Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 17
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VṛttiGovind
LSK 666
डिद्वद्भावविधायकमतिदेशसूत्रम्
विज इट्
Aṣṭādhyāyī 1.2.2
Vṛtti Varadarājācārya

॥इति तुदादयः॥१७॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

विजे: पर इडादिप्रत्ययो डिद्वत्। उद्विजिता॥

६६६- विज इट्। विजः पञ्चम्यन्तम्, इट् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्डित् से डित् की अनुवृत्ति आती है।

विज् धातु से परे इट् आदि वाला प्रत्यय डिद्वद्भाव को प्राप्त होता है।

लुट् में उद्विज्+इता होने के बाद पुगन्तलघूपधस्य च से गुण प्राप्त था, उसे निषेध करने के लिए इट् सहित ता को डिद्वत् हुआ, फलतः विडन्ति च से गुण का निषेध होकर उद्विजिता ही रह गया। इसी तरह उद्विजिष्यति आदि में भी समझना चाहिए। आगे के लकारों में क्रमशः देखें- उद्विजताम्। उदविजत (उपसर्ग के बाद ही अट् बैठता है।) उद्विजेत। उद्विजिषीष्ट। उदविजिष्ट। उदविजिष्यत।

इस तरह से तुदादि में इतने ही धातुओं का समावेश लघुसिद्धान्तकौमुदी में किया गया है। अदादि, जुहोत्यादि, स्वादि की अपेक्षा इस गण के धातुओं के रूप सरल होते हैं फिर भी प्रक्रिया सामान्य जानकारी तक ही सीमित रखकर विशेष ज्ञान

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वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी के बाद ही हो सकता है। उन ग्रन्थों के लिए पूर्वाधार तैयार करना या सामान्य जानकारी रखना इस ग्रन्थ का कार्य है।

परीक्षा

द्रष्टव्य:-

सभी प्रश्न अनिवार्य हैं और उनके अंक भी दिये गये हैं।

१-

अपनी पुस्तिका में तुद् और नुद् धातु के सारे रूप लिखें।

१०

२-

मुच्चलु धातु के सभी लकारों में मध्यमपुरुष एकवचन के रूपों की सिद्धि सूत्रों को लगाकर करें।

१५

३-

विन्दु धातु के लुङ् लकार के सभी रूपों की सिद्धि दिखाइये

१५

४-

स्वादि-प्रकरण और तुदादि-प्रकरण की तुलना करें।

१०

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

तुदादिप्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ रुधादिप्रकरणम्