गिरते रेफस्य लो वाऽजादौ प्रत्यये।
गिरति, गिलति। जगार, जगाल। जगरिथ, जगलिथ। गरीता, गरिता,
गलीता, गलिता॥ प्रच्छ ज्ञीप्सायायाम्॥४१॥
ग्रहिन्येति सम्प्रसारणम्। पृच्छति। पप्रच्छ। पप्रच्छतुः। पप्रच्छुः।
प्रष्टा। प्रक्ष्यति। अप्राक्षीत्। मृड् प्राणत्यागे॥४२॥
६६४- अचि विभाषा। अचि सप्तम्यन्तं, विभाषा प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। ग्रो यङि से ग्रः एवं कृपो रो लः से लः की अनुवृत्ति आती है।
अजादि प्रत्यय के परे रहते गृ धातु के रेफ के स्थान पर विकल्प से ल आदेश होता है।
गिरति, गिलति। गृ धातु से लट्, तिप्, श करके ऋत इद्धातोः से रपरसहित इत्व होने के बाद गिर्+अति बना। अचि विभाषा से श वाले अकाररूप अच् के परे रहते गिर् के रेफ के स्थान पर विकल्प से लकार आदेश होने पर गिलति बना। न होने के पक्ष में गिरति ही रह जाता है।
लिट् में तिप्, णल्, द्वित्व, उरत्व, हलादिशेष, चुत्व, अचो ञ्णिति से वृद्धि करके जगार बनता है। आगे अचि विभाषा से विकल्प से रेफ के स्थान पर लकार आदेश होने पर जगाल बनता है। इस तरह लत्व पक्ष में जगलतुः, जगलुः आदि और लत्वाभाव में जगरतुः-जगरुः आदि रूप बनते हैं। लिट् लकार को छोड़कर अन्यत्र के इट् को विकल्प से वृतो वा से दीर्घ होने के कारण लुट् में- गरीता-गलीता, गरिता-गलिता और लृट् में गरीष्यति-गलीष्यति, गरिष्यति-गलिष्यति आदि रूप बनते हैं। अन्य लकारों में क्रमशः गिरतु-गिलतु। अगिरत्-अगिलत्। गिरेत्-गिलेत्। आशीर्लिङ् में अजादि परे न मिलने के
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कारण लत्व नहीं होगा- गीर्यात्। अब लुङ् लकार में अगारीत्-अगालीत्। लुङ् में अगरीष्यत्-अगलीष्यत्, अगरिष्यत्, अगलिष्यत्।
प्रच्छ ज्ञीप्सायाम्। प्रच्छ धातु जानने की इच्छा अर्थ में है। छकारोत्तरवर्ती उदात्त अकार की इत्संज्ञा होने से प्रच्छ यह उदात्तेत् है, अतः परस्मैपदी है। छकार के पहले वाला चकार छकार के परे होने पर छे च से तुक् और उसको चुत्व होकर बना है। यह धातु अनुदात्तों में परिगणित होने के कारण नित्य अनिट् है किन्तु क्रादिनियम से लिट् के वलादि आर्धधातुक को नित्य से इट् और भारद्वाज नियम से थल् में विकल्प से इट् होता है। डित् अर्थात् श वाले अकार के परे होने पर प्र के रेफ को सम्प्रसारण होकर ऋकार हो जाता है।
पृच्छति। प्रच्छ से लट्, तिप्, श करने के बाद प्रच्छ+अति बना है। श वाले अकार के अपित् सार्वधातुक होने के कारण सार्वधातुकमपित् से डिद्वत् हो गया है। अतः ग्रहि-ज्या-वयि-व्यधि-वष्टि-विचति-वृश्चति-पृच्छति-भृज्जतीनां डिति च से रेफ को सम्प्रसारण होकर ऋकार हुआ, प्+ऋ+अ+च्छ+अति बना। ऋ+अ में सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप होकर ऋकार ही बना। इस तरह पृच्छ+अति=पृच्छति सिद्ध हुआ। पृच्छति, पृच्छतः, पृच्छन्ति आदि।
लिट् में- प्रच्छ से तिप्, णल्, द्वित्व, हलादिशेष करके पप्रच्छ बनता है। पप्रच्छतुः, पप्रच्छुः, पप्रच्छिथ-पप्रष्ठ, पप्रच्छथुः, पप्रच्छ, पप्रच्छ, पप्रच्छिव, पप्रच्छिम।
लुट् में- प्रच्छ+ता में छकार के स्थान पर व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः से षकारादेश हुआ और अब छ् के न रहने से उसको हुआ च् भी चला जाता है। षकार से परे ता को टुत्व होकर प्रष्टा बनता है। प्रष्टा, प्रष्टारौ, प्रष्टारः।
लृट् में- प्रच्छ+स्यति में षत्व हुआ। छकार के स्थान पर षकार हो जाने से छकार को मानकर हुआ तुक् भी स्वतः चला गया अतः प्रष्+स्यति बना। उसके बाद षढोः कः सि से षकार के स्थान पर ककारादेश और ककार से परे सकार को आदेशप्रत्यययोः से षत्व करके ककार और षकार के संयोग में क्ष् बन जाता है, जिससे प्रक्ष्यति, प्रक्ष्यतः, प्रक्ष्यन्ति आदि रूप सिद्ध होते हैं।
आगे- पृच्छतु-पृच्छतात्। अपृच्छत्। पृच्छेत्। पृच्छ्यात्।
अप्राक्षीत्। लुङ् में अप्रच्छ+स्+ईत् बनने के बाद वदव्रजहलन्तस्याचः से वृद्धि होकर अप्राच्छ+स्+ईत् बना। व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः से छ् के स्थान पर षत्व करके षढोः कः सि से षकार के स्थान पर ककार आदेश और सकार के स्थान पर षत्व होने के बाद क्षत्व होकर अप्राक्ष+ईत् बना। वर्णसम्मेलन होकर अप्राक्षीत् सिद्ध हुआ। तस् में झलो झलि से सिच् के सकार का लोप होता है और षत्व, ष्टुत्व होने पर अप्राष्टाम् बनता है। आगे- अप्राक्षुः, अप्राक्षीः, अप्राष्टम्, अप्राष्ट, अप्राक्षम्, अप्राक्ष्व, अप्राक्षम। लृङ् में- अप्रक्ष्यत् आदि।
मृङ् प्राणत्यागे। मृङ् धातु प्राण त्यागना अर्थात् मरना अर्थ में है। डकार की इत्संज्ञा होती है। डित् होने के कारण अनुदात्तडित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदी हो जाता है। अनुदात्तेत् होने के कारण अनिट् है। शविकरण, लुङ् और लिङ् लकारों में ही अग्रिम सूत्र से आत्मनेपद और शेष लकारों में परस्मैपद होता है। तात्पर्य यह है कि लट्, लोट्, लङ्, लिङ्, और लुङ् में आत्मनेपदी तथा लिट्, लुट्, लृट् और लृङ् में परस्मैपदी होता है।