लुङ्लिङोः शितश्च प्रकृतिभूतान्मृङ्स्तङ् नान्यत्र। रिङ्। इयङ्।
प्रियते। ममार। मर्ता। मरिष्यति। मृषीष्ट। अमृत॥
पृङ् व्यायामे॥४३॥ प्रायेणायं व्याङ्पूर्वः॥ व्याप्रियते। व्यापप्रे।
व्यापप्राते। व्यापरिष्यते। व्यापृत। व्यापृषाताम्॥
जुषी प्रीतिसेवनयोः॥४४॥ जुषते। जुजुषे॥
ओविजी भयचलनयोः॥४५॥ प्रायेणायमुत्पूर्वः। उद्विजते॥
६६५- प्रियतेर्लुङ्लिङोश्च। प्रियतेः पञ्चम्यन्तं, लुङ्लिङोः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। शदेः शितः से शितः, अनुदात्तङित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।
मृङ् धातु से लुङ्, लिङ् अथवा शित्-प्रकृतिभूत अर्थात् शित् प्रत्यय होने वाले लकार के स्थान पर आत्मनेपद होता है, अन्य लकारों में नहीं।
यह सूत्र नियमार्थ माना जाता है, क्योंकि मृङ् धातु के ङित् होने के कारण सभी लकारों में आत्मनेपद स्वतः सिद्ध था, फिर इस सूत्र से आत्मनेपद का विधान सिद्धे सति आरम्भ्यमाणो विधिर्नियमाय भवति के अनुसार इस धातु से आत्मनेपद हो तो केवल लुङ्, लिङ् और शित् प्रत्यय होने वाले लकारों के स्थान पर ही हो, अन्य लकारों में परस्मैपद ही हो, यह नियम बनाता है।
प्रियते। मृ से लट्, त, श करने के बाद मृ+अत बना। रिङ्शयग्लिङ्क्षु से ऋकार के स्थान पर रिङ् आदेश होकर प्रि+अत बना। अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ से इकार के स्थान पर इयङ् आदेश होने पर प्रिय्+अत बना। टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व और वर्णसम्मेलन होने पर मियते बना। आगे- प्रियेते, प्रियन्ते आदि। लिट् में तो उपर्युक्त नियम से परस्मैपद ही होगा। अतः मृ से तिप्, णल्, द्वित्व, उरत्व, हलादिशेष, वृद्धि होकर वर्णसम्मेलन होने पर ममार बन जाता है। आगे- मम्रतुः, मम्रुः, ममर्थ, मम्रथुः, मम्र, ममार-ममर, ममृव, ममृम।
लुट् में मर्ता। लृट् में- ऋद्धनोः स्ये से इट् आगम होकर मरिष्यति। आगे- प्रियताम्। अप्रियत। प्रियेत। मृषीष्ट। अमृत। अमरिष्यत्।
पृङ् व्यायामे। पृङ् धातु व्यायाम करना अर्थ में है। इस धातु का प्रयोग प्रायः वि और आङुपसर्गपूर्वक ही होता है। इस धातु में ङकार की इत्संज्ञा होने के कारण ङित् होने से अनुदात्तङित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदी बन जाता है और ऊदृदन्तै० में न आते हुए अजन्त और एकाच् होने से अनुदात्त भी है। अनुदात्त होने से यह धातु नित्य अनिट् है परन्तु क्रादिनियम से लिट् में नित्य से इट् होता है।
लट् में- व्यापृ से लिट्, त, श होने पर व्यापृ+अत बना। रिङ्शयग्लिङ्क्षु से ऋकार के स्थान पर रिङ् आदेश होकर व्याप्रि+अत बना। अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ से इकार के स्थान पर इयङ् आदेश पर व्याप्रिय्+अत बना। टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व तथा वर्णसम्मेलन होने पर व्याप्रियते बना। इसी प्रकार आगे- व्याप्रियेते, व्याप्रियन्ते
आदि रूप बनते हैं। लिट् में- व्यापृ से लिट्, त, एश्, द्वित्व, उरत्व, हलादिशेष करने पर व्यापपृ+ए बना। यण् तथा वर्णसम्मेलन होने पर व्यापप्रे बना। लुट् में- व्यापर्ता। लृट् में ऋद्धनोः स्ये से इडागम होने पर व्यापरिष्यते। व्याप्रियताम्। जहां अट् का आगम होता है, वहां अडागम होने के बाद आ और अ में सवर्णदीर्घ होकर आ ही बनता है। अतः लङ् में व्याप्रियत बनता है। व्याप्रियेत। व्यापृषीष्ट। लुङ् में- ह्रस्व से परे सकार मिलने से सिच् के सकार का ह्रस्वादङ्गत् से लोप होने पर व्यापृत बना। लृङ् में- व्यापरिष्यत।
जुषी प्रीतिसेवनयोः। जुषी धातु प्रीति अर्थात् प्रसन्न होने तथा सेवन करने अर्थ में है। अनुबन्धलोप होने पर यह धातु हलन्त कहलाती है। जुषी धातु में विद्यमान ईकार अनुदात्त है। अतः उसकी इत्संज्ञा होने पर यह धातु अनुदात्तेत् कहलाती है। फलतः अनुदात्तडित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदी बन जाता है। इस धातु का हलन्त अनुदात्तों में पठन न होने से यह उदात्त है फलतः यह धातु सेट् है।
लट् में- जुष् धातु से लट्, त, श होने के बाद टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व तथा वर्णसम्मेलन होने पर जुषते बना। लिट् में- जुष् से लिट्, त, एश्, द्वित्व, हलादिशेष तथा वर्णसम्मेलन होकर जुजुषे बना। इसी प्रकार आगे- जोषिता। जोषिष्यते। जुषताम्। अजुषत। जुषेत। जोषिषीष्ट। अजोषिष्ट। अजोषिष्यत।
ओविजी भयचलनयोः। ओविजी धातु डरना और डर से काँपना अर्थ में है। इस धातु का प्रयोग प्रायः उत् उपसर्गपूर्वक ही किया जाता है। ओविजी में ओ और जी में ईकार की इत्संज्ञा होने पर विज् बचता है और उत् उपसर्गपूर्वक होने के कारण उद्विज् धातु बनता है। ओविजी में ईकार अनुदात्त होने से उसकी इत्संज्ञा होने पर यह धातु अनुदात्तेत् बन जाता है, फलतः यह आत्मनेपदी होता है। अनुदात्तों में गणना नहीं है, अतः सेट् है।
लट्- उद्विजते। लिट्- उद्विजिजे, उद्विजिजाते, उद्विजिजिरे।