Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 18
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VṛttiGovind
LSK 668
इमागमविधायकं विधिसूत्रम्
तृणह इम्
Aṣṭādhyāyī 7.3.92
Vṛtti Varadarājācārya

तृहः श्नमि कृते इमागमो हलादौ पिति सार्वधातुको।

तृणेढि। तृण्ढः। ततर्ह। तर्हिता। अतृणेट्।।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६६८- तृणह इम्। तृणहः षष्ठ्यन्तम्, इम् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। श्नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके से पिति और सार्वधातुके की तथा उतो वृद्धिर्लुकि हलि से हलि की अनुवृत्ति आती है।

हलादि पित् सार्वधातुक के परे होने पर शनम् होने के बाद तृह धातु को इम् का आगम होता है।

तृणहः में श्नम् युक्त रूप पठित होने के कारण श्नम् करने के बाद इस सूत्र की प्रवृत्ति होती है, यह सूचित होता है। इम् में मकार ग्री इत्संज्ञा होती है। मित् होने के कारण मिदचोऽन्त्यात्परः से अन्त्य अच् के बाद इ बैठता है।

तृणेढि। तृह् से लट्, तिप्, श्नम् करने के बाद तृनह्+ति बना। तृणह इम् से इम् होकर नकारोत्तरवर्ती अकार के बाद बैठा, तृन+इह्+ति बना। तृन+इह में गुण होकर तृनेह्+ति बना। ऋकार से परे नकार को ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् वार्तिक से णत्व हुआ। हो ढः से हकार को ढत्व, झषस्तथोर्धोऽधः से ति के तकार को धत्व, ढकार के योग में धकार को ष्टुत्व होकर ढकार हो जाने के बाद तृणेढ्+ढि बना। पूर्व ढकार का ढो ढे लोपः से लोप होकर तृणेढि सिद्ध हुआ। तम् के परे रहते श्नसोरल्लोपः से नकारोत्तरवर्ती अकार के लोप होने पर तृनह्+तम् बना। ढत्व, धत्व, ष्टुत्व, ढलोप करके नकार को अनुस्वार और परसवर्ण करके तृणढः बन जाता है। झि के परे होने पर अकार का लोप, नकार को अनुस्वार करने पर तृहन्ति बनता है। सिप् में ढत्व होने के बाद तृणेढ्+सि इस स्थिति में षढोः कः सि से कत्व, षत्व करके क् और प् के संयोग में क्ष बनता है, जिससे तृहेक्षि सिद्ध हो जाता है। आगे तृणढः, तृणढ, तृणेहि( तृणेहमि ) तृह्वः, तृह्यः ये रूप बनते हैं। ततर्ह, ततृहतुः, ततृहुः, ततर्हिथ, ततृहथुः, ततृह, ततर्ह, ततृहिव, ततृहिम। लिट्- तर्हिता। लृट्- तर्हिष्यति। लोट्- तृणेढु-तृणढात्, तृणढाम्, तृहन्तु, तृणिढ-तृणढात्, तृणढम्, तृणढ, तृणहानि, तृणहाव, तृणहाम।

लड् में- अतृनह्+त् बनने के बाद हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से त् का लोप, इम् का आगम, गुण, हकार का ढत्व, जश्त्व, णत्व, वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करने पर अतृणेट्-अतृणेड् ये दो रूप बनते हैं। अतृणेट्-अतृणेड्, अतृणढाम्, अतृहन्, अतृणेट्-अतृणेड्, अतृणढम्, अतृणढ, अतृणहम्, अतृह्व, अतृह्य। आगे के लकारों में- तृह्यात्। तृह्यात्। अतर्हीत्। अतर्हिष्यत् आदि बन रूप बन जाते हैं।

हिसि हिंसायाम्। हिंसार्थक हिसि धातु में इकार के लोप होने के बाद इदितो नुम् धातोः से नुम् होकर हिन्स् बना हुआ है।