध्वम्। अरोत्स्ये, अरोत्स्यावहि, अरोत्स्यामहि।

भिदिर् विदारणे। भिदिर् धातु तोड़ना, फाड़ना, चीरना अर्थ में है। इसमें भी इर् की इत्संज्ञा होती है, भिद् अवशिष्ट रहता है। इसके रूप भी रुध् की तरह ही बनते हैं। यहाँ पर इरो इरि सवर्णे से जहाँ-जहाँ झर् का लोप हो सकता है, वहाँ के लोपपक्ष के रूप दे रहे हैं। लोप न होने के पक्ष के रूप आप अपने आप समझ सकते हैं।

लट् परस्मैपद- भिनत्ति, भिन्तः, भिन्दन्ति। भिनत्सि, भिन्थः, भिन्थ। भिनद्मि, भिन्द्वः, भिन्द्मः। आत्मनेपद- भिन्ते, भिन्दाते, भिन्दते। भिन्त्से, भिन्दाथे, भिन्ध्वे। भिन्दे, भिन्द्वहे, भिन्द्महे।

लिट् परस्मैपद- बिभेद, बिभिदतुः, बिभिदुः। बिभेदिथ, बिभिदथुः, बिभिद। बिभेद, बिभिदिव, बिभिदिम। आत्मनेपद- बिभिदे, बिभिदाते, बिभिदिरे। बिभिदिषे, बिभिदाथे, बिभिदिध्वे। बिभिदे, बिभिदिवहे, बिभिदिमहे।

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लृट् परस्मैपद- भेत्ता, भेत्तारौ, भेत्तारः। भेत्तासि, भेत्तास्थः, भेत्तास्थ। भेत्तास्मि, भेत्तास्वः, भेत्तास्मः। आत्मनेपद-भेत्ता, भेत्तारौ, भेत्तारः। भेत्तासे, भेत्तासाथे, भेत्ताध्वे। भेत्ताहे, भेत्तास्वहे, भेत्तास्महे।

लृट् परस्मैपद- भेत्स्यति, भेत्स्यतः, भेत्स्यन्ति। भेत्स्यसि, भेत्स्यथः, भेत्स्यथ। भेत्स्यामि, भेत्स्यावः, भेत्स्यामः। आत्मनेपद- भेत्स्यते, भेत्स्येते, भेत्स्यन्ते। भेत्स्यसे, भेत्स्येथे, भेत्स्यध्वे। भेत्स्ये, भेत्स्यावहे, भेत्स्यामहे। लृट् परस्मैपद- भिनत्तु-भिन्तात्, भिन्ताम्, भिन्दन्तु। हुझल्भ्यो हेधिः- भिन्धि-भिन्तात्, भिन्तम्, भिन्त। भिनदानि, भिनदाव, भिनदाम। आत्मनेपद- भिन्ताम्, भिन्दाताम्, भिन्दताम्। भिन्त्स्व, भिन्दाथाम्, भिन्ध्वम्। भिनदै, भिनदावहै, भिनदामहै। लृट्परस्मैपद- अभिनत्-अभिनद्, अभिन्ताम्, अभिन्दन्। अभिनः- अभिनत्-अभिनद्, अभिन्तम्, अभिन्त। अभिनदम्, अभिन्द्व, अभिन्द्व। आत्मनेपद- अभिन्द, अभिन्दाताम्, अभिन्दत। अभिन्थाः, अभिन्दाथाम्, अभिन्ध्वम्। अभिन्दि, अभिन्द्वहि, अभिन्द्वाहि। विधिलिङ् परस्मैपद- भिन्द्वात्, भिन्द्वाताम्, भिन्द्वुः। भिन्द्वाः, भिन्द्वातम्, भिन्द्वात। भिन्द्वाम्, भिन्द्वाव, भिन्द्वाम। आत्मनेपद- भिन्दीत, भिन्दीयाताम्, भिन्दीरन्। भिन्दीथाः, भिन्दीयाथाम्, भिन्दीध्वम्। भिन्दीय, भिन्दीवहि, भिन्दीमहि। आशीर्लिङ् परस्मैपद- भिद्यात्, भिद्यास्ताम्, भिद्यासुः। भिद्याः, भिद्यास्तम्, भिद्यास्त। भिद्यासम्, भिद्यास्व, भिद्यास्म। आत्मनेपद- भित्सीष्ट, भित्सीयास्ताम्, भित्सीरन्। भित्सीष्ठाः, भित्सीयास्थाम्, भित्सीध्वम्। भित्सीय, भित्सीवहि, भित्सीमहि। लृङ्- अङ् के पक्ष में- अभिदत्, अभिदताम्, अभिदन्, अभिदः, अभिदतम्, अभिदत, अभिदम्, अभिदाव, अभिदाम। सिच् के पक्ष में- अभैत्सीत्, अभैत्ताम्, अभैत्सुः। अभैत्सीः, अभैत्तम्, अभैत्त। अभैत्सम्, अभैत्स्व, अभैत्स्म। आत्मनेपद- अभित्त, अभित्साताम्, अभित्सत। अभित्थाः, अभित्साथाम्, अभिध्वम्। अभित्सि, अभित्स्वहि, अभित्स्महि। लृङ् परस्मैपद- अभेत्स्यत्, अभेत्स्यताम्, अभेत्स्यन्। अभेत्स्यः, अभेत्स्यतम्, अभेत्स्यत। अभेत्स्यम्, अभेत्स्याव, अभेत्स्याम। आत्मनेपद- अभेत्स्यत, अभेत्स्येताम्, अभेत्स्यन्त। अभेत्स्यथाः, अभेत्स्येथाम्, अभेत्स्यध्वम्। अभेत्स्ये, अभेत्स्यावहि, अभेत्स्यामहि।

