Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 17
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VṛttiGovind
LSK 663
सुडागमविधायकं विधिसूत्रम्
हिंसायां प्रतेश्च
Aṣṭādhyāyī 6.1.141
Vṛtti Varadarājācārya

उपात्प्रतेश्च किरतेः सुट् स्यात् हिंसायाम्।

उपस्किरति। प्रतिस्किरति॥ गृ निगरणे॥४०॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६६३- हिंसायां प्रतेश्च। हिंसायां सप्तम्यन्तं, प्रतेः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। उपात्प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु से उपात् की, किरतौ लवने से लवने की और सुद् कात्पूर्वः इस पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है।

उप या प्रति उपसर्ग से परे कृ धातु को सुद् का आगम होता है यदि हिंसा का विषये हो तो।

उपस्किरति। प्रतिस्किरति। हिंसा करता है। उप+किरति, प्रति+किरति में हिंसा अर्थ होने के कारण हिंसायां प्रतेश्च से सुद् होकर उपस्किरति, प्रतिस्किरति बन जाते हैं। इसी तरह पूर्ववार्तिक के सहयोग से उपचस्कार, प्रतिचस्कार बन जाते हैं।

गृ निगरणे। गृ धातु निगलना अर्थ में है। इसके रूप कृ धातु की तरह ही होते हैं। अन्तर इतना ही है कि अजादि प्रत्ययों के परे होने पर अग्रिम सूत्र अचि विभाषा से लकारादेश होता है।