Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 17
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VṛttiGovind
LSK 662
सुडागमविधायकं विधिसूत्रम्
किरतौ लवने
Aṣṭādhyāyī 6.1.140
Vṛtti Varadarājācārya

उपात्किरतेः सुट् छेदने। उपस्किरति।

वार्तिकम्- अडभ्यासव्यवायेऽपि सुट् कात् पूर्व इति वक्तव्यम्।

उपास्किरत्। उपचस्कार॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६६२- किरतौ लवने। किरतौ सप्तम्यन्तं, लवने सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।

उपात्प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु से उपात् की और सुट् कात्पूर्वः इस पूरे सूत्र की

अनुवृत्ति आती है।

उप उपसर्ग से परे कृ धातु को सुट् का आगम होता है यदि काटने का

विषय हो तो।

सुट् में उकार और टकार की इत्संज्ञा के बाद सकार शेष रहता है। टित् होने के

कारण धातु के आदि में बैठता है।

उपस्किरति। काटता है। काटना अर्थ होने के कारण उप+किरति में किरतौ

लवने से सुट् होकर उपस्किरति सिद्ध हो जाता है।

अडभ्यासव्यवायेऽपि सुट् कात् पूर्व इति वक्तव्यम्। यह वार्तिक है। अट् या

अभ्यास के व्यवधान होने पर भी ककार से पूर्व यथाविहित सुट् का आगम हो ऐसा

कहना चाहिए। लड् में अट् आगम होने पर उप+अकिरत् बना है। उप और धातु के बीच

में अट् का व्यवधान है। उपात् इस पञ्चमी के कारण तस्मादित्युत्तरस्य के नियम से उप

से अव्यवहित ककार को सुट् का विधान है। यहाँ पर अट् के व्यवधान होने के कारण प्राप्त

नहीं था। अतः वार्तिककार ने यह वार्तिक बनाया। लड् में उप+अकिरत् में अकार के व्यवधान में और उप+चकार में अभ्यास के व्यवधान में भी सुद् होकर उपास्किरत् और उपचस्कार ये दो रूप सिद्ध हो सके।