छिदिर् द्वैधीकरणे। छिदिर् धातु दो टुकड़े करने अर्थ में है। इसमें भी इर् की इत्संज्ञा होकर छिद् बचता है और इसके रूप भी भिद् की तरह ही चलते हैं। सभी लकारों के दोनों पदों के प्रथमपुरुष एकवचन के रूप मात्र दिये जा रहे हैं। शेष रूपों को आप स्वयं बनाने का प्रयत्न करें।

छिनत्ति-छिन्ते। लिट् में छे च से तुक् आगम और तकार को स्तोः श्चुना श्चुः से चुत्व होकर चिच्छेद-चिच्छेद बनते हैं। छेत्तासि-छेत्तासे। छेत्स्यति-छेत्स्यते। छिनत्तु-छिन्ताम्। अच्छिनत्-अच्छिन्त। छिन्द्यात्-छिन्दीत। छिद्यात्-छित्सीष्ट। अच्छिदत्-अच्छैत्सीत्-अच्छित्त। अच्छेत्स्यत्-अच्छेत्स्यत।

युजिर् योगे। युजिर् धातु जोड़ने, मिलाने आदि अर्थ में है। इसमें भी इर् की इत्संज्ञा होती है, युज् बचता है और इसके रूप भी भिद् की तरह ही चलते हैं। चोः कुः से कुत्व होकर जब अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से परसवर्ण होता है तो ककार के परे रहते अनुस्वार के स्थान पर डकार आदेश और जकार के परे रहने पर जकार आदेश होकर युङ्क्तः, युञ्जन्ति जैसे रूप बनते हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

लृट् और लृङ् में कुत्व करके जकार के स्थान पर गकार आदेश और खरि च से चर्त्व करके गकार के स्थान पर ककार आदेश करना चाहिए। इसके बाद ककार से परे

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सकार को आदेशप्रत्यययोः से पत्व कर के ककार-पकार के संयोग से क्षु बनता है जिससे योक्ष्यति-योक्ष्यते आदि रूप बनते हैं। इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए।

अन्य धातुओं की तरह युज् धातु के एक-एक रूप सिद्ध करने के लिए आप बैठ जायें तो समस्त रूपों की सिद्धि कर सकेंगे। यहाँ पर युज् धातु के सभी लकारों के दोनों पदों के प्रथमपुरुष एकवचन के रूप मात्र दिये जा रहे हैं। शेष रूपों को आप स्वयं बनाने का प्रयत्न करें।

युनक्ति-युङ्क्ते। युयोज-युयुजे। योक्तासि-योक्तासे। योक्ष्यति-योक्ष्यते। युनक्तु-युङ्क्ताम्। अयुनक्-अयुङ्क्त। युञ्च्यात्-युञ्जीत। युज्यात्-युक्षीष्ट। अयुजत्-अयौक्षीत्-अयुक्त। अयोक्ष्यत्-अयोक्ष्यत।

रिचिर् विरेचने। रिचिर् धातु विरेचन अर्थात् निकालना, खाली करना अर्थों में है। इर् की इत्संज्ञा के बाद रिच् बचता है। स्वरितेत् होने के कारण उभयपदी और चकारान्त अनुदात्त होने के कारण अनिट् है फिर भी लिट् में क्रादिनियम से नित्य से इट् होता है। इसकी प्रक्रिया युज् धातु की तरह ही होती है। अन्तर यह है कि रिच् में रेफ होने के कारण शनम् के नकार को णत्व होता है।

रिणक्ति-रिङ्क्ते। रिरेच-रिरिचे। रेक्ता, रेक्तासि-रेक्तासे। रेक्ष्यति-रेक्ष्यते। रिणक्तु-रिङ्क्तात्, रिङ्क्ताम्, रिञ्चन्तु। रिङ्क्ताम्, रिञ्चाताम्, रिञ्चताम्। अरिणक्-अरिणग्, अरिङ्क्ताम्, अरिञ्चन्। अरिङ्क्त, अरिञ्चाताम्, अरिञ्चत। रिञ्च्यात्-रिञ्चीत। रिच्यात्-रिक्षीष्ट। अरिचत्-अरैक्षीत्-अरिक्त। अरेक्ष्यत्-अरेक्ष्यत।

विचिर् पृथग्भावे। विचिर् धातु पृथग्भाव अर्थात् अलग करना अर्थ में है। इर् की इत्संज्ञा के बाद विच् बचता है। स्वरितेत् होने के कारण उभयपदी और चकारान्त अनुदात्त होने के कारण अनिट् है फिर भी लिट् में क्रादिनियम से नित्य इट् होता है। इसकी प्रक्रिया रिचिर् धातु की तरह ही होती है। अन्तर यह है कि विच् में रेफ न होने के कारण शनम् के नकार को णत्व नहीं होता है।

विनक्ति-विङ्क्ते। विवेच-विविचे। वेक्तासि-वेक्तासे। वेक्ष्यति-वेक्ष्यते। विनक्तु-विङ्क्ताम्। अविनक्-अविङ्क्त। विञ्च्यात्-विञ्चीत। विच्यात्-विक्षीष्ट। अविचत्-अवैक्षीत्-अविक्त। अवेक्ष्यत्-अवेक्ष्यत।

क्षुदिर् सम्पेषणे। क्षुदिर् धातु सम्पेषण अर्थात् पीसना, मसलना, चूर्ण करना आदि अर्थों में है। इर् की इत्संज्ञा के बाद क्षुद् बचता है। स्वरितेत् होने के कारण उभयपदी और अनुदात्त होने के कारण अनिट् है फिर भी लिट् में क्रादिनियम से नित्य से इट् होता है। इसकी प्रक्रिया छिदिर् धातु की तरह ही होती है। अन्तर यह है कि क्षुदिर् में ष् होने के कारण शनम् के नकार को णत्व होता है।

क्षुणत्ति-क्षुन्ते। चुक्षोद-चुक्षुदे। क्षोत्ता, क्षोत्तासि-क्षोत्तासे। क्षोत्स्यति-क्षोत्स्यते। क्षुणत्तु-क्षुन्ताम्। अक्षुणत्-अक्षुन्त। क्षुन्यात्-क्षुन्दीत। क्षुद्यात्-क्षुत्सीष्ट। अक्षुदत्-अक्षौत्सीत्-अक्षुत्त। अक्षोत्स्यत्-अक्षोत्स्यत।

उच्छृदिर् दीप्तिदेवनयोः। उच्छृदिर् धातु चमकना और खेलना अर्थों में है। आदि उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होती है। छकार के परे उसी उकार को तुक् का आगम हुआ था। उकार के जाने के बाद तुक् वाले चकार की भी स्वतः निवृत्ति हो गई। इसके बाद इर् की इत्संज्ञा होकर छृद् बचता है। उदित् का फल उदितो वा से क्त्वा के परे

..... विकल्प से इट् का आगम करना है। स्वरितेत् होने के कारण उभयपदी और सेट् है किन्तु सिच् से भिन्न सकारादि प्रत्ययों के परे होने पर सेऽसिचि कृतचृतच्छृदतृदनृतः से विकल्प से इट् होता है। यहाँ ऋ होने के कारण उससे परे शनम् मे नकार को णत्व होता है।

छृणत्ति-छृन्ते। चच्छर्द-चच्छृदे। छर्दितासि-छर्दितासे। छर्दिष्यति-छर्त्स्यति, छर्दिष्यते-छर्त्स्यते। छृणत्तु-छृन्ताम्। अच्छृणत्-अछृन्त। छृन्द्यात्-छृन्दीत। छृद्यात्-छर्दिषीष्ट-छृत्सीष्ट। अच्छृदत्-अच्छर्दीत्-अच्छर्दिष्ट। अच्छर्दिष्यत्-अच्छर्त्स्यत्-अच्छर्दिष्यत्-अच्छर्त्स्यत।

उतृदिर् हिंसानादरयोः। उतृदिर् धातु हिंसा करना और अनादर करना अर्थों में है। आदि उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होती है। इर् की इत्संज्ञा होकर तृद् बचता है। उदित् का फल उदितो वा से क्त्वा के परे विकल्प से इट् का आगम करना है। स्वरितेत् होने के कारण उभयपदी और सेट् है किन्तु सिच् से भिन्न सकारादि प्रत्ययों के परे होने पर सेऽसिचि कृतचृतच्छृदतृदनृतः से विकल्प से इट् होता है। यहाँ ऋ होने के कारण उससे परे शनम् मे नकार को णत्व होता है।

तृणत्ति-तृन्ते। ततर्द-ततृदे। तर्दितासि-तर्दितासे। तर्दिष्यति-तर्त्स्यति, तर्दिष्यते-तर्त्स्यते। तृणत्तु-तृन्ताम्। अतृणत्-अतृन्त। तृन्द्यात्-तृन्दीत। तृद्यात्-तर्दिषीष्ट-तृत्सीष्ट। अतृदत्-अतर्दीत्-अतर्दिष्ट। अतर्दिष्यत्-अतर्त्स्यत्-अतर्दिष्यत्-अतर्त्स्यत।

क्रम यह है कि पहले परस्मैपदी उसके बाद आत्मनेपदी तब उभयपदी धातुओं का विवचन हो किन्तु रुधादिभ्यः शनम् इस सूत्र को देखते हुए पहले उभयपदी रुधिर् का कथन करके अब परस्मैपदी धातुओं का प्रकरण प्रारम्भ करते हैं।

कृती वेष्टने। कृती धातु लपेटना अर्थ में है। ईकार की इत्संज्ञा होती है, कृत् शेष रहता है। उदात्तेत् होने से परस्मैपदी है। अनुदात्त नहीं है, अतः सेट् है किन्तु सिच् से भिन्न सकारादि प्रत्ययों के परे होने पर सेऽसिचि कृतचृतच्छृदतृदनृतः से विकल्प से इट् होता है।

कृणत्ति। चकर्त। कर्तिता। कर्तिष्यति-कर्त्स्यति। कृणत्तु। अकृणत्। कृन्त्यात। कृत्यात्। अकर्तीत्। अकर्तिष्यत्-अकर्त्स्यत्।

तृह हिसि हिंसायाम्। तृह और हिसि धातु हिंसा करना अर्थ में है। तृह में अन्त्य अकार और हिसि में अन्त्य इकार की इत्संज्ञा होती है। हिस् में इदित् होने के कारण इदितो नुम् धातोः से नुमागम होकर हिस् हो जाता है